ऐसी सर्वदलीय बैठक के मायने और उसकी सार्थकता ही क्या है, जिसमें न तो प्रधानमंत्री मोदी और न ही नेता प्रतिपक्ष (लोकसभा) राहुल गांधी उपस्थित हों? ईरान युद्ध के बाद संकट वैश्विक है, कई देशों ने आपातकाल तक घोषित कर दिया है, पाबंदियां भी थोपी जा रही हैं और भारत भी प्रभावित है, लिहाजा ऐसी स्थिति में सरकार की ओर से जवाब कौन देगा? सत्ता और विपक्ष को सर्वदलीय बैठक में शिद्दत से तमाम मुद्दों पर विमर्श करना चाहिए था, लेकिन तृणमूल कांग्रेस ने बैठक का बहिष्कार किया, क्योंकि उसकी राजनीतिक लड़ाई भाजपा से है। यह बैठक भाजपा की नहीं थी, भारत सरकार ने बुलाई थी। नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी भी गैर-हाजिर रहे, जबकि वह दिल्ली में ही थे। संभव है कि माता जी सोनिया गांधी के अस्वस्थ होने के कारण वह न आए हों, लेकिन उन्हें बताना चाहिए था। नेता प्रतिपक्ष लोकतंत्र में ‘छाया प्रधानमंत्री’ माना जाता है। बहरहाल 2019 से एक देश, एक चुनाव, कोरोना वैश्विक महामारी, गलवान संघर्ष, मणिपुर तनाव एवं हिंसा, ‘ऑपरेशन सिंदूर’ जैसे विषयों पर सर्वदलीय बैठकें हो चुकी हैं, लेकिन प्रधानमंत्री मोदी एक भी बैठक में शामिल नहीं हुए। आखिर क्यों…? क्या प्रधानमंत्री मौजूदा व्यवस्था और संसदीय प्रणाली से भी ‘ऊपर’ और अति महत्वपूर्ण हैं? बेशक रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह बेहद अनुभवी राजनेता और मंत्री हैं। मौजूदा कैबिनेट में प्रधानमंत्री के बाद उन्हीं का स्थान है। रक्षा मंत्री समेत गृहमंत्री अमित शाह, विदेश मंत्री एस. जयशंकर, पेट्रोलियम मंत्री हरदीप पुरी और वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण बैठक में मौजूद थे। वे अपने-अपने मंत्रालयों से जुड़े सवालों के स्पष्टीकरण देने में सक्षम हैं। सवाल तो यह है कि क्या प्रधानमंत्री मोदी के पास सर्वदलीय बैठक के लिए भी ‘समय’ नहीं था अथवा यह ‘सर्वश्रेष्ठ होने का अहंकार’ था? नरेंद्र मोदी, अन्य 542 सांसदों की तरह, एक निर्वाचित सांसद हैं। एक संसदीय समूह ने उन्हें अपना नेता चुना था, जिसके आधार पर वह देश के प्रधानमंत्री बने। जनता प्रत्यक्ष तौर पर प्रधानमंत्री नहीं चुनती, लिहाजा उन्हें लोकतांत्रिक व्यवहार करना चाहिए।

वह किसी साम्राज्य के प्रमुख नहीं हैं। ऐसी बैठकों में विपक्ष को कई सवाल, कई जिज्ञासाएं व्यक्त करने का मौका मिलता है। यकीनन प्रधानमंत्री के पास व्यापक और अतिरिक्त जानकारियां भी होती हैं, क्योंकि खुफिया समेत तमाम एजेंसियां और कूटनीतिक स्रोत भी उन्हें ‘अपडेट’ देते रहते हैं, लिहाजा प्रधानमंत्री का जवाब, किसी अन्य मंत्री की तुलना में, ठोस और तार्किक होता है। देश भी ऐसे जवाबों से रूबरू होता है। प्रधानमंत्री मोदी ने संसद के दोनों सदनों में, अलग-अलग दिन, ईरान युद्ध से उपजे हालात और भारत की स्थितियों पर वक्तव्य दिए और वह संसद से चले गए। हम नहीं जानते कि संसद में ऐसे नियम हैं अथवा नहीं हैं, संवैधानिक व्यवस्था क्या है, लेकिन हमने चंद्रशेखर और अटल बिहारी वाजपेयी सरीखे प्रधानमंत्रियों को हर समय संसद के प्रति जवाबदेह देखा है। उन्होंने बेहद नाजुक और विवादित मुद्दों पर भी खुलकर जवाब दिए थे। प्रधानमंत्री के तौर पर डॉ. मनमोहन सिंह अधिकांश सर्वदलीय बैठकों में शामिल होते थे। हालांकि उन्हें ‘दुर्घटनावश प्रधानमंत्री’ करार दिया जाता था। मध्य-पूर्व, पश्चिम एशिया संकट पर ही प्रधानमंत्री मोदी संसद में ही उपस्थित क्यों नहीं रहे, ताकि विपक्ष उनसे सवाल कर सकता? प्रधानमंत्री, नेता प्रतिपक्ष और शेष विपक्ष के दरमियान बहुत गहरी खाई है, फासले हैं, उन्हें क्या नामकरण दिया जाए, हम नहीं जानते, लेकिन ये लोकतंत्र और देश के हित में नहीं हैं। बहरहाल बैठक में ब्रीफ किया गया कि देश में तेल-गैस पर्याप्त हैं, होर्मुज समुद्री मार्ग से ही कुछ और जहाज आ रहे हैं, लेकिन इसका जवाब नहीं दिया कि सडक़ों और पेट्रोल पंपों पर जो लंबी कतारें लगी हैं, उन्हें कब तक ‘अफवाह’ माना जाए? कच्चे तेल का इंडियन बास्केट 30 फीसदी महंगा हो गया है। रूस को हमने 60 मिलियन टन तेल का ऑर्डर बढ़े दामों पर दिया है।

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