आचार्य चाणक्य ने अपने नीति शास्त्र में मनुष्य की कई अवस्थाओं के बारे में वर्णन किया है. वो एक श्लोक के माध्यम से बताते हैं कि मनुष्य के लिए ज्ञान और भोजन भी विष के समान हो सकता है. कैसे…. आइए जानते हैं इस श्लोक और उसके भावार्थ में…
अनभ्यासे विषं शास्त्रमजीर्णे भोजनं विषम।
दरिद्रस्य विषं गोष्ठी वृद्धस्य तरुणी विषम।।
आचार्य चाणक्य कहते हैं कि बिना अभ्यास के शास्त्र विष के समान हो जाता है. अजीर्ण में भोजन करना भी विष के समान है और दरिद्र के लिए सभा विष के समान है. इस श्लोक में चाणक्य बताते हैं कि ज्ञानी व्यक्ति को हमेशा अपने ज्ञान का अभ्यास करते रहना चाहिए. वो कहते हैं कि जिस प्रकार अच्छे से अच्छा खाना भी बदहजमी में खाया जाए तो लाभ की जगह हानि ही होती है, उसी प्रकार शास्त्र का ज्ञान भी निरन्तर अभ्यास न करने से मनुष्य के लिए घातक साबित हो सकता है. चाणक्य कहते हैं कि अगर कोई भी व्यक्ति बिना अभ्यास किए खुद को शास्त्रों का ज्ञाता बताता है तो भविष्य में उसे पूरे समाज के सामने अपमानित होना पड़ सकता है. साथ ही चाणक्य कहते हैं कि जिस व्यक्ति में दरिद्रता है, उसके लिए सभा या उत्सव आदि बेकार ही रहते हैं. यानी धनी और बड़े लोगों के बीच किसी भी स्वाभिमानी व्यक्ति को नहीं जाना चाहिए. क्योंकि उनके बीच कई बार गरीब व्यक्ति को नीचता की नजर से देखा जाता है जिसके कारण उसे अपमानित होना पड़ता है. व्यक्ति को भूख न हो तो छप्पन भोग भी उसके लिए विष के समान होता है, क्योंकि भरे पेट में खाने पर स्वास्थ्य खराब हो जाता है और मृत्यू तक हो सकती है.

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