अब अमरीकी राष्ट्रपति ट्रंप ‘जबरन मजदूरी’ के वैश्विक पैरोकार बनना चाहते हैं। उनके निशाने पर भारत समेत 54 देश ऐसे हैं, जो बंधुआ अथवा जबरन मजदूरी से बनाए गए सामान के आयात रोकने में नाकाम रहे हैं। अमरीकी व्यापार प्रतिनिधि कार्यालय ने व्यापार कानून की धारा 301 के तहत एक प्रस्ताव दिया है कि इन देशों पर 12.5 फीसदी टैरिफ लगाया जाए। वैसे अमरीकी सर्वोच्च अदालत ‘ट्रंपवादी टैरिफ’ को ‘अवैध’ करार दे चुकी है, फिर भी राष्ट्रपति को अधिकार प्राप्त हैं कि वह एक निश्चित अवधि तक 10 फीसदी टैरिफ लगा सकते हैं। राष्ट्रपति ट्रंपने इसी संवैधानिक प्रावधान का इस्तेमाल करते हुए जो वैश्विक टैरिफ लगाया था, उसकी अवधि 24 जुलाई को समाप्त हो रही है। दरअसल ट्रंप बुनियादी तौर पर ‘व्यापारी’ हैं और राष्ट्रपति कार्यालय भी उसी मानस के साथ धकेलना चाहते हैं। यदि भारत, चीन, जापान, ब्राजील, ऑस्टे्रलिया, ब्रिटेन, सऊदी अरब आदि देशों में ‘जबरन मजदूरी’ प्रचलित है, तो अमरीकी राष्ट्रपति के पेट में दर्द क्यों हो रहा है? क्या ट्रंप को यह ठेकेदारी भी मिली है? भारत का ही उदाहरण लें, तो वहां अनुमान है कि 1 करोड़ 10 लाख 50,000 से अधिक ‘जबरन श्रम’ से पीडि़त, विवश लोग हैं। वे बाल-मजदूर, बंधुआ अथवा गुलाम मजदूर भी हो सकते हैं। देश के ईंट-भट्टों, कृषि, कपास, वस्त्र उद्योग, खनन, झींगा प्रसंस्करण, घरेलू काम, कालीन बुनाई, पत्थर की खदानों आदि में ‘जबरन मजदूरी’ का चलन है। हालांकि भारत में बंधुआ मजदूरी प्रणाली (उन्मूलन) अधिनियम की व्यवस्था भी है, लेकिन उन स्थितियों से अमरीका पर क्या प्रभाव पड़ रहा है? यह अमरीका की समस्या नहीं है, लेकिन टैरिफ के लिए ट्रंप कुछ भी कर सकते हैं और कोई भी दलील दे सकते हैं।

अमरीकी राष्ट्रपति ने नए टैरिफवाद के लिए एक और क्षेत्र चुन लिया है। बंधुआ-बाल मजदूरी या पीढ़ी-दर-पीढ़ी गुलामी के संदर्भ में अमरीका ने कौन से ठोस और कारगर प्रयास किए हैं? दरअसल इस ‘जबरन मजदूरी’ टैरिफ का प्रस्ताव ऐसे समय सामने आया है, जब भारत में अमरीकी प्रतिनिधिमंडल के साथ ‘द्विपक्षीय व्यापार समझौते’ की 99 फीसदी रूपरेखा तय की जा चुकी है। यह पुष्टि केंद्रीय उद्योग-वाणिज्य मंत्री पीयूष गोयल ने भी की है। अंतिम 1 फीसदी बेहद महत्वपूर्ण है, क्योंकि भारत को लगता है कि ‘जबरन श्रम’ टैरिफ के जरिए अमरीका अनधिकार चेष्टा कर रहा है। दरअसल राष्ट्रपति ट्रंप ईरान युद्ध के घाटे और नुकसान की भरपाई अब एक और टैरिफ के माध्यम से करना चाहते हैं। उस थोपे हुए, फिजूल, नाकाम युद्ध पर अमरीका के 100 अरब डॉलर फूंके जा चुके हैं। बेशक यह सच है कि राष्ट्रपति ट्रंप ने ‘जैसे को तैसा टैरिफ’ के जरिए 214 अरब डॉलर कमाए थे, लेकिन अदालती आदेश के बाद अमरीका को 165 अरब डॉलर वापस रिफंड करने पड़े। इसके बावजूद राष्ट्रपति ट्रंप विचलित नहीं हुए। उन्हें ‘जबरन टैरिफ’ से इतना लगाव है कि उन्होंने दर्जनों व्यापारिक साझेदार देशों पर टैरिफ थोपने का प्रस्ताव तैयार कराया है। दूसरी ओर कनाडा, पाकिस्तान, मैक्सिको, इंडोनेशिया आदि कुछ देश ऐसे बताए गए हैं कि जो ‘जबरन श्रम’ वाले सामान को आयात नहीं करते अथवा बहुत कम करते हैं। उन पर अमरीका 10 फीसदी टैरिफ लगाएगा। वह किसी को छोडऩे वाला नहीं है, क्योंकि उन्हें अमरीका की अर्थव्यवस्था को संतुलित करना है। अमरीकी कानून का दोगलापन देखिए कि ‘जबरन श्रम’ के संदर्भ में उसने दुर्लभ खनिज, कुछ और धातुओं, कॉफी, फार्मा, विमान के कुछ हिस्से आदि के क्षेत्रों को छूट दे रखी है। कोबाल्ट की खदानों में जो शोषण जारी रहा है, यदि अमरीका को अनुकूल लगता है या उससे फायदा होता है, तो उस शोषण का भी स्वागत है। वाह! सुपरपॉवर अमरीका!! बहरहाल अभी तो प्रस्ताव रखा गया है। अभी भारत समेत 54 देशों पर लागू किया जाना शेष है। सुनवाई का समय 22 जून तय किया गया है, लेकिन अमरीका और राष्ट्रपति ट्रंप के मंसूबे साफ हैं। यह अमरीका की धमकी भी हो सकती है, ताकि भारत से व्यापार समझौते में कुछ और रियायतें हासिल की जा सकें। भारत को ‘अमरीकी ब्लैकमेल’ के सामने झुकना नहीं चाहिए और प्रस्तावित टैरिफ का सख्ती से जवाब देना चाहिए। ट्रंप को समझना मुश्किल है। वह कभी टैरिफ लगा देते हैं, कभी इसकी वापसी कर देते हैं। वह एक ओर भारत को अपना मित्र बताते हैं, तो दूसरी और नए-नए टैरिफ लगाने की धमकी देने लगते हैं। अमरीकी सुप्रीम कोर्ट के निर्णय के बावजूद वह अपना तानाशाही रवैया नहीं छोड़ रहे हैं।

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