महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम (मनरेगा) में गरीबों को काम देने और विकास के नाम पर सरकारी कोष को दो दशकों से अरबों रुपये का चूना लगा। चालू वित्त वर्ष में देश के सिर्फ 55 जिलों में कराए गए ऑडिट में वित्तीय गड़बड़ी के 11 लाख से ज्यादा मामले पकड़े गए, जिनमें 302 करोड़ 45 लाख रुपये की लूट का पर्दाफाश हुआ। रोजगार के नाम पर लूट की यह कहानी सिर्फ आठ महीने की है। इस खेल में अधिकारी से लेकर ठेकेदार और बैंक मैनेजर तक शामिल पाए गए। कागजों पर काम होता था और ऊपर-ऊपर भुगतान भी हो जाता था। लूट के सबसे ज्यादा मामले तमिलनाडु और आंध्र प्रदेश में सामने आए।

जांच से बचने के लिए अपनाया ये तरीका

कहीं अधूरे काम को पूरा दिखा दिया गया तो कहीं ऐसे काम कराए गए, जिनकी मनरेगा में अनुमति ही नहीं है। यह भी सामने आया कि निगरानी जांच से बचने के लिए बड़े कार्यों को जान-बूझकर छोटे-छोटे हिस्सों में बांट दिया गया। इसमें नियमों की धज्जियां उड़ाई गईं। कई राज्यों में ठेकेदारों की भागीदारी पर स्पष्ट रोक के बावजूद ठेकेदारों एवं निजी एजेंसियों को ही काम सौंप दिए गए, जो सीधे तौर पर कानून का उल्लंघन है।

मिलीं भारी गड़बड़ियां

कई जिलों में मनरेगा कार्यों से संबंधित खरीद प्रक्रिया में भी भारी गड़बडि़यां मिलीं। कमीशन के चक्कर में कई मामलों में एक ही विक्रेता से सामान खरीदा गया या एक ही निविदा के आधार पर भुगतान कर दिया गया। कहीं-कहीं फाइलों में रॉयल्टी भुगतान एवं जीएसटी से जुड़े जरूरी दस्तावेज नहीं मिले, जो मनमाने तरीके से भुगतान की गवाही देता है।

जांच में किन प्रदेशों के नाम

जांच में पंजाब के पांच, उत्तर प्रदेश एवं मध्य प्रदेश के दो, बिहार, झारखंड, छत्तीसगढ़ और उत्तराखंड के एक-एक जिले शामिल थे। सबसे ज्यादा लूट तमिलनाडु एवं आंध्र प्रदेश में हुई। बंगाल में निरीक्षण के दौरान अस्तित्वहीन और गैर-जरूरी कार्य, बड़े पैमाने पर हेराफेरी और निगरानी से बचने के लिए कार्यों का विभाजन के मामले सामने आए। लिहाजा केंद्र सरकार को वहां मनरेगा की राशि रोकनी पड़ी।

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