राजनांदगांव। छत्तीसगढ़ प्रदेश कांग्रेस के नेता आफताब आलम ने शिक्षा नीति 2020 के संदर्भ में कहा कि यह शिक्षा नीति पंूजीपतियों एवं उद्योगपतियों के इशारे में बनाई गई है। कायदे से इस शिक्षा नीति को संसद के दोनों सदनों में पास किया जाना था, तब यह कानून बनती, लेकिन मोदी सरकार लगातार संवैधानिक एवं संसदीय ढांचे को तितर-बितर करते हुए सीधा मोदी सरकार के केबिनेट ने मंजूरी दे दी है। श्री आलम ने कहा कि यह शिक्षा नीति शिक्षा के क्षेत्र में सरकारी विनिवेश को घटाएगी और बड़ी पंूजी के लिए शिक्षा के दरवाजे खोलेगी। निम्न एवं मध्यम वर्गीय देशवासियों के बेटे-बेटियों के लिए शिक्षा प्राप्त करने के रास्ते और भी संकरे हो जाएंगे। यह शिक्षा नीति फाउंडेशन स्टेज यानी पहले 5 साल की पढ़ाई (3+2) में अध्यापक की कोई जरूरत महसूस नहीं करती। इस काम के लिए सुनियोजित तरीके से एनजीओ कर्मी/स्वयंसेवक एवं आंगनबाड़ी कर्मी जैसे लोग बुनियादी आपसी सौहार्द्र वाली प्रजातांत्रिक विचारधारा को बदलने की नियत से अंजाम देंगे।

श्री आलम ने कहा कि नई शिक्षा नीति के मूलड्राफ्ट में जो सुझाया गया है कि छठवीं कक्षा से बच्चों को छोटे-मोटे काम-धंधे भी सिखाए जाएंगे। गौरतलब है कि आज हमारे देश में उद्योगों में उत्पादन क्षमता का सिर्फ 70 प्रतिशत ही पैदा किया जा रहा है। पूंजीपति आपसी स्पर्धा में सस्ते श्रमिकों की आपूर्ति के लिए वोकेशनल सेंटरों, आईटीआई, पॉलिटेनिक्ल का रूख कर रहे हैं, ताकि इन्हें सस्ते मजदूर मिल सके और शिक्षा पर खर्च भी कम करना पड़े। यह कदम इसी उद्देश्य को ध्यान में रखकर नए शिक्षा नीति सत्र में शामिल किया गया। श्री आलम ने कहा कि नई शिक्षा नीति में यह स्पष्ट है कि जिस स्कूल में 50 से कम बच्चे हों वह स्कूल बंद कर देना चाहिए। आज स्कूलों को बढ़ाने की जरूरत है, किन्तु यह नीति इससे बिल्कुल उलट उपाय सुझा रही है। पुरानी शिक्षा नीति यह कहती थी कि स्कूल पहुंच के हिसाब से होना चाहिए, न कि बच्चों के हिसाब से। श्री आलम ने कहा कि भारत की पहली शिक्षा नीति 1968 में आई थी। उसके बाद दूसरी शिक्षा नीति 1986 में आई, जिसे 1992 में उदारीकरण-निजीकरण की नीतियों के मद्देनजर संशोधित किया गया। वर्तमान शिक्षा नीति 2020 शिक्षा के क्षेत्र में अधिक मुनाफा कमाने वाली व्यापार की तरह है। श्री आलम ने कहा कि उच्च शिक्षा को सुधारने के लिए हायर एजुकेशन फाईनेशियल एजेंसी (एचईएफए) बनी हुई है। उसका बजट विगत साल 650 करोड़ घटा दिया गया। यानी कि 2750 करो? से 2100 करोड़ कर दिया गया, लेकिन हैरानी की बात यह है कि मोदी सरकार ने उस पर सिर्फ ढाई सौ करोड़ रुपए ही खर्च किया, जो शिक्षा सुधार के प्रति मोदी सरकार की उदासीनता को दर्शाता है। श्री आलम ने कहा कि कांग्रेस की यूपीए सरकार ने बजट का 10 प्रतिशत और सकल घरेलू उत्पाद का 6 प्रतिशत शिक्षा पर खर्च किया। वर्तमान मोदी सरकार पूरी तरीके से उस पर कटौती करते हुए पंूजीपतियों को बेल आउट पैकेज देने में रूचि दिखा रही है। श्री आलम ने कहा कि कुल मिलाकर नई शिक्षा नीति 2020 पूर्ण रूप से बड़ी पूंजी के प्रति समर्पित है तथा देश के निम्न एवं मध्यम वर्गीय छात्र-छात्राओं के लिए शिक्षा के अधिकार हासिल करने के लक्ष्य में रोडा साबित होगी।

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