प्रभु चावला

भारतीय लोकतंत्र के थिएटर में तमिलनाडु, असम, पश्चिम बंगाल, पुडुचेरी और केरलम के चुनाव भाजपा, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृह मंत्री अमित शाह के लिए निर्णायक परीक्षा बनकर उभरे हैं. ये कोई साधारण राज्यस्तरीय मुकाबले नहीं हैं. ये केंद्र की सत्ताधारी व्यवस्था द्वारा राजनीतिक पूंजी, संसाधन और जनशक्ति के एक विशाल निवेश का प्रतिनिधित्व करते हैं.

वरिष्ठ कैबिनेट मंत्री, एक दर्जन से अधिक मुख्यमंत्री, 250 से अधिक सांसद और लगभग दस हजार पार्टी कार्यकर्ताओं को घर-घर अभियान के लिए तैनात किया गया है, जिसने इन युद्धक्षेत्रों को राष्ट्रीय अखाड़े के विस्तार में बदल दिया है. मोदी और शाह के लिए यह अभ्यास जितना रणनीतिक है, उतना ही व्यक्तिगत भी.

यह इस बात की परीक्षा है कि क्या उनके दशक भर के प्रभुत्व की गति बरकरार रखी जा सकती है, या 2024 के लोकसभा चुनाव के नतीजे, जहां भाजपा पूर्ण बहुमत से चूक गई थी, किसी गहरी और बेचैन करने वाली राजनीतिक लहर का संकेत दे रहे हैं? असम में, भाजपा के नेतृत्व वाला एनडीए 2016 और 2021 की जीत के बाद लगातार तीसरे ऐतिहासिक कार्यकाल की तलाश में है,

ताकि पूर्वोत्तर में अपनी मजबूत पकड़ बनाए रखने के साथ सुशासन का निरंतर सिलसिला पेश किया जा सके. पुडुचेरी में गठबंधन अपने एनडीए सहयोगी के माध्यम से सत्ता बरकरार रखने का लक्ष्य बना रहा है, ताकि केंद्र शासित प्रदेश में उपस्थिति और मजबूत हो. तमिलनाडु में अन्नाद्रमुक के साथ मजबूत गठबंधन बनाकर भाजपा स्टालिन की द्रमुक सरकार को झटका देने की तैयारी में है.

केरल भाजपा के लिए एक कठिन क्षेत्र रहा है और वहां पार्टी करीब आधा दर्जन सीटों पर नजर गड़ाए हुए है, ताकि वाम और कांग्रेस के मजबूत क्षेत्रीय गढ़ों में सांकेतिक, पर महत्वपूर्ण सेंध लगाई जा सके. और प. बंगाल में ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस को सत्ता से बेदखल करना सबसे बड़ा पुरस्कार होगा. मोदी और शाह के लिए प. बंगाल व्यक्तिगत प्रतिष्ठा का विषय बन गया है.

वर्ष 2019 में भाजपा की बड़ी सफलता के बाद दोनों ने पश्चिम बंगाल में भारी राजनीतिक पूंजी निवेश किया था. वर्ष 2021 के चुनाव में भाजपा 2016 की तीन सीटों और करीब 10 प्रतिशत वोट से नाटकीय रूप से बढ़कर 77 सीटों और करीब 39 फीसदी वोट तक पहुंच गई थी. फिर भी वह सत्ता से काफी दूर रह गई, क्योंकि तृणमूल ने 200 से अधिक सीटों और 48 फीसदी वोटों के साथ प्रचंड जीत हासिल की.

इस साल हो रहे चार राज्यों और एक केंद्र शासित प्रदेश के चुनावी नतीजों से उभरने वाले परिदृश्य तात्कालिक शासन और 2029 की लंबी राह, दोनों पर दूरगामी प्रभाव डालेंगे. भाजपा के लिए सबसे अनुकूल परिणाम यह होगा : असम और पुडुचेरी में अपनी सत्ता बरकरार रखना, पश्चिम बंगाल में 100 का आंकड़ा पार करना, केरल में विश्वसनीय बढ़त हासिल करना और तमिलनाडु में पैठ बनाना.

ऐसा प्रदर्शन नरेंद्र मोदी की अजेय छवि को और चमका देगा. मोदी की छवि एक ऐसे नेता की है, जिसने आर्थिक उथल-पुथल, वैश्विक बदलावों और घरेलू परिवर्तन के बीच दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र को अपनी अचूक चुनावी सूझबूझ से आगे बढ़ाया है. इससे अमित शाह की भी और दमदार छवि बनेगी,

जिन्होंने भाजपा को एक क्षेत्रीय दावेदार से सदस्यता के मामले में दुनिया की सबसे बड़ी राजनीतिक पार्टी बनाने की योजना तैयार की. देश के ज्यादातर राज्यों में सत्ता हासिल करने के बाद सत्तारूढ़ गठबंधन महत्वपूर्ण संवैधानिक संशोधनों पर विचार कर सकता है, संघीय शक्ति के संतुलन को पुनर्गठित कर सकता है, संस्थागत सुधारों को गति दे सकता है.

शासन के अधिक केंद्रीकृत मॉडल को मजबूत कर सकता है. प्रधानमंत्री मोदी सरकार और पार्टी संगठन में व्यापक फेरबदल शुरू कर सकते हैं और पुरानी संरचना में नई ऊर्जा फूंकने के लिए युवा पीढ़ी को शामिल कर सकते हैं. मुख्यमंत्रियों को बदला जा सकता है और आर्थिक आत्मनिर्भरता तथा सांस्कृतिक मुखरता को प्राथमिकता देने के लिए शासन मॉडल को पुनर्गठित किया जा सकता है.

तब 2029 की राष्ट्रीय रणनीति को एक विजय यात्रा के रूप में लिखा जाएगा. भारत के अजेय उत्थान की इस कहानी में विकास, कूटनीति और सभ्यतागत आत्मविश्वास को सहजता से बुना जाएगा, आर्थिक नीति निर्णायक रूप से त्वरित उदारीकरण की ओर झुकेगी. वैचारिक मोर्चे पर, सांस्कृतिक राष्ट्रवादी परियोजना गति पकड़ेगी,

जिससे पार्टी दक्षिण और पूर्व में गठबंधन प्रबंधन के माध्यम से अपने हिंदी भाषी गढ़ से आगे बढ़ने में सक्षम होगी. इसके विपरीत एक खराब प्रदर्शन- असम में हार, पश्चिम बंगाल में ठहराव, केरल में शून्य, तमिलनाडु में नगण्य लाभ और पुडुचेरी का हाथ से निकल जाना-2024 के झटके के बाद दूसरे बड़े बदलाव को जन्म देगा.

यह सत्तारूढ़ गठबंधन के अजेय होने का नैरेटिव तोड़ देगा और मोदी-शाह को क्षेत्रीयता, सत्ता-विरोधी लहर और भारतीय राजनीतिक संस्कृति की विविधता का सामना करने के लिए छोड़ देगा. इससे चुनावी जीत और प्रभावी शासन की उनकी साख में गिरावट आएगी और 2029 की चुनावी रणनीति को वैचारिक कट्टरता से हटकर व्यावहारिक गठबंधन-निर्माण, केंद्रीकृत सुधारों से नपे-तुले कल्याणकारी लोक लुभावनवाद और आक्रामक संदेशों से अधिक बहुलवादी स्वर की ओर मुड़ना होगा, जो कि द्रविड़, वामपंथी और क्षेत्रीय संवेदनाओं को समाहित कर सके.

तब एनडीए सहयोगी अधिक रियायतों की मांग करेंगे, जिससे 2029 का चुनाव राज्याभिषेक के बजाय ‘समझौता’ बनकर रह जाएगा. वैसे में, भाजपा और संघ के भीतर सामूहिक नेतृत्व की वकालत करने वाली आवाजें तेज हो सकती हैं. इतिहास इस संबंध में गंभीर समानता पेश करता है.

जवाहरलाल नेहरू के निरंतर चुनावी प्रभुत्व ने उन्हें धर्मनिरपेक्ष लोकतंत्र और गुटनिरपेक्षता को इतनी गहराई से स्थापित करने की अनुमति दी कि उन्होंने दशकों तक भारत की छवि को परिभाषित किया. इंदिरा गांधी की 1971 की भारी जीत ने बैंकों के राष्ट्रीयकरण से लेकर अभूतपूर्व केंद्रीकरण तक व्यापक बदलाव किए, जिसने आर्थिक और सामाजिक परिदृश्य को हमेशा के लिए बदल दिया.

मोदी और शाह समान मोड़ पर खड़े हैं. सांस्कृतिक राष्ट्रवाद, आर्थिक आधुनिकीकरण और मुखर कूटनीति में निहित उनकी परियोजना ने भारत के व्याकरण को पहले ही बदल दिया है. ये चुनाव केवल क्षेत्रीय मुकाबले नहीं हैं. ये 2024 के लोकसभा चुनाव के बाद पहली बड़ी चुनावी गणना हैं, जो 2029 की नींव रखेंगे.

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