रियाबंद जिला जनजाति सदस्यों की बहुलता एवं वनांचल क्षेत्र के नाम से जाना जाता है। यहां कमार, भुंजिया सहित अन्य जनजाति सदस्य निवासरत है। साथ ही बांसशिल्प को अपने आजीविका का माध्यम मानने वाले कंडरा जनजाति के लोग भी जिले में निवास करते है। शासन द्वारा जनजाति सदस्यों के विकास के लिए विभिन्न योजनाओं का संचालन किया जा रहा है। जिससे उन्हें आगे बढ़ने में मदद मिल रही है।

जिले के कुरूद गांव की रहने वाली कंडरा जनजाति सदस्य श्रीमती श्यामा बाई और उनके परिवार का जीवन पहले काफी कठिनाइयों से भरा था। खेतों में मजदूरी करके दो वक्त की रोटी जुटाना भी मुश्किल था। उनके पास कोई स्थायी आय का स्रोत नहीं था। शासन द्वारा संचालित महतारी वंदन योजना ने उनके जीवन में क्रांति ला दी। महतारी वंदन योजना उनके जीवन विकास में सहायक हो रही है। श्रीमती श्यामा बाई कंडरा अपने जीवन में संघर्ष और स्वाभिमान की मिसाल बन चुकी हैं। उनका परिवार, जो कभी भूमिहीन मजदूर था, आज अपनी मेहनत और परंपरागत कौशल के दम पर आत्मनिर्भरता की नई कहानी लिख रहा है। कंडरा जनजाति के होने के कारण अपने पैतृक कार्यों जैसे बांस के समान बनाकर आजीविका चलाती है। उन्हें बांस के समान बनाने के लिए बाहर से बांस खरीदना पड़ता है। लेकिन महतारी वंदन योजना के शुरू होने से प्रतिमाह 1 हजार रूपये की राशि सीधे उनके बैंक खाते में पहुंच रही है। जिससे वह राशि का उपयोग बाहर से बांस खरीदने में कर रही है। इससे बांसशिल्प कला को आगे बढ़ाने एवं परिवार के भरण-पोषण में आर्थिक सहायता में मदद मिल रही है। पहले बहुत कम आय अर्जित करने वाली श्रीमती श्यामा बाई को महतारी वंदन योजना से सहायता मिलने पर उनकी मासिक आय 8 हजार रूपये तक पहुँच गई है। श्रीमती श्यामा बाई ने बताया कि महतारी वंदन योजना से मिलने वाली राशि उनक बांसशिल्प व्यवसाय को आगे बढ़ाने में बहुत मदद कर रही है। उन्हें अन्य लोगों से ऋण लेने की जरूरत नहीं पड़ती है। इससे अधिक कुशलता एवं आत्मनिर्भरता से अपने व्यवसाय को आगे बढ़ा पा रही है। पहले पैसों की दिक्कत के कारण कम मात्रा में कच्चा सामान खरीद पाते थे। इससे महीने में कम उत्पाद बना पाते थे। अब महतारी वंदन योजना से प्रतिमाह समय पर राशि मिल जाने से पैसों की दिक्कत नहीं होती है। इससे अधिक मात्रा में बांस से बनने वाले सामान बना पा रहे है। श्रीमती श्यामा बाई बताती है कि पर्याप्त मात्रा में बांस खरीद पाने से टोकरी, बर्तन एवं सजावटी सामान बना पा रही है। साथ ही बांस के अवशेष से छोटे टोकनी, सूपा, चूरकी जैसे उत्पाद बना रही है। बांसशिल्प के कार्य में उनके पति भी मदद करते है। जिससे परिवार आर्थिक विकास की ओर अग्रसर है। बांस से बनाए गये सामानों को गांवों में बिचौलियों के माध्यम से घर से ही सामान की थोक में बिक्री करते है। इसके अलावा शादी विवाह के सीजन में बाजारों में दुकान लगाकर उत्पादों का विक्रय करते है।

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