यू.ए.पी.ए. जैसे कड़े कानून के तहत गिरफ्तार आरोपियों को जमानत देने पर सुप्रीम कोर्ट की विभिन्न बैंचों द्वारा लिए गए विरोधाभासी रुख के कारण कानून की व्याख्या को लेकर भ्रम पैदा हो गया है और देश की सर्वोच्च अदालत की एक बड़ी बैंच द्वारा इसे स्पष्ट करने की आवश्यकता है। जहां यांत्रिक निरंतरता को न्यायिक व्याख्या की जगह नहीं लेनी चाहिए, और प्रत्येक मामले का निर्णय योग्यता के आधार पर किया जाना चाहिए, वहीं कुछ बुनियादी सिद्धांतों को बनाए रखना आवश्यक है। आदर्श रूप से आरोप जितने अधिक गंभीर होते हैं, ट्रायल उतना ही तेज होना चाहिए।

राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (एन.सी.आर.बी.) के आंकड़ों के अनुसार, 2019 और 2023 के बीच पांच वर्षों में यू.ए.पी.ए. के तहत देशव्यापी दोषसिद्धि दर 2 से 6 प्रतिशत के बीच है यानी, राष्ट्रीय स्तर पर ऐसे मामलों में बरी होने की संभावना 94 से 98 प्रतिशत है। जम्मू और कश्मीर में, दोष सिद्धि दर एक प्रतिशत से कम रही है। सार्वजनिक भाषणों में, न्यायाधीश अक्सर इस कहावत को दोहराते हैं। ‘जमानत नियम है, जेल अपवाद है,’ जैसा कि पूर्व सीजे डी.वाई. चंद्रचूड़ ने 2024 में, पद छोडऩे से कुछ दिन पहले किया था। लेकिन न्यायपालिका ने सिर्फ इतना ही नहीं करना है। खासकर उन मामलों में जिनमें राज्य के दुरुपयोग के खिलाफ मौलिक स्वतंत्रता की सुरक्षा शामिल है, कोर्ट को खुद की सुननी चाहिए, और अपनी बेहतर सहज प्रवृत्तियों का पालन करना चाहिए।

जम्मू और कश्मीर में एक नार्को-आतंकवाद मामले में एक व्यक्ति को जमानत देते हुए, जिसमें वह 5 साल से यू.ए.पी.ए. के तहत विचाराधीन कैदी के रूप में जेल में था, सुप्रीम कोर्ट ने इस सप्ताह की शुरूआत में दोहराया कि आतंक के मामलों में भी कड़े जमानत प्रावधानों की सख्ती ‘पिघल जाएगी’ जब लंबी कैद और विलंबित ट्रायल संविधान के अनुच्छेद 21, जो व्यक्ति के जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार की गारंटी देता है, का उल्लंघन करते हैं।

जस्टिस बी.वी. नागरत्ना और उज्ज्वल भुयान की पीठ ने भी सुप्रीम कोर्ट की एक अन्य बैंच द्वारा इस नियम के विचलन को उजागर किया। 2001 में के.ए. नजीब मामले में दिए गए फैसले में, सुप्रीम कोर्ट ने यह तय किया था कि लंबी कैद झेल रहे और ट्रायल पूरा होने की कोई संभावना न दिखने वाले विचाराधीन कैदी को यहां तक कि यू.ए.पी.ए. के तहत भी जमानत दी जानी चाहिए। हालांकि, इस नियम की स्थापना के बाद न्यायिक दृष्टिकोणों में बहुलता आई है, जिसमें कुछ बैंच ‘अच्छे कानून’ का पालन कर रही हैं और अन्य इससे भटक रही हैं। एक उल्लेखनीय विचलन उत्तर-पूर्व दिल्ली दंगों के आरोपियों की जमानत सुनवाई में जनवरी 2026 के आदेश में आया।

जिन लोगों को इस मामले में जमानत दी गई, उसके लिए देरी का कारण नहीं बताया गया, जिसकी नजीब फैसले में आवश्यकता थी, बल्कि यह बताया गया कि वे कोर्ट द्वारा बनाए गए ‘अपराधों के पदानुक्रम’ में निचले स्थान पर थे। उमर खालिद और शरजील इमाम के लिए, कोर्ट ने कहा कि उनकी लंबी कैद ने  ‘संवैधानिक अस्वीकार्यता की सीमा’ को पार नहीं किया है। जस्टिस नागरत्ना की बैंच ने अब समझदारी से चेतावनी दी है कि यदि कोई छोटी बैंच किसी बड़ी बैंच से असहमत होती है, तो उसे मामले को भारत के मुख्य न्यायाधीश के पास भेजना चाहिए, न कि उससे भटककर नियम को अर्थहीन बनाना चाहिए।

विडंबना यह है कि सुप्रीम कोर्ट द्वारा यह रेखांकित करने के एक दिन बाद कि यू.ए.पी.ए. मामलों में भी जमानत नियम है और जेल अपवाद, मंगलवार को एक दिल्ली कोर्ट ने खालिद को अंतरिम जमानत देने से इंकार कर दिया। उसने अपने चाचा के मृत्यु संस्कार में शामिल होने और सर्जरी के लिए तैयार अपनी मां की देखभाल करने के लिए जमानत मांगी थी। कड़कडड़ूमा कोर्ट के अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश समीर वाजपेयी ने अंतरिम जमानत के अनुरोध को ठुकराते हुए कहा कि ‘उनके चाचा की चेहलुम की रस्म में शामिल होना उतना आवश्यक नहीं है’। सुप्रीम कोर्ट को जमानत देने के सिद्धांत को व्यवस्थित करने के लिए एक बड़ी बैंच का गठन करना चाहिए और छोटी बैंचों और उच्च न्यायालयों को मार्गदर्शक सिद्धांतों का पालन करने का निर्देश दिया जाना चाहिए।-विपिन पब्बी

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