बिहार भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के एक दलित विधायक मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की ईमानदारी के कसीदे पढ़ते हुए कहते हैं, ‘मैं राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की पृष्ठभूमि से ताल्लुक रखता हूं। नीतीश हमारे संगठन से नहीं जुड़े हैं लेकिन त्याग, ईमानदारी और सामाजिक न्याय के प्रति समर्पण के मामले में उन्होंने हममें से कई लोगों को पीछे छोड़ दिया है।’

बिहार सरकार के एक पूर्व मंत्री जो अब भाजपा के एक शीर्ष पदाधिकारी हैं,  उन्होंने बिज़नेस स्टैंडर्ड से बातचीत में कहा, ‘हम नीतीशजी का सम्मान करते हैं। लेकिन हम बिहार में आधुनिकीकरण और विकास भी चाहते हैं। जब भी हम औद्योगीकरण और जमीन के मुद्दे पर चर्चा करते थे, वह हमें रोक देते थे। उनका हमेशा यही सवाल होता था कि अगर किसान से जमीन ले ली जाएगी तो वे अपनी जीविका कैसे चलाएंगे? अगर आज बिहार, शहरीकरण के मामले में भारत के सबसे निचले तीन राज्यों में है तो इसकी जिम्मेदारी भी काफी हद तक उन्हीं पर जाती है। यह हमारे लिए काफी निराशाजनक था।’ 

अब जब नीतीश कुमार राज्य की सत्ता समीकरण से बाहर हो गए हैं और 243 सदस्यीय विधान सभा में 89 सीटों के साथ भाजपा सबसे बड़ी पार्टी बनकर सरकार में मुख्य निर्णय करने वाला दल बन गई है, तब ऐसे में यह सोचने की जरूरत है कि आने वाले वर्षों में बिहार की सियासी तस्वीर कैसी होगी। साथ ही यह भी सवाल है कि क्या विकास के बारे में नीतीश कुमार की सोच को भाजपा आगे भी अपनाएगी। 

हालांकि तथ्यों से इनकार नहीं किया जा सकता। नीति आयोग (2025) और बिहार सरकार के (आर्थिक समीक्षा 2025) ताजा आंकड़ों के अनुसार वर्ष 2022-23 में बिहार की कामकाजी आबादी का बड़ा हिस्सा कृषि, वानिकी और मत्स्य क्षेत्र (49.6 फीसदी) में काम करता था। इसके अलावा सेवा क्षेत्र में 28.9 फीसदी और निर्माण क्षेत्र में 18.4 फीसदी लोग कार्यरत थे। लेकिन केवल 5.7 फीसदी कुल कामगार ही विनिर्माण क्षेत्र में काम कर रहे थे।

हालांकि राज्य के लिए हाल के वर्षों में बुनियादी ढांचे में हुआ बड़ा निवेश उम्मीदें बढ़ा सकता है। केंद्र सरकार ने राजमार्गों को बेहतर बनाने के लिए 33,000 करोड़ रुपये दिए हैं, रेलवे क्षमता बढ़ाने के लिए लगभग 1 लाख करोड़ रुपये की परियोजनाएं चल रही हैं और जिले की सड़कों में भी सुधार किया जा रहा है।

अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि इस बुनियादी ढांचे का इस्तेमाल बिहार किस तरह करे? क्या राज्य में तेजी से उद्योगों में निवेश लाने की कोशिश बढ़ानी चाहिए, जिसके लिए बड़े पैमाने पर जमीन अधिग्रहण करना पड़ेगा और संभव है कि इससे सीमित मात्रा में रोजगार के अवसर बनें? या फिर राज्य को औद्योगिक एस्टेट विकसित करने पर जोर देना चाहिए, जहां छोटे और मध्यम उद्योग स्थापित हो सकें जैसे कि हाजीपुर औद्योगिक क्षेत्र?

कृषि के बाद सबसे ज्यादा रोजगार सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्योग (एमएसएमई) क्षेत्र देता है। बिहार की कुल औद्योगिक इकाइयों में 95 फीसदी एमएसएमई हैं और विनिर्माण उत्पादन का लगभग 65  फीसदी हिस्सा भी इन्हीं से आता है। वर्ष 2023 में जब जदयू राजद के साथ गठबंधन में थी, तब बिहार के उद्योग विभाग ने केंद्र सरकार के सामने एक रणनीतिक व्यापार योजना पेश की थी। इसमें कहा गया था कि एमएसएमई क्षेत्र के सामने सबसे बड़ी चुनौतियां सस्ती ऋण सुविधा और बाजार से जुड़ाव की कमी हैं। अधिकारियों के अनुसार इस मदद की अपील पर केंद्र से उम्मीद के मुताबिक प्रतिक्रिया नहीं मिली। 

यह कहा जा सकता है कि उस समय राज्य सरकार के गठबंधन सहयोगी केंद्र के हिसाब से नहीं थे। बाद में जब राजनीतिक समीकरण बदले, तब भाजपा के नीतीश मिश्रा को उद्योग मंत्री बनाया गया, जिन्हें राज्य के उद्योग जगत का समर्थक माना जाता है। लेकिन वर्ष 2025 में बनी नीतीश कुमार सरकार में उन्हें जगह नहीं मिली। भाजपा ने जातीय समीकरणों को ध्यान में रखते हुए मधुबनी के एक ब्राह्मण नेता को मंत्री सूची से बाहर कर दिया।

इन सभी बातों से यह संकेत मिलता है कि अगर भाजपा बिहार में औद्योगीकरण और शहरीकरण को सामाजिक न्याय के साथ जोड़ना चाहती है, तो इसके समर्थक और नेतृत्व करने वाले लोग उसी सामाजिक आधार से आने चाहिए। भाजपा के लिए यह एक तरह से अस्तित्व से जुड़ा फैसला है। राज्य सरकार द्वारा कराई गई जाति जनगणना का भाजपा ने जिस तरह विरोध किया, वह भी इस दुविधा की कहानी बयां करता है।

इसके अलावा एक दूसरा विकल्प भी है, जो उतना ही जटिल और विवादास्पद है। वर्ष 2022 में जब भाजपा और जदयू सहयोगी थे तब नीतीश कुमार ने सार्वजनिक रूप से भाजपा की उस मांग को ठुकरा दिया था, जिसमें उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के मॉडल की तरह मस्जिदों से लाउडस्पीकर हटाने की बात कही जा रही थी। पूर्णिया में एक सार्वजनिक सभा में, जहां मंच पर भाजपा नेता शाहनवाज हुसैन भी मौजूद थे,  नीतीश ने कहा, ‘इन बेकार की बातों पर चर्चा मत कीजिए। बिहार में हम किसी भी समुदाय की धार्मिकता में कोई दखल नहीं देते। बिहार में हर व्यक्ति को अपने धर्म का पालन करने का पूरा अधिकार है।’

यह कोई अचानक बोली गई बात नहीं थी। भाजपा के पुराने नेता बताते हैं कि ऐसे कई मौके आए जब गठबंधन में रहते हुए भी नीतीश कुमार ने भाजपा के सामने खुलकर अपनी असहमति जताई।

हालांकि दूसरी ओर, उन्होंने भाजपा के वक्फ से जुड़े कानून का समर्थन किया और मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) पर भी कोई आपत्ति नहीं जताई। जदयू ने वर्ष 2019 और 2024 के लोक सभा चुनाव भाजपा के साथ गठबंधन में लड़े और उसे क्रमशः 6 फीसदी और 12 फीसदी मुस्लिम वोट मिले। आंकड़े बताते हैं कि जब जदयू साथ रहती है तब भाजपा भी मुस्लिम वोट का कुछ हिस्सा हासिल कर लेती है और अपना पारंपरिक समर्थन भी बनाए रखती है। लेकिन अगर भविष्य में नीतीश कुमार राजनीति में सक्रिय नहीं रहते, तब भी क्या यही स्थिति बनी रहेगी, यह कहना मुश्किल है।

ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यही है कि नीतीश कुमार की अनुपस्थिति में क्या भाजपा जदयू की तरह बनने की कोशिश करेगी? या फिर जदयू भाजपा की तरह होती जाएगी? यही सवाल विपक्ष भी अपने स्तर पर खुद से पूछ रहा है। – आदिति फडणीस

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