नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने भविष्यवाणी की है कि एक साल बाद नरेंद्र मोदी देश के प्रधानमंत्री नहीं रहेंगे। प्रधानमंत्री पद से उनकी विदाई तय है। दावा यह भी है कि उनकी भविष्यवाणी कभी गलत साबित नहीं होती। आने वाले चुनावों में हिंदू-मुसलमान के बजाय आर्थिक असमानता, अर्थात अमीर बनाम गरीब, तथा महंगाई सबसे बड़े मुद्दे होंगे। उन्होंने यह भी संबोधित किया है कि यदि मुसलमान पर अत्याचार हो, तो मुसलमान का नाम लें। अल्पसंख्यक की जगह मुसलमान न कहें। धु्रवीकरण की शुरुआत यहीं से होती है। राहुल गांधी ने जिस बैठक को संबोधित कर यह भविष्यवाणी की और भविष्य के चुनावी मुद्दों को रेखांकित किया, उसमें 52 प्रमुख अल्पसंख्यक नेता मौजूद थे। मुसलमान के अलावा, जैन, सिख, ईसाई समुदायों के प्रतिनिधि भी थे। कांग्रेस नेता ने किन आधारों, जनादेशों और राजनीतिक बदलाव के संकेतों, रुझानों पर यह दावा किया है कि प्रधानमंत्री मोदी की विदाई तय है? राहुल के हिंदू-मुसलमान वाले सांप्रदायिक और धु्रवीकृत विश्लेषण से भी हम सहमत नहीं हैं, क्योंकि देश इसी सोच और विभाजन को झेल रहा है। केरल में कई मुसलमानों को कांग्रेस सरकार में मंत्री बनाया गया है, क्योंकि कांग्रेस नेतृत्व के गठबंधन के लिए मुस्लिम लीग का समर्थन अनिवार्य है। कांग्रेस को हालिया चुनावों में केरल में ही जनादेश मिला है, शेष राज्यों में वह या तो गायब हो गई है अथवा हाशिए पर है। क्या इसी आधार पर प्रधानमंत्री की विदाई का दुस्वप्न देखा जा रहा है? पश्चिम बंगाल में भाजपा जनादेश पूरी तरह हिंदुत्व पर आधारित है, जहां करीब 85 फीसदी हिंदुओं ने भाजपा को वोट दिए। अधिकांश चुनावों की बुनियाद हिंदु-मुसलमान पर ही आश्रित है। दोनों ही समुदाय ‘सांप्रदायिक’ भी हैं। खासकर मुसलमान ‘धर्मनिरपेक्षता’ का प्रतीक है और हिंदू की लामबंदी ‘सांप्रदायिक’ करार दी जाती है। यह व्याख्या और धारणा ही गलत है।

रही बात अमीर-गरीब की, तो आर्थिक असमानता और विषमताएं देश की आजादी से पहले ही अस्तित्व में रही हैं। आज भी मोदी सरकार करीब 81.35 करोड़ भारतीयों को ‘मुफ्त अनाज’ बांट रही है। यह आर्थिक असमानता का सबसे ज्वलंत उदाहरण है। देश के करीब 10 फीसदी तबके के पास राष्ट्रीय आय का करीब 58 फीसदी हिस्सा मौजूद है, तो 50 फीसदी से अधिक भारतीय ऐसे हैं, जिन्हें राष्ट्रीय आय का 15 फीसदी ही नसीब है। एक और डाटा गौरतलब है कि मात्र 1 फीसदी वर्ग के पास देश की 40 फीसदी संपदा है। देश में 10 फीसदी तबका ऐसा है, जिसकी तिजौरियों, बैंकों, निवेश में 65 फीसदी संपत्ति जमा है, जबकि 50 फीसदी से अधिक ऐसे लोग हैं, जिनके हिस्से मात्र 6 फीसदी ही देश की संपदा है। हम उन करोड़ों भारतीयों की तो बात कर ही नहीं रहे, जो गरीबी-रेखा के नीचे जीने को अभिशप्त हैं। इससे गहरी और फासलेदार आर्थिक असमानता कोई और हो सकती है क्या? इस विभाजक यथार्थ के बावजूद आर्थिक असमानता कभी भी चुनावी मुद्दा नहीं बन पाई? आखिर क्यों? अमीर-गरीब भारत के लिए सनातन और शाश्वत मुद्दा है। सवाल कहीं ओझल न हो जाए कि आखिर राहुल गांधी किस आधार पर प्रधानमंत्री मोदी की विदाई तय मान रहे हैं? लोकसभा चुनाव 2029 में हैं। प्रधानमंत्री के पास 293 सांसदों का समर्थन है, जिनकी टूटने या पाला बदलने की जरा-सी भी आशंका नहीं है। बिन चुनाव या अविश्वास प्रस्ताव पारित हुए प्रधानमंत्री कैसे बदला जा सकता है? भारत कोई ‘केला-गणतंत्र’ नहीं है। राहुल गांधी ने ऐसा बयान देकर देश में भ्रम, अस्थिरता, अराजकता और सनसनी फैलाने की राजनीति खेली है। चूंकि वह मुसलमान या अल्पसंख्यक नाममात्र के नेताओं को संबोधित कर रहे थे, लिहाजा ऐसी बेतुकी भविष्यवाणी करना उनकी राजनीति का हिस्सा रही है। यकीनन देश में संकट का माहौल है। वह आर्थिक कम, लेकिन अन्य संदर्भों का संकट है। तेल-गैस-खाद के संकट हैं। देश में बेरोजगारी सबसे अहम संकट और समस्या है। क्या कांग्रेस नेतृत्व का विपक्ष इस पर कोई आंदोलन खड़ा कर पाया है?

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