धनबाद: पिछले कुछ दिनों में हुई घटनाओं में यह साफ हुआ है कि धनबाद का पुराना ‘माफिया राज’ अब बिखर चुका है और उसकी जगह छोटे-छोटे स्थानीय गिरोहों यानी ‘टुकड़े-टुकड़े गैंग’ ने ले ली है। एक दौर था जब धनबाद के अपराध तंत्र का एक निश्चित पदानुक्रम था। कोयला माफिया या वासेपुर जैसे बड़े सिंडिकेट पूरे कोयलांचल को नियंत्रित करते थे। उनके अपराध करने के अपने नियम और सीमाएं थीं। लेकिन अब यह सीमाएं टूट चुकी है। बड़े माफिया सरगनाओं के जेल जाने या नेपथ्य में जाने के बाद जो ‘पॉवर वैक्यूम’ पैदा हुआ, उसे भरने के लिए नए रंगरूटों और छोटे अपराधियों ने सिर उठा लिया है।

नये गैंग का जलवा

ये नए लड़के किसी एक आका के प्रति वफादार नहीं हैं। ये तात्कालिक मुनाफे और वर्चस्व के लिए कुछ भी करने को तैयार हैं, जिससे कोयलांचल का अपराध अधिक हिंसक और अप्रत्याशित हो गया है। इस पूरी अराजकता के पीछे अवैध कोयला उत्खनन से हो रहे करोड़ों रुपये का काला खेल काम कर रहा है।
रातों-रात अमीर बनने की चाह, अवैध कोयला खनन से जो काली कमाई हो रही है, उससे स्थानीय दबंग रातों-रात “धन-पशु” बन रहे हैं। इसी पैसे का एक बड़ा हिस्सा बिहार के सीमावर्ती जिलों से अत्याधुनिक अवैध हथियार खरीदने में किया जा रहा है।

क्या कहते हैं ग्रामीण?

कतरास और घनुडीह की घटनाओं से साफ है कि ग्रामीण अब अपने अस्तित्व और सुरक्षा के लिए इस अवैध धंधे का विरोध कर रहे हैं। लेकिन, मुनाफे के अंधे खेल में डूबे दबंग इस विरोध को बर्दाश्त नहीं कर पा रहे हैं और ग्रामीणों की आवाज दबाने के लिए सरेआम गोलियां बरसाई जा रही हैं या बम फोड़े जा रहे हैं ताकि ग्रामीण दहशत में आए और अवैध कोयला खनन या कारोबार को प्रभावित न करें।

कहां से मिल रही अपराधियों को हिम्मत?
पुलिस का सुस्त रवैया: पुलिस अक्सर वारदात हो जाने के बाद लकीर पीटती नजर आती है।
हथियारों की आसान सप्लाई: अवैध कट्टों और कारतूसों की निर्बाध सप्लाई चेन को तोड़ा नहीं जा सका है।
सफेदपोशों का संरक्षण: आउटसोर्सिंग कंपनियों के साथ कुछ रसूखदारों और सफेदपोशों का गठजोड़ इन अपराधियों के लिए सुरक्षा कवच का काम करता है।
समय पर कड़ा एक्शन जरूरी: यदि समय रहते पुलिस ने केवल पारंपरिक गश्त छोड़कर इन छोटे गिरोहों की फंडिंग पर वार नहीं किया और हथियारों की सप्लाई चेन को नहीं काटा, तो धनबाद के ये नए रंगरूट पूरे कोयलांचल को अराजकता की ऐसी आग में झोंक देंगे।

निशाने पर पुलिस

मंगलवार को कतरास के सोनरडीह में स्थिति इतनी बिगड़ गई कि अपराधियों ने पुलिस तक को निशाने पर ले लिया, जिसके बाद कई थानों की फोर्स बुलानी पड़ी। वहीं, बुधवार को घनुडीह में ‘सिंह नेचुरल आउटसोर्सिंग परियोजना’ के विस्तार को लेकर हुआ बवाल कॉर्पोरेट लापरवाही का बड़ा उदाहरण है।
घनी आबादी वाली चीना कोठी बस्ती के समीप नियम विरुद्ध की जा रही ओबी डंपिंग का विरोध करने पर ग्रामीणों के साथ मारपीट और फायरिंग की गई। मामले की गंभीरता को देखते हुए पूर्व मेयर संजीव सिंह ने मौके पर पहुंचकर साफ कहा है कि जब तक प्रशासन, कंपनी और ग्रामीणों के बीच त्रिपक्षीय बैठक नहीं हो जाती, तब तक वहां किसी भी नए कार्य या डंपिंग की अनुमति नहीं दी जाएगी।

खौफनाक अतीत की परछाई

आज धनबाद की बस्तियों में जो गोलियां चल रही हैं, वे समाज में एक ‘साइकोलॉजिकल टेरर’ (मानसिक खौफ) पैदा करने की कोशिश हैं। इसका सबसे वीभत्स रूप 31 जुलाई 2023 की आधी रात को झरिया के धनंजय यादव हत्याकांड में दिखा था। अपराधियों ने धनंजय के घर में घुसकर, हथियार के बल पर पत्नी और बेटियों को बंधक बनाया और फिर एक बेबस पिता के सामने उसकी बेटियों की जान की धमकी देकर, खुद धनंजय का गला रेत दिया। आज भी जब ग्रामीण अवैध खनन का विरोध करते हैं, तो अपराधी इसी तरह के खौफनाक इतिहास की धौंस दिखाकर उनकी आवाज को बंद करना चाहते हैं।

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