भारत का 77वां गणतंत्र दिवस बीत गया। एक राष्ट्रीय पर्व, राष्ट्रीय समारोह और राष्ट्रीय स्वाभिमान का दिवस भी बीत गया। आप सभी ने राजधानी दिल्ली के ‘कत्र्तव्य पथ’ पर, परेड के जरिए, भारत की सामरिक, सांस्कृतिक, कलात्मक, आध्यात्मिक और क्षेत्रीय संप्रभुता का प्रदर्शन टीवी पर देखा होगा। कितना विविध, विराट और एकजुट, अखंड है भारत! यह व्यावहारिक तौर पर ‘संविधान दिवस’ भी था, क्योंकि 26 जनवरी, 1950 को हमारा संविधान लागू हुआ था। यह तारीख भी ऐतिहासिक है, क्योंकि 26 जनवरी, 1930 को हमारे क्रांतिकारी, स्वतंत्रता सेनानी पुरखों और तत्कालीन कांग्रेस ने ‘पूर्ण स्वराज्य’ की घोषणा की थी। गोरी, अंग्रेज हुकूमत को चेतावनी दी गई थी कि भारत को अब स्वतंत्रता चाहिए। हमारा संविधान 1,46,385 शब्दों का सबसे विस्तृत और लिखित दस्तावेज है, लिहाजा अभूतपूर्व और अनूठा है। संविधान देश के नागरिक को समान अधिकार देता है। ‘हम भारत के लोग..’ में अंबानी, अदाणी, टाटा घराने भी हैं और एक अदना, अनाम गरीब, आम आदमी भी इसमें समाविष्ट है। संविधान न तो खंडित किया जा सकता है और न ही उसकी अवहेलना, अनदेखी की जा सकती है। ऐसा करना संज्ञेय, दंडनीय अपराध है। संविधान ही राष्ट्र है। संविधान की व्याख्या, अपवाद के तौर पर, अलग प्रकार से की जा सकती है, लेकिन संविधान की मूल आत्मा और भावना एक ही है-‘हम भारत के लोग…संप्रभु, लोकतांत्रिक, पंथनिरपेक्ष, समाजवादी भारत के लोग…।’ कमोबेश ऐसे राष्ट्रीय पर्व के दिन तो ढोंग, विरोध, धर्मांधता से बचा जा सकता था। संविधान की छद्म प्रति लहरा कर देश को गुमराह करने की कोशिशें, अंतत:, बंजर ही साबित हुई हैं। दो युवकों ने ‘ताजमहल’ में घुस कर ‘तिरंगा’ लहराया।

यह राष्ट्रीय ध्वज और राष्ट्र का अपमान है। ‘ताजमहल’ पूरी तरह भारत का विश्वविख्यात ‘आश्चर्य’ है। यदि तिरंगा फहराया जाना था, तो वह सार्वजनिक समारोह मनाया जा सकता था। ‘घुसकर’ ऐसा करना ‘सांप्रदायिकता’ है, जो संविधान-विरोधी है। उप्र के एक शहर में ‘तिरंगा-यात्रा’ के दौरान कुछ असामाजिक, देश-विरोधी तत्त्वों ने ‘अल्लाह-हू-अकबर’ के नारे लगाए और दूसरों को बाध्य किया। यह संवैधानिक उच्छृंखलता है। संविधान ऐसी अभिव्यक्ति की आजादी का अधिकार नहीं देता। संविधान ने प्रत्येक नागरिक को मौलिक अधिकारों में मताधिकार की शक्ति दी है। हम लोकतांत्रिक देश हैं, लिहाजा मताधिकार प्राप्त नागरिक एक वोट के जरिए जनादेश दे सकता है कि कौनसी सरकार काम करेगी और किसे सत्ता से बेदखल किया जाता है, लेकिन गंभीर विडंबना है कि हर तीसरा नागरिक वोट ही नहीं देता है। चुनावों का यह औसत सामने आया है। देश में 97-98 करोड़ मतदाता हैं। अब विशेष गहन पुनरीक्षण के अभियानों के बाद मतदाताओं का यह आंकड़ा बढ़ भी सकता है। औसत वोट नहीं डालने वालों का आंकड़ा अमरीका की कुल आबादी से भी अधिक है। बहरहाल आज भी देश में सडक़ हादसों में करीब 1.77 लाख लोग सालाना मरते हैं और घायलों की संख्या अलग है।

लोग शराब पीकर गाड़ी चलाते हैं या नियमों का पालन नहीं करते। हादसे विकसित देशों में भी होते हैं, लेकिन भारत में ये गंभीर चुनौती बनते जा रहे हैं। इस आजाद मुल्क में आज भी लोग अपनी रेलगाडिय़ों पर पथराव करते हैं। न जाने क्यों करते हैं? क्या इसमें भी कोई प्रतिशोध निहित है? क्या उन्हें यह अहसास नहीं है कि ये खूबसूरत रेलगाडिय़ां उनकी अपनी संपत्ति हैं? उनके करों की राशि से बनी हैं और देश भर में सेवाएं दे रही हैं? देश में आज भी बाल-विवाह और बहुविवाह हो रहे हैं। आज भी दूषित पानी पीने से लोग मर रहे हैं। आज भी असामाजिक प्रथाएं मौजूद हैं। आज भी देश में लोग गरीब हैं। कमोबेश ‘गणतंत्र दिवस’ पर यह गंभीर चिंतन-मनन का विषय है कि ‘हम भारत के लोग…’ की प्रस्तावना और भावना अधूरी क्यों है? आज भी प्रदूषण की समस्या इतनी जानलेवा है कि भारत में साल भर में 17 लाख तक लोग अकाल मौत का शिकार हो रहे हैं। बहरहाल चारों ओर उत्साह है, वह स्वागत योग्य है, प्रशंसनीय है, लेकिन हमने कुछ बिंदु उठाए हैं, जो बुनियादी तौर पर ‘भारत के लोगों…’ के खिलाफ हैं, उन्हें खुरच रहे हैं, नुकसान पहुंचा रहे हैं। विकास के क्षेत्र में भारत को अभी लंबा सफर तय करना है। बेशक हम कई देशों से आगे हो चुके हैं, लेकिन अमरीका व चीन का मुकाबला अभी हमें करना है।

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