सादगी? यह क्या है? जॉर्ज ऑरवेल के दूसरों से ज्यादा बराबर वाले भारत के माहौल में, यह शब्द खोखला लगता है। इसलिए, जब प्रधानमंत्री मोदी ने हाल ही में देशभक्ति के नाम पर भारतीयों से आग्रह किया कि वे विकसित भारत 2047 में सार्वजनिक परिवहन या कार पूल का इस्तेमाल करके, स्वदेशी अपनाकर, सोना खरीदने से बचकर, विदेश यात्रा को न कहकर आदि तरीकों से संयम को फिर से अपनाएं, तो दो अलग-अलग दर्दनाक यादें ताजा हो गईं- लॉकडाऊन के दिन और उदारीकरण से पहले का दौर। मुख्य रूप से इसलिए, क्योंकि महात्मा गांधी के जमाने से ही सादगी और खर्च में कटौती भारतीय राजनीति का ऑप्रेटिंग सिस्टम रही है।
याद है, कवयित्री और स्वतंत्रता सेनानी सरोजिनी नायडू की मशहूर टिप्पणी-‘अफसोस गांधी को गरीब बनाए रखने में बहुत खर्च आता है!’ जिसमें, ट्रेन के पूरे डिब्बे बुक करना और दूध के लिए शांत स्वभाव वाली बकरियां लाना शामिल था, ताकि उनकी खाने-पीने की खास और अनोखी जरूरतों को पूरा किया जा सके। हमारे पहले प्रधानमंत्री नेहरू ने एक भूखे गणराज्य से खाना बचाने को कहा। उनके बाद आए शास्त्री ने एक वक्त का खाना छोडऩे का उपदेश दिया, जब इंटरमिटैंट फासिं्टग (बीच-बीच में भूखा रहना) और दिन में एक बार खाना सिर्फ खान-पान के नए चलन नहीं थे, बल्कि कड़वी सच्चाइयां थीं। इंदिरा ने जबरदस्ती की सादगी को अनुशासन में बदल दिया। सरकार कीमतों, जमाखोरों और आखिर में हर चीज पर नजर रखने लगी। और यहीं पर असली दिक्कत थी। त्याग करने की अपीलें आम बात थीं, क्योंकि खुद को सुख-सुविधाओं से दूर रखना राष्ट्र-निर्माण का एक जरूरी हिस्सा था। नागरिकों ने चावल, सोना या रात का खाना छोड़ दिया क्योंकि गणराज्य अभी भी बनने की प्रक्रिया में था। यह राशन कार्ड, रेडियो पर दिए गए भाषणों और इस भरोसे से जुड़ा हुआ था कि आने वाला कल आज की मुश्किलों को सही साबित करेगा। आज, उपभोग (खर्च करना) ही इस बात का सबूत बन गया है कि गणराज्य अब पूरी तरह से स्थापित हो चुका है। पैट्रोल, सोना, विदेश में छुट्टियां मनाना, तुरंत सामान मंगाने वाली सेवाएं और डैस्टिनेशन वैडिंग-अब इन्हें सिर्फ विलासिता नहीं माना जाता, ये अब जरूरतें बन गई हैं।
दुख की बात है कि मोदी का विकसित भारत 2047 का सपना जमीन पर आ गिरा है और इसमें उनकी कोई गलती नहीं है। अच्छे दिन लाने का उनका वादा अब ठंडे बस्ते में चला गया है। लेकिन हमारे नेताओं का दोगलापन तो देखिए। सादगी बरतने की अपील अक्सर हमारे राजनीतिक और सरकारी अधिकारियों के लिए मिलने वाली खुली सुख-सुविधाओं के साथ-साथ चलती है, जिससे ऐसे उपाय खोखले लगने लगते हैं। खासकर तब, जब हम सुरक्षाकर्मियों के बड़े-बड़े काफिले और 30 मिनट से भी ज्यादा समय तक लगे रहने वाले ट्रैफिक जाम देखते हैं। जब प्रधानमंत्री ने अपने काफिले का आकार आधा कर दिया, तो उनके कुछ मातहत मंत्रियों ने भी स्कूटर पर पीछे बैठकर सफर किया, किसी ने ई-रिक्शा लिया, तो किसी ने साइकिल चलाई। यह दिखाने के लिए कि वे देशभक्ति की खातिर अपनी आलीशान और खर्चीली जीवनशैली को छोड़कर सादगी अपना रहे हैं। इससे कोई फर्क नहीं पड़ा कि उनके सुरक्षाकर्मी आम राहगीरों को यह कहकर जोर-जोर से हटा रहे थे कि मंत्री जी साइकिल चला रहे हैं। और यह सब, सिर्फ एक फोटो खिंचवाने के लिए किया गया।
टैक्स देने वालों को हर साल 60 करोड़ रुपए का अतिरिक्त खर्च उठाना पड़ता है, ताकि ये लोग लुटियंस दिल्ली के पॉश इलाके में 5 एकड़ में फैले अपने आलीशान, सात-सितारा बंगलों में रह सकें। यही नहीं, हमारे जन सेवकों के पास पुलिस वालों की पूरी एक बटालियन होती है, जो उन्हें उसी जनता से बचाती है, जिसकी सेवा करने का वे दावा करते हैं! हैरानी की बात यह है कि देश की पूरी पुलिस फोर्स का 50 प्रतिशत हिस्सा सिर्फ 2,500 वी.आई.पी. लोगों की सुरक्षा में लगा हुआ है और यह उस देश में हो रहा है, जहां शायद दुनिया में सबसे कम प्रति व्यक्ति पुलिस सुरक्षा उपलब्ध है (यानी 1 लाख लोगों पर सिर्फ 10 हथियारबंद पुलिसकर्मी)।
यह सच है कि मोदी ने वी.आई.पी. संस्कृति पर लगाम लगाने के लिए गाडिय़ों पर लगी लाल बत्तियां हटवा दी थीं लेकिन फिर भी, उनके काफिले और ट्रैफिक रुकवाने का सिलसिला आज भी एक अघोषित विशेषाधिकार के तौर पर जारी है। यह सार्वजनिक संसाधनों के दुरुपयोग और अभिजात्य वर्ग के अपने ही दायरे में सिमटे रहने की धारणा को और मजबूत करने का एक स्पष्ट संकेत है। हमने गाडिय़ों से लाल बत्ती तो हटा दी, लेकिन अपने मन से वह वी.आई.पी. मानसिकता नहीं हटा पाए। इस तरह, हम सुप्रीम कोर्ट के उस फैसले की धज्जियां उड़ा रहे हैं, जिसमें कोर्ट ने कहा था- वी.आई.पी. सुरक्षा एक बेहद आपत्तिजनक चीज है। यह और कुछ नहीं, बल्कि सिर्फ एक रुतबे का प्रतीक है। यह एक शर्मनाक विसंगति है कि जहां सड़कों पर आम आदमी मारे जा रहे हैं और बुजुर्गों का गला घोंटा जा रहा है, वहीं राजनेता टैक्स देने वालों के पैसे पर इतनी ज्यादा सुरक्षा का मजा ले रहे हैं।
मुख्यत:, समस्या का एक हिस्सा यह है कि नागरिकों को कटौती स्वीकार करने के लिए कहा जाता है, लेकिन शीर्ष स्तर पर अनुपातिक संयम नहीं दिखता। जब मितव्ययिता का उपदेश दिया जाता है, तो अभिजात वर्ग के आराम पर होने वाला स्पष्ट खर्च विरोधाभासी लगता हैं। ये मुद्दे आम आदमी के मन में कड़वाहट पैदा करते हैं। पहले से ही आसमान छूती कीमतों, घटते बजट और बढ़ती बेरोजगारी से जूझ रहे आम आदमी के लिए यह एक सवाल खड़ा करता है कि क्या सत्ता के प्रतीक हमारे संविधान में निहित गणतंत्रवाद की मूल विशेषता के विपरीत नहीं हैं? दुर्भाग्य से, भाजपा, कांग्रेस या अन्य किसी भी सत्ताधारी दल के पास मितव्ययिता लागू करने या वी.आई.पी. संस्कृति को समाप्त करने का कोई ठोस कारण नहीं है, क्योंकि भारतीय राजनीति में रुतबा ही सत्ता का प्रतीक है और संरक्षण तंत्र विशेषाधिकारों और सुविधाओं पर निर्भर करते हैं। परिणामस्वरूप, मितव्ययिता, जिसमें सामूहिक त्याग की आवश्यकता होती है, को पदानुक्रमित विशेषाधिकारों को समाप्त करने के अनुरूप होना होगा। तब तक संदेह बना रहेगा।
प्रशासनिक अक्षमताएं, राजनीतिक उद्देश्यों से प्रेरित सब्सिडी और बुनियादी ढांचे पर अत्यधिक खर्च जैसे बड़े मुद्दों पर शायद ही कभी उतनी ही तत्परता से ध्यान दिया जाता है। तो, ऐसे माहौल में जहां सादगी और मितव्ययिता हमारी राजनीति के लिए एक कोरी कल्पना जैसी है, हम किस तरह की बचत की बात कर रहे हैं? असली मुद्दा मितव्ययिता नहीं, बल्कि असमानता है। अब समय आ गया है कि सरकार अपने खुद के खर्चों में कटौती करे। जैसा कि एक पूर्व वित्त मंत्री ने दबी जबान में कहा था, सरकार के एजैंडे में शामिल एक-तिहाई मदों को बिना किसी को पता चले ही हटाया जा सकता है। इसके साथ ही, कई ऐसे सरकारी विभाग और पद भी हैं, जिनकी कोई जरूरत नहीं है, और उनमें भी कटौती की जा सकती है। इसका एक जीता-जागता उदाहरण देखें, राजधानी दिल्ली में एन.डी.एम.सी. इलाके का दौरा करने पर ऐसा लगता है मानो आप किसी ‘स्लंबर पार्टी’ (रात भर चलने वाली मौज-मस्ती की पार्टी) में आ गए हों, जहां जो लोग जाग रहे हैं, वे बस गप्पें मारते हुए चाय पी रहे हैं।
निष्कर्ष यह है कि संदेश और वास्तविकता के बीच का यही अंतर उस भावना को हवा देता है कि कुछ लोग दूसरों से ज्यादा बराबर हैं (यानी कुछ लोग दूसरों से ज्यादा विशेषाधिकार प्राप्त हैं)। अब समय आ गया है कि हमारे ऊंचे और ताकतवर लोग (नेता) उस खतरे को पहचानें जो बिल्कुल करीब ही मंडरा रहा है और वास्तविकता को स्वीकार करें। क्या हमारे नेता खुद भी उस मितव्ययिता का पालन करेंगे, जिसका वे दूसरों को उपदेश देते हैं?-पूनम आई. कौशिश

