यह भारतीय राजनीति का सबसे नाजुक दौर है। विपक्ष के लिए तो अग्नि-परीक्षा का समय है, लिहाजा बंगाल का ‘केसरिया जनादेश’ क्यों जरूरी था, अब यह समझ में आ रहा है। ‘वॉशिंगटन पोस्ट’, ‘द इकोनॉमिस्ट’, ‘वॉल स्ट्रीट जनरल’ सरीखे अमरीकी मीडिया में विश्लेषण छप रहे हैं कि भारत में प्रधानमंत्री मोदी को जो जनादेश मिले हैं, जितनी संख्या में वोट दिए गए हैं, वे वाकई अद्वितीय हैं। अर्थात किसी अन्य विश्व-नेता को इतने जनादेश हासिल नहीं हैं। इन विश्लेषणों के ये निष्कर्ष भी दिए गए हैं कि भारत ‘एकदलीय’ लोकतंत्र की ओर बढ़ रहा है। यह निष्कर्ष बिल्कुल गलत है, क्योंकि अब भी कई राज्यों में भाजपा ‘नगण्य’ है और वहां विपक्ष की सरकारें हैं। बहरहाल बंगाल के शपथ-ग्रहण समारोह के मंच से दो बिंब आंखों में ही बस गए हैं। प्रधानमंत्री मोदी ने भाजपा के सबसे बुजुर्ग और पुराने कार्यकर्ता, 98 वर्षीय माखन लाल सरकार के पांव छुए और फिर उन्हें शॉल ओढ़ा कर गले लगा लिया। कितना संस्कारी और प्रेरक संदेश अभिव्यक्त हुआ होगा? माखनलाल ‘जनसंघ’ के संस्थापक और सर्वप्रथम नेहरू कैबिनेट में उद्योग-वाणिज्य मंत्री रहे डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी के सहयोगी रहे हैं। उनके ‘कश्मीर आंदोलन’ के सहभागी रहे हैं और वहां ‘तिरंगा’ फहराने के कथित अपराध में उन्हें गिरफ्तार भी किया गया था। यह बिंब इतिहास और वर्तमान के संगम को साफ करता है। चूंकि बंगाल में पहली बार ‘केसरिया सत्ता’ हासिल हुई है, लिहाजा ऐतिहासिक क्षण थे, लिहाजा भाजपा के बहुत पुराने चेहरों को भी याद किया गया। इसके अलावा, प्रधानमंत्री मोदी ने मंच पर ही दंडवत प्रणाम कर बंगाल की जनता का आभार जताया कि उसकी बदौलत ही ‘भगवा सरकार’ आज सामने है। यह है भारत के लोकतंत्र की ताकत! ममता बनर्जी भी आत्मचिंतन कर रही होंगी! यह प्रधानमंत्री मोदी की ‘विशुद्ध राजनीति’ हो सकती है, लेकिन हमने चार दशक से अधिक की पत्रकारिता के दौरान किसी अन्य प्रधानमंत्री को ऐसी मुद्रा में नहीं देखा। आखिर वे भी राजनीति के जरिए ही प्रधानमंत्री बने थे।

बहरहाल अब हालात ये हैं कि तृणमूल कांग्रेस के 14-15 सांसद ही गायब बताए जा रहे हैं। वे चुनाव में बिल्कुल निष्क्रिय रहे। यही नहीं, कुछ नवनिर्वाचित विधायकों ने ही ‘दीदी’ को आंख दिखाना शुरू कर दिया है। सवाल है कि चुनावी पराजय के बाद तृणमूल क्या बिखराव के मुहाने पर है? तृणमूल का बिखराव या टूटन अपनी जगह है, लेकिन विपक्ष का ‘इंडी’ गठबंधन आज कहां है? तमिलनाडु में द्रमुक की पराजय क्या हुई कि उसके गठबंधन में ‘सत्ता की मलाई’ चाटने वाले घटक-कांग्रेस, सीपीआई, सीपीएम, वीसीके, आईयूएमएल आदि-छलांग लगा कर, पाला बदल कर, ‘टीवीके’ के समर्थन में चले गए। द्रमुक अध्यक्ष एवं पूर्व मुख्यमंत्री स्टालिन ने इसे पीठ में छुरा घोंपने वाला विश्वासघात करार दिया है। यही नहीं, लोकसभा में द्रमुक सांसद कनिमोई ने स्पीकर ओम बिरला को पत्र लिख कर आग्रह किया है कि उनकी सीटें बदल दी जाएं, क्योंकि अब कांग्रेस के साथ उनका गठबंधन नहीं रहा। सवाल है कि ‘इंडी’ गठबंधन हमेशा ताश के पत्तों की तरह बिखरा हुआ क्यों रहता है? बेशक उद्धव ठाकरे की शिवसेना हो या हेमंत सोरेन का झामुमो अथवा केजरीवाल की आम आदमी पार्टी और चुनाव तक ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस रही हो, सभी नेता विरोधाभासी, एक-दूसरे के खिलाफ आरोपिया बयान देते रहे हैं। अक्सर चुनाव भी साथ-साथ नहीं, एक-दूसरे के खिलाफ, लड़ते रहे हैं। फिर ‘इंडी’ का राग क्यों अलापा जाता रहा है? ‘इंडी’ नेताओं की गाहे-बगाहे बैठकें तो होती हैं, लेकिन वे आपस में ही खाई खोदते रहे हैं। ‘इंडी’ का कोई संयोजक नहीं, कोई सचिवालय नहीं, साझा न्यूनतम कार्यक्रम नहीं, अलबत्ता मोदी-विरोध के मुद्दे पर उनकी बांहें हवा में लहराती रही हैं। यदि यही स्थिति रही, तो 2029 के लोकसभा चुनाव का बिंब स्पष्ट दिखाई दे रहा है। तब तक आधी पार्टियां जेल में होंगी और आधी पार्टियां समझौता कर भाजपा-एनडीए में विलीन हो चुकी होंगी। लिहाजा अभी वक्त है कि विपक्ष को सबक सीखना चाहिए।

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