स्टडी कहती है यूरेनस और नेप्च्यून ग्रहों के बारे में अब तक जो अंदाजा था वो पूरी तरह सही नहीं है।

सौरमंडल के दूरस्थ ग्रहों के बारे में अभी हमें पूरी जानकारी नहीं है। वैज्ञानिक लम्बे अरसे से इन ग्रहों के बारे में जानने की लगातार कोशिश कर रहे हैं। यूरेनस और नेप्च्यून भी दो ऐसे ही ग्रह हैं जिनके बारे में वैज्ञानिक लगातार जानकारी जुटा रहे हैं। इससे पहले यूरेनस और नेप्च्यून को दैत्याकार गैसीय ग्रह कहा जाता रहा है। वैज्ञानिक मानते आए हैं कि ये ग्रह जमे हुए पानी यानी बर्फ से ढके हैं। इनके अंदर अमोनिया और अन्य गैसे भरी हैं। लेकिन नई स्टडी अब कुछ और ही कह रही है। 

यूरेनस और नेप्च्यून को लेकर नई स्टडी आई है। स्टडी कहती है कि इन ग्रहों के बारे में अब तक जो अंदाजा था वो पूरी तरह सही नहीं है। स्टडी इनके चट्टानी ग्रह होने का इशारा करती है। इसका एक उदाहरण यह है कि शोधकर्ताओं ने अनेक रैंडम इंटीरियल मॉडल चलाए और पुरानी थ्योरी का इस्तेमाल करने के बजाए उपलब्ध विरल आंकड़ों के साथ उनकी तुलना की। 

नई प्री-प्रिंट स्टडी के अनुसार शोधकर्ताओं ने एक नए, बिना किसी पूर्वधारणा के मॉडलिंग अप्रोच का इस्तेमाल किया, जिससे प्रत्येक ग्रह के लिए कई संभावित आंतरिक संरचनाएँ निकलकर सामने आईं। इससे एक चौंकाने वाला परिणाम सामने आया। नए परिणाम के अनुसार वैज्ञानिकों का कहना है कि हमें शायद यह अंदाज़ा नहीं है कि यूरेनस और नेपच्यून के अंदरूनी भाग वास्तव में कैसे हैं। यानी नई स्टडी इनकी संरचना के बारे में नया खुलासा करती है।

इसका एक उदाहरण भी वैज्ञानिकों ने पेश किया है। वैज्ञानिकों ने कहा है कि एक मॉडल ने यूरेनस का चट्टान-से-पानी अनुपात 0.04 (लगभग सारा पानी) से 3.92 (लगभग सारा चट्टान) तक दिया था, और नेपच्यून की संरचना भी इसी तरह अप्रतिबंधित है। वास्तव में आंतरिक संरचनाओं की एक विस्तृत रेंज विरल आँकड़ों के अनुरूप बनी हुई है। इसलिए अभी यह निश्चित तौर पर नहीं कहा जा सकता है कि यह केवल एक बर्फीला गोला है।  

यहां पर एक विरोधाभास पैदा हो जाता है। यानी अगर इन ग्रहों को बर्फीला गोला कहना गलत है तो फिर इन पर एक चट्टानी पदार्थ मिल सकता है जो कि इनका अधिकतर हिस्सा बना रहा है। लेकिन यह नई थ्योरी सौरमंडल के निर्माण के अन्य मॉडल्स को अशांत कर सकती है। इसलिए वैज्ञानिकों को यह स्पष्टीकरण देना होगा कि इन दूरस्थ कक्षाओं में कितना ठोस मैटिरियल मौजूद है। 

इस बहस को समाप्त करते हुए वैज्ञानिकों ने कहा है कि यूरेनस व नेपच्यून की संरचना का पता अंततः कुइपर बेल्ट में एक विशेष मिशन के बाद ही लगाया जा सकता है। यानी कोई ऑर्बिटर ही वहां जाकर असली स्थिति का पता लगा सकता है। 

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