इस व्यवस्था में एक पूरा नैकसिस बन जाता है। वह नैकसिस सत्ता के बल पर आम जनता में अपना आतंकवाद जमाता है, उसी के बल पर संगठन या गिरोह को जिताता है और उसके बाद अपनी हिस्सेदारी मांगता है। बंगाल में ममता बैनर्जी के राज में लगभग यही व्यवस्था स्थापित हो गई थी। लेकिन जैसे ही सत्ता हाथ से फिसली, वैसे ही चन्द दिनों में ही ममता बैनर्जी की राजनीतिक मशीन के कल पुर्जे गलियों में और सडक़ों पर बिखरने लगे। यह स्वाभाविक ही था। संघर्ष करने की ऊर्जा विचार से आती है, सत्ता से नहीं। जिस दल की कोई विचारधारा नहीं होती, जिसका लक्ष्य केवल सत्ता हथियाना होता है, उस दल में टूट फूट स्वाभाविक मानी जाती है। ममता बैनर्जी ने तानाशाही तरीके से शासन किया। भ्रष्टाचार के कई आरोप भी इस दल के नेताओं पर लगे। यह भी उल्लेखनीय है कि ममता बैनर्जी ने पश्चिम बंगाल में केंद्र की योजनाओं को लागू ही नहीं किया। इससे बड़ी संख्या में जनता कल्याणकारी योजनाओं का लाभ उठाने से वंचित हो गई…

इंडिया गठबन्धन में ममता बैनर्जी को सबसे ताकतवर माना जाता था। वे अपने दम पर पिछले पन्द्रह साल से सत्ता पर काबिज थीं। उन्होंने बंगाल की शक्तिशाली पार्टी सीपीएम, जो लगातार पैंतीस साल से बंगाल पर एक छत्र राज कर रही थी, को पराजित किया था। कांग्रेस को बंगाल में धूल चटा दी थी। लेकिन 2026 के विधानसभा चुनाव में वे हार गईं। लेकिन हार का अर्थ यह नहीं कि सीपीएम और कांग्रेस की तरह वह शून्य पर सिमट गईं। विधानसभा में तृणमूल कांग्रेस को अस्सी सीटें प्राप्त हुईं। अभी भी संसद में उसके पास चालीस के आसपास सांसद हैं। लेकिन उसके पास इस बार केवल एक चीज छिन्न गई। ममता बैनर्जी इतने विधायक नहीं जिता पाईं कि वे चौथी बार मुख्यमंत्री बन सकें। यह भी कोई अनोखी बात नहीं है। राजनीति में हार-जीत लगी रहती है। इसलिए राजनीति में इसे सामान्य घटना ही माना जाता है। आखिर कांग्रेस ही कितने साल से लगातार हार रही है। चार प्रदेशों को छोड़ कर वह किसी भी प्रदेश में सत्ता में नहीं है। केरल में दस साल बाद सीपीएम सत्ता से बाहर हो गई है। लेकिन पार्टी सामान्य तरीके से काम-काज कर रही है। पर तृणमूल कांग्रेस के मामले में बिल्कुल उलटा हो रहा है। सत्ता की डोर टूटते ही मानो भूकम्प आ गया हो। तृणमूल की कायनात हिल गई हो। जगह जगह नगरपालिकाओं से, पंचायतों से, नगर निगमों से तृणमूल के सदस्य ममता को अपने इस्तीफे भेज रहे हैं। यहां तक कि कोलकाता नगर निगम के महापौर हकीम साहिब ने भी ममता से क्षमा मांग कर महापौर के पद से इस्तीफा दे दिया है, जबकि निगम में तृणमूल का बहुमत अभी भी है।

तृणमूल के जिन नेताओं ने सरकारी स्कीमों का लाभ देने के लिए लाभार्थियों से कट मनी (रिश्वत) ली थी, वे लाउडस्पीकर लगा कर सार्वजनिक रूप से वह वापस कर रहे हैं। जिन भवनों पर तृणमूल के लोगों ने वर्षों से बलपूर्वक कब्जा कर रखा था, वे स्वयं खाली कर रहे हैं। कोलकाता में पार्टी के एक प्रवक्ता ने, जो मीडिया में गाली गलौज की भाषा में धमकाता रहता था, उसने यह कहते हुए क्षमा मांग ली कि यह उसे पार्टी के आदेश पर करना पड़ रहा था। ममता बैनर्जी को शायद इतने पर भी इस बात का अंदाजा नहीं हो पाया कि बंगाल की आम जनता उनके कितनी खिलाफ है। दो दिन पहले उसने ऐलान कर दिया कि वे विशाल विरोध प्रदर्शन करेंगी, जैसा कि वे मुख्यमंत्री रहते हुए प्राय: करती रहती थीं। लेकिन उनके इस विरोध प्रदर्शन में जनता तो क्या, पार्टी के सांसद व विधायक भी नहीं पहुंचे। मीडिया और सुरक्षा बलों के लोग ज्यादा थे, आम जनता कम थी। जनता के आक्रोश की स्थिति यह हो गई कि पार्टी के नेताओं का बाहर निकलना मुश्किल हो गया। ममता बैनर्जी खुद कोर्ट पहुंची तो लोगों ने चोर चोर के नारे लगाने शुरू कर दिए। इतना ही नहीं, ममता बैनर्जी ने विधानसभा अध्यक्ष को लिख कर दिया कि पार्टी की ओर से विधानसभा में विधायक दल का नेता सेवन देव चट्टोपाध्याय विपक्ष का नेता होगा। लेकिन पार्टी के अस्सी में से 58 विधायकों ने विधानसभा अध्यक्ष को लिख कर दिया कि कि उनका नेता ऋतब्रत होगा न कि चट्टोपाध्याय। विधानसभा अध्यक्ष ने बहुमत के आधार पर ऋतब्रत को विपक्ष के नेता के तौर पर मान्यता दे दी। ममता ने लोकसभा में कल्याण मुखर्जी को पार्टी का नेता मनोनीत किया, लेकिन पार्टी की ही एक महिला सांसद ने अध्यक्ष को लिखा कि मुखर्जी ने उसके साथ दुव्र्यवहार किया है।

लेकिन क्या कारण है कि पन्द्रह साल की सत्ता, संसद में चालीस सदस्य, विधानसभा में अस्सी विधायक, इस सबके बावजूद पार्टी ताश के पत्तों की तरह क्यों बिखर गई? दरअसल जब कोई पार्टी राजनीतिक न रह कर, सत्ता के बल पर केवल लूट-खसोट करने का गिरोह मात्र बन जाए, तो सत्ता का गोंद हटते ही उसका बिखरना स्वाभाविक ही है। किसी भी राजनीतिक दल में उसके सदस्य और समर्थक किसी विचारधारा के कारण संगठित होते हैं। उनके पास देश और समाज को लेकर एक दृष्टि होती है। वह दल उस विचारधारा को लेकर आगे बढ़ता है। इसलिए उसकी प्रेरणा का स्रोत उसकी विचारधारा होती है न कि सत्ता। सत्ता प्राप्ति की कामना और प्रयास राजनीतिक दल इसलिए करता है कि उसे अपनी विचारधारा के अनुरूप समाज का गठन करना है। यही कारण है कि वह पराजय में बिखरता नहीं है, बल्कि और सुसंगठित होता है। इसके विपरीत लोकतंत्र में ऐसे भी कुछ समूह संगठित हो जाते हैं जिनका सत्ता प्राप्ति का उद्देश्य भौतिक साधनों की लूट, सत्ता का सुख और उससे उत्पन्न अहंकार की तुष्टि ही रह जाता है। ऐसे संगठन, समूह या गिरोह जब सत्ता प्राप्त कर लेते हैं तो स्वाभाविक ही गिरोह में अपनी अपनी हैसियत के हिसाब से जन सामान्य को लूटते हैं या फिर लूट के सामान में से अपना हिस्सा बटोरते हैं।

इस व्यवस्था में एक पूरा नैकसिस बन जाता है। वह नैकसिस सत्ता के बल पर आम जनता में अपना आतंकवाद जमाता है, उसी के बल पर संगठन या गिरोह को जिताता है और उसके बाद अपनी हिस्सेदारी मांगता है। बंगाल में ममता बैनर्जी के राज में लगभग यही व्यवस्था स्थापित हो गई थी। लेकिन जैसे ही सत्ता हाथ से फिसली, वैसे ही चन्द दिनों में ही ममता बैनर्जी की राजनीतिक मशीन के कल पुर्जे गलियों में और सडक़ों पर बिखरने लगे। यह स्वाभाविक ही था। संघर्ष करने की ऊर्जा विचार से आती है, सत्ता से नहीं। जिस दल की कोई विचारधारा नहीं होती, जिसका लक्ष्य केवल सत्ता हथियाना होता है, उस दल में टूट फूट स्वाभाविक मानी जाती है। ममता बैनर्जी ने तानाशाही तरीके से शासन किया। भ्रष्टाचार के कई आरोप भी इस दल के नेताओं पर लगे। यह भी उल्लेखनीय है कि ममता बैनर्जी ने पश्चिम बंगाल में केंद्र की योजनाओं को लागू ही नहीं किया। इससे बड़ी संख्या में जनता कल्याणकारी योजनाओं का लाभ उठाने से वंचित हो गई। यह भी एक कारण रहा, कि जनता ने ममता सरकार के खिलाफ मतदान किया। ममता बैनर्जी को अगर जनता में अपना आधार बनाए रखना है, तो उन्हें खुले दिल से अपनी गलतियों पर चिंतन करना चाहिए।-कुलदीप चंद अग्निहोत्री

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