Adhik Ram Lakshman Dwadashi 2026: सनातन धर्म में अधिक मास का विशेष महत्व है, जो हर तीन साल में एक बार आता है. ज्येष्ठ अधिक मास के इस पावन महीने के शुक्ल पक्ष की द्वादशी तिथि को ‘अधिक रामलक्ष्मण द्वादशी’ के रूप में मनाया जाएगा . इस बार इस तिथि पर रवि योग और सर्वार्थ सिद्धि योग के साथ-साथ ‘उन्मीलिनी महाद्वादशी’ का बेहद दुर्लभ संयोग बना है. यह दिन भगवान श्री राम, शेषनाग के अवतार लक्ष्मण जी और माता सीता की विशेष पूजा-अर्चना की जाती  है. आइए जानते हैं इसकी सही तारीख, शुभ मुहूर्त और इसका क्या महत्व है.

‘चंपक द्वादशी’ पूजा विधि

इस पावन दिन को ‘चंपक द्वादशी’ भी कहा जाता है. मान्यताओं के अनुसार, इस दिन भगवान विष्णु, श्री राम या श्री कृष्ण का चंपा के फूलों से श्रृंगार और पूजन करने का विधान है. पूजा के दिन सूबह जल्दी उठकर स्नान करने के बाद सूर्य देव को अर्घ्य दें और व्रत व पूजा का संकल्प लें. इसके बाद एक चौकी पर पीला कपड़ा बिछाकर भगवान राम, माता सीता और लक्ष्मण जी की मूर्ति या तस्वीर स्थापित करें. गवान को पीले या सफेद वस्त्र, चंदन और मुख्य रूप से चंपा के फूलों की माला अर्पित करें. मौसमी फल और घर पर बनी सात्विक मिठाई का भोग लगाएं. फिर दिपक और धुप-बाती जलाए, फिर व्रत कथा का पाठ करें और प्रभु श्री राम के मंत्रो का जाप करें. अंत में आरती करें.  

रामलक्ष्मण द्वादशी का धार्मिक महत्व 

  • लंबे समय से रुके कार्य होते हैं सिद्ध: मान्यता है कि जो व्यक्ति इस दिन पूरी श्रद्धा से श्री राम और लक्ष्मण जी की पूजा करता है, उसके जीवन में लंबे समय से अटके या बाधित कार्य बिना किसी विघ्न के पूरे हो जाते हैं.
  • भाइयों के बीच बढ़ता है प्रेम: चूंकि यह दिन राम-लक्ष्मण के आदर्श भाईचारे को समर्पित है, इसलिए इस दिन पूजा करने से परिवार में सुख-शांति आती है और भाइयों के बीच आपसी प्रेम और सौहार्द मजबूत होता है.
  • अक्षय पुण्य और मोक्ष की प्राप्ति: पुरुषोत्तम मास में की गई पूजा, जप-तप और दान का फल कभी समाप्त नहीं होता (अक्षय रहता है). इस दिन अन्न, वस्त्र या धन का दान करने से साधक को घोर दरिद्रता से मुक्ति मिलती है और अंत में मोक्ष का मार्ग प्रशस्त होता है.

(Disclaimer): इस लेख में दी गई जानकारी केवल सामान्य सूचनात्मक उद्देश्यों के लिए है। यहां दी गई ज्योतिष, वास्तु या धार्मिक जानकारी मान्यताओं और विभिन्न स्रोतों पर आधारित है। किसी भी उपाय, सलाह या विधि को अपनाने से पहले संबंधित क्षेत्र के प्रमाणित विशेषज्ञ या विद्वान से परामर्श अवश्य लें।

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