अमरावती: महाराष्ट्र के ‘नक्सलवाद’ से मुक्त होने के बाद दक्षिण राज्य आंध्र प्रदेश में भी माओवाद का खात्म हो गया है। आंध्र प्रदेश के डीजीपी आंध्र प्रदेश के पुलिस महानिदेशक (डीजीपी) हरीश कुमार गुप्ता ने रविवार को घोषणा की कि अब राज्य में कोई भी भूमिगत कैडर नहीं बचा है। यह घोषणा विजयवाड़ा में वरिष्ठ माओवादी नेता चेलूरी नारायण राव के आत्मसमर्पण के बाद की गई।चेलूरी नारायण राव को ‘सोमन्ना’ के नाम से भी जाना जाता है। सोमन्ना को आंध्र-ओडिशा सीमा नेटवर्क से जुड़े अंतिम वरिष्ठ नेताओं में से एक माना जाता था। सोमन्ना ने केंद्र सरकार की डेडलाइन से ठीक एक दिन पहले आत्मसमर्पण कर दिया। केंद्र सरकार ने देश से नक्सलवाद को खत्म करने के लिए 31 मार्च, 2026 की डेडलाइन तय की थी। गौरतलब हो कि महाराष्ट्र के सीएम देवेंद्र फडणवीस पहले ही महाराष्ट्र के नक्सलवाद मुक्त होने का ऐलान कर चुके हैं। महाराष्ट्र में गढ़चिरौली जिला नक्सलवाद की चपेट में था।
अब नहीं बचे ज्यादा नक्सली
आंध्र प्रदेश और तेलंगाना पुलिस की रिपोर्ट के अनुसार दोनों तेलुगु राज्यों से नक्सलवाद लगभग खत्म हो चुका है। नवंबर 2025 में एक विशेष अभियान के दौरान माओवादी कमांडर मदवी हिडमा मारा गया; उसे बस्तर क्षेत्र के सबसे वांछित गुरिल्ला नेताओं में से एक माना जाता था। यह घटना आंध्र प्रदेश के ASR जिले में चलाए जा रहे एक माओवाद-विरोधी अभियान के दौरान हुई थी।हिडमा की मौत के बाद आंध्र प्रदेश पुलिस ने एक बड़ा अभियान चलाया और पांच अलग-अलग जिलों से 50 माओवादी कार्यकर्ताओं को गिरफ्तार किया। ये गिरफ्तारियां कृष्णा, एलुरु, एनटीआर, काकीनाडा और कोनासीमा जिलों, तथा विजयवाड़ा में की गई थीं।
क्या है तेलंगाना पुलिस का दावा?
तेलंगाना में पुलिस का दावा है कि माओवादी आंदोलन अब अपने अंत के करीब है। उनका कहना है कि राज्य के केवल 11 माओवादी ही अभी भी भूमिगत हैं। इनमें से केवल एक या दो ही सशस्त्र अभियानों में सक्रिय रूप से शामिल हैं। इससे पहले डीजीपी बी. शिवधर रेड्डी ने बताया था कि शेष भूमिगत कैडरों में सीपीआई (माओवादी) के पूर्व प्रमुख मुप्पाला लक्ष्मण राव भी शामिल हैं, जिन्हें ‘गणपति’ के नाम से जाना जाता है। हालांकि पुलिस का मानना है कि तेलंगाना के मूल निवासी जो अभी भी बचे हैं, उनमें से अधिकांश अब सक्रिय नहीं हैं। तेलंगाना पुलिस के सूत्रों से संकेत मिलता है कि अब तेलंगाना से केवल एक क्षेत्रीय समिति सदस्य और एक वरिष्ठ ‘राज्य समिति पदाधिकारी’ ही सक्रिय हैं। बाकी या तो निष्क्रिय हो चुके हैं, उम्रदराज हो गए हैं।
आंध्र प्रदेश को किया रक्तरंजित
एनडीटीवी की रिपोर्ट के अनुसार नक्सलवाद का पतन उस हिंसक अध्याय के अंत का संकेत है जिसने अविभाजित आंध्र प्रदेश को लगभग पांच दशकों तक प्रभावित किया। इस आंदोलन को सबसे पहले तेलंगाना में ही बल मिला, और इसका पहला बड़ा मोड़ आदिलाबाद में आया। जहां ‘पीपुल्स वॉर ग्रुप’ ने अपना पहला बारूदी सुरंग विस्फोट किया था। 1980 के दशक के मध्य तक, माओवादी हिंसा वारंगल, करीमनगर और आदिलाबाद तक फैल चुकी थी। 1986 में वारंगल जिले में काजीपेट के सब-इंस्पेक्टर यादगिरी रेड्डी की हत्या कर दी गई। वे तत्कालीन आंध्र प्रदेश में विद्रोहियों द्वारा मारे जाने वाले पहले पुलिस अधिकारी बने। तब मुख्यमंत्री एन.टी. रामाराव ने 1989 में विशिष्ट ‘ग्रेहाउंड्स’ बल की स्थापना की।

