दुष्कर्म पीड़िताओं को इस बात के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता है कि वह अपने बच्चे को जन्म दें. बच्चे को जन्म देना पीड़िताओं के लिए आजीवन दर्द झेलने के बराबर है. यह टिप्पणी करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने एम्स की याचिका को खारिज कर दिया.

Supreme Court : सुप्रीम कोर्ट ने एम्स के उस क्यूरेटिव पिटीशन को खारिज कर दिया, जिसमें कोर्ट से यह अपील की गई थी कि वह अपने 24 अप्रैल के उस फैसले को बदल दे, जिसमें कोर्ट ने 15 वर्षीय लड़की को अपने 30 सप्ताह की गर्भावस्था को समाप्त करने की अनुमति दी थी. चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्या बागची की बेंच ने एम्स के डॉक्टरों की तरफ से पेश एडिशनल सॉलिसिटर जनरल ऐश्वर्या भाटी से कहा कि वे नाबालिग बच्ची की प्रेग्नेंसी के बारे में उसके माता-पिता से बात करें और यह उन पर छोड़ दें नाबालिग-पीड़ित अपनी प्रेग्रेंसी को रखना चाहती है या नहीं.

गर्भपात करना अब मुश्किल : एम्स

एम्स के डॉक्टरों ने कोर्ट में यह तर्क दिया कि चूंकि प्रेग्नेंसी के 30 हफ्ते हो चुके हैं, इसलिए भ्रूण अब जिंदा रहने लायक है और इसे खत्म करना सफल नहीं होगा. बच्चा गंभीर बीमारियों, ऑर्गन फेलियर के साथ पैदा होगा और नाबालिग पीड़िता को भी आजीवन दिक्कतें होंगी. संभव है कि वह जीवन में दूसरा बच्चा पैदा ना कर पाए.

बच्चे को जन्म देना, पीड़िता के लिए दर्दनाक

एम्स के तर्क पर कोर्ट ने कहा कि यह मामला बहुत दर्दनाक है. बच्ची एक रेप विक्टिम है. अगर उसे प्रेग्नेंसी से गुजरना पड़ा, तो उसे अपनी जिंदगी के हर दिन ट्रॉमा झेलना पड़ेगा.जिस उम्र में उसे एक अच्छी जिंदगी जीने की ख्वाहिशें होनी चाहिए,वह दर्द झेलेगी. कोर्ट ने सख्ती से कहा कि वह उसे मां बनने के लिए मजबूर नहीं कर सकता. कोर्ट ने यह भी कहा कि बच्चों के रेप के मामलों में, प्रेग्नेंसी को बनाए रखने या खत्म करने का फैसला हमेशा विक्टिम का होना चाहिए. कोर्ट ने मीडिया को नसीहत दी कि वह केस की रिपोर्टिंग करते समय सेंसिटिव रहें और इस सुनवाई की हर एक बात को रिकॉर्ड न करें क्योंकि यह केस रेप की नाबालिग विक्टिम से जुड़ा है. कोर्ट ने केंद्र सरकार से कहा कि वह कानून में संशोधन करने पर विचार करे, ताकि बलात्कार पीड़िताओं को 20 हफ्तों के बाद भी अवांछित गर्भ को समाप्त करने की अनुमति मिल सके.साथ ही यह सुनिश्चित हो सके कि ऐसे दुष्कर्म के मामले में मुकदमे की सुनवाई एक सप्ताह के भीतर पूरी हो जाएं.

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