घुसपैठियों का मुद्दा सामान्य नहीं, बेहद संवेदनशील और पेचीदा है। कूटनीति और बांग्लादेश के साथ हमारे संबंधों पर तनाव बढ़ सकता है। यह भारत की ही समस्या नहीं, बल्कि खाड़ी के मुस्लिम देश, यूरोप, ब्रिटेन और अमरीका भी परेशान हैं। अंतत: घुसपैठियों को खदेड़ा जा रहा है। ऐसे सभी लोग घुसपैठिए भी नहीं हैं। बहरहाल सिर्फ मुस्लिम देशों के ही कुछ उदाहरण लें, तो साफ होगा कि यह कितना नाजुक और बिलबिला देने वाली समस्या है। पाकिस्तान ने बीते सालों में 1.46 लाख से अधिक अफगानी मुसलमानों को उनके देश वापस जाने को विवश किया है। दोनों इस्लामी देश हैं। ईरान आज युद्ध में घिरा है, लेकिन इससे पहले वह करीब 15 लाख मुसलमानों को देश से खदेड़ चुका है। संयुक्त अरब अमीरात के स्वप्निल, शानदार शहर दुबई जाने को आधुनिक युवा हरचंद कोशिश करते हैं। वहां नौकरियों के मोटे पैकेज मिलते हैं और व्यापार की चौतरफा संभावनाएं हैं। दुबई ‘धन्नासेठों का शहर’ भी है, लेकिन संयुक्त अरब अमीरात ने ही 7500 से अधिक पाकिस्तानी लोगों को वापस जाने को विवश किया है। उन्हें अपना सामान पैक करने तक का वक्त नहीं दिया गया। तुर्किए खुद को मुसलमानों का ‘खलीफा देश’ मानता है। उसने भी करीब 2.60 लाख लोगों को देश छोड़ कर चले जाने को बाध्य किया है। जॉर्डन ने जिन 6.75 लाख के करीब लोगों को, खेती का काम करने को, शरण दी थी, उनमें से 1.5 लाख से अधिक शरणार्थियों को वह खदेड़ चुका है। सऊदी अरब ने तो हद ही कर दी, जब 18,836 कथित अवैध, अवांछित अप्रवासियों को हथकड़ी लगाकर देश के बाहर किया गया। अमरीका ने भी हथकड़ी, बेडिय़ां बांध कर भारतीयों को वापस भेजा था और हम एक राष्ट्र के तौर पर ‘चूं’ तक नहीं कर पाए थे। इसी तरह मुस्लिम देश अधिकतर मुसलमानों को ही निष्कासित कर रहे हैं, तो किसी भी देश ने इसे उनका एजेंडा करार नहीं दिया।

मानवाधिकार के नाम पर या तो मुंह में दही जम गया अथवा आंखें मूंद ली गईं। दुनिया ने इस ‘खदेड़बाजी’ को राष्ट्रीय सुरक्षा और उन देशों के संसाधनों का राष्ट्रीय प्रबंधन मान लिया, लेकिन भारत में, खासकर बंगाल से, घुसपैठियों को देश से बाहर करने के मुद्दे पर एक राजनीतिक, सामाजिक, मजहबी तबका बिलबिलाने क्यों लगता है? राज्यसभा में भारत सरकार की ओर से जवाब दिया गया कि देश में करीब 2 करोड़ घुसपैठिए हैं। विशेषज्ञ यह संख्या 3-4 करोड़ आंकते हैं, क्योंकि बंगाल के अलावा, उप्र, बिहार, केरल, कर्नाटक, तेलंगाना, महाराष्ट्र आदि राज्यों से लेकर राजधानी दिल्ली में भी घुसपैठिए हैं। राजनीतिक कारणों और चुनावी वोट बैंक की खातिर न तो शिद्दत से उनकी पहचान की गई और धरपकड़ कर उन्हें देश से खदेडऩा तो बहुत दूर की कौड़ी है। चूंकि अब घुसपैठियों को भगाने का पुख्ता रोड-मैप तैयार हो चुका है। केंद्रीय गृह मंत्रालय ने एक उच्चाधिकार प्राप्त समिति का गठन किया है, जो यह निष्कर्ष देगी कि देश में जनसांख्यिकी परिवर्तन और असंतुलन क्यों हैं? उनके बुनियादी कारण और कारक क्या हैं? विडंबना है कि इस अभियान को भाजपा का एजेंडा, मोदी सरकार की मुस्लिम-विरोधी नीति करार दिया जा रहा है। अब यह प्रावधान, कायदे-कानून तय किए जा रहे हैं कि घुसपैठियों का ‘बॉयोमीट्रिक डाटा’ तैयार किया जाएगा, ताकि खदेडऩे के बाद घुसपैठिया दोबारा भारत की सीमाओं में न आ सके। हमारे देश में ‘चार न्यूजीलैंड’ के बराबर घुसपैठिए हैं। अधिक भी हो सकते हैं। उनके पास आधार कार्ड, मतदाता पहचान पत्र, राशन कार्ड सरीखे भारतीय दस्तावेज भी हैं। वे सालों से भारत में बसे हैं, जमीनें खरीद ली हैं, सरकारी योजनाओं के लाभार्थी रहे हैं, देश के संसाधन हड़पते रहे हैं, कुछ ने सरकारी नौकरियां भी हासिल कर रखी हैं। ऐसे अवैध घुसपैठियों को देश से खदेडऩा आसान नहीं है। बांग्लादेश सरकार अपने मूल निवासियों को पहचानने में 5-5 साल लगा देती है, लिहाजा मामले लटके रहते हैं और घुसपैठिए ‘हिरासत केंद्रों’ में मजे से बिरयानी खाते रहते हैं। बांग्लादेश कई मामलों में घुसपैठियों को अपना नागरिक मानता ही नहीं। ऐसे में आप क्या कर सकते हैं? क्या जबरन घुसपैठियों को उनके देश की सीमा के भीतर धकेल दिया जाए? यह ऐसी समस्या है, जिस पर सरकार और विपक्ष की साझा सहमति अनिवार्य और देशहित में है। कुछ ऐसे मसले होते हैं जिन पर राजनीति नहीं होनी चाहिए। घुसपैठियों को देश से बाहर करने का मसला भी राजनीति से ऊपर है। इस मसले पर सत्ता पक्ष तथा विपक्ष को मिलकर कोई ठोस रणनीति व नीति बनानी चाहिए। यह एक सच्चाई है कि भारत में बड़ी संख्या में घुसपैठिए देशवासियों के संसाधनों को लूट रहे हैं। जिन संसाधनों पर देशवासियों का स्वामित्व होना चाहिए, उन संसाधनों के दम पर देश में बड़ी संख्या में घुसपैठिए अपनी आजीविका कमा रहे हैं। आजीविका के ये संसाधन देशवासियों को मिलने चाहिए।

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