नरेंद्र मोदी के 12 साल के कार्यकाल में भारत बदल चुका है। अर्थव्यवस्था मजबूत हुई, विकास दर 7.7% रही। डिजिटल गवर्नेंस में सुधार हुआ। जन धन,आधार, स्वच्छ भारत जैसे प्रोग्राम्स का विस्तार हुआ। 11 करोड़ शौचालय बने, ग्रामीण घरों में बिजली पहुंची। मोदी ने नेहरू का रिकॉर्ड तोड़ दिया। लेकिन विपक्ष अब मोदी सरकार पर लोकतांत्रिक संस्थाओं के दुरुपयोग करने का आरोप लगा रहा है।

स्वामीनाथन एस अंकलेसरिया अय्यर
नरेंद्र मोदी के ‘कम से कम सरकार, ज्यादा से ज्यादा गवर्नेंस’ के वादे के साथ प्रधानमंत्री बनने के बारह साल बाद, भारत पूरी तरह बदल चुका है। यह बदलाव सचमुच हुआ है। इसमें से कुछ बातें चिंताजनक भी हैं। अर्थव्यवस्था मजबूत हुई है। ट्रंप के टैरिफ और ईरान युद्ध के बावजूद, 2025-26 में भारत की विकास दर शानदार 7.7 फीसदी रही। इसने जापान को पीछे छोड़ते हुए दुनिया की चौथी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था का स्थान हासिल कर लिया है।

सरकारी कामकाज भी ज़्यादा डिजिटल और सक्षम हुआ है। भारत को बदलने वाले कई प्रोग्राम NDA सरकार ने शुरू नहीं किए थे, लेकिन उन्हें इतनी अच्छी तरह लागू किया कि अब वे मोदी से जुड़ गए हैं; मोदी ने सबसे लंबे समय तक लगातार चुने हुए प्रधानमंत्री रहने का जवाहरलाल नेहरू का रिकॉर्ड भी तोड़ दिया है।

सभी के लिए बैंक खाते और आधार की योजना UPA के समय बनी थी। गांवों में बिजली,सड़कें और साफ-सफाई की व्यवस्था 2014 से पहले ही शुरू हो चुकी थी। लेकिन उनकी सरकार के दौरान, आधार एनरोलमेंट 65 करोड़ से बढ़कर 140 करोड़ हो गया और जन धन खाते लगभग शून्य से बढ़कर 55 करोड़ हो गए। स्वच्छ भारत अभियान के तहत 11 करोड़ शौचालय बनाए गए। अब लगभग हर ग्रामीण घर में बिजली पहुंच चुकी है।

आधार,यूपीआई और डीबीटी से दुनिया में बजा भारत का डंका

आधार, UPI और डायरेक्ट बेनिफिट ट्रांसफर के मेल ने एक ऐसा डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर बनाया है, जिसकी बराबरी दुनिया के ज्यादातर देश नहीं कर सकते। दुनिया भर में होने वाले रियल-टाइम डिजिटल पेमेंट में से लगभग आधे भारत में होते हैं। भारत का टेक्नोलॉजी हब के तौर पर उभरना भी उतना ही अहम रहा है।

मल्टीनेशनल कंपनियों के 1800 से ज्यादा ‘ग्लोबल कैपेबिलिटी सेंटर’ (जिन्हें पहले इन-हाउस सेंटर कहा जाता था) अब भारत में काम कर रहे हैं और इनमें 20 लाख से ज़्यादा प्रोफेशनल काम करते हैं। बैक-ऑफ़िस ऑपरेशन के तौर पर शुरू हुए ये सेंटर अब हाई-एंड डिजाइन और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के सेंटर बन गए हैं।

गूगल, अमेजन और माइक्रोसॉफ्ट की 67.4 अरब डॉलर का निवेश करने की योजना

Google, Amazon और Microsoft नए डेटा सेंटर में 67.4 अरब डॉलर का निवेश करने की योजना बना रहे हैं, जिनका इस्तेमाल AI प्रोग्राम डिज़ाइन करने में किया जाएगा। पेटेंट तो मल्टीनेशनल कंपनियों के पास रहेंगे, लेकिन GCCs लाखों बेहतरीन भारतीय टेक्नोक्रेट तैयार करेंगे। आगे चलकर भारत की बड़ी कंपनियाँ उन्हें नौकरी देंगी, जिससे हाई-टेक फ़ायदे बड़े पैमाने पर फैलेंगे।

ग्लोबल वेंचर-कैपिटल और प्राइवेट इक्विटी फंड्स ने स्टार्टअप्स की दुनिया में क्रांति ला दी है; इनमें से 110 स्टार्टअप्स ‘यूनिकॉर्न’ बन गए हैं, जिनकी कीमत एक अरब डॉलर से ज़्यादा है। इससे कॉर्पोरेट सेक्टर का दायरा काफी बढ़ा है और पारंपरिक क्षेत्रों में कंपनियों के जमावड़े वाली स्थिति में बदलाव आया है।

रिन्यूएबल एनर्जी जैसे क्षेत्रों में भारी निवेश

सरकार के सहयोग से टाटा, रिलायंस और अडानी जैसी कंपनियां सेमीकंडक्टर, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, बैटरी, डेटा सेंटर और रिन्यूएबल एनर्जी जैसे क्षेत्रों में भारी निवेश कर रही हैं। मोदी का मकसद ऐसी भारतीय कंपनियाँ तैयार करना है जो ग्लोबल लेवल पर मुकाबला कर सकें, ठीक वैसे ही जैसे दक्षिण कोरिया ने कभी सैमसंग और हुंडई को आगे बढ़ाया था।

लोकतांत्रिक संस्थाएं कमजोर हुईं

साथ ही, लोकतांत्रिक संस्थाएं कमजोर हुई हैं, असहमति की गुंजाइश कम हुई है, जांच एजेंसियों की राजनीतिक निष्पक्षता पर सवाल उठ रहे हैं, और अल्पसंख्यकों में यह डर बढ़ रहा है कि वे दोयम दर्जे के नागरिक हैं। लोकतंत्र से जुड़े सभी बड़े अंतरराष्ट्रीय पैमाने गिरावट की ओर इशारा करते हैं। सरकार इन्हें पक्षपाती बताती है। लेकिन जब दुनिया भर की संस्थाएं मोटे तौर पर एक जैसे नतीजे पर पहुंचती हैं, तो इसे सिर्फ़ पक्षपात कहकर खारिज नहीं किया जा सकता।

चुनाव आयोग कभी भारत के सबसे सम्मानित संस्थानों में से एक हुआ करता था। लेकिन पिछले साल हुए लोकनीति-CSDS सर्वे में पाया गया कि चुनाव आयोग पर लोगों का भरोसा कम हो रहा है; सिर्फ 28.6 फीसदी लोगों ने कहा कि उन्हें चुनाव आयोग पर ” बहुत ज्यादा” भरोसा है। इस सर्वे में दिल्ली और पांच राज्यों को शामिल किया गया था।

हाल के चुनावों में पश्चिम बंगाल की वोटर लिस्ट से लगभग 90 लाख नाम हटाए जाने को लेकर काफ़ी विवाद हुआ था। चुनाव आयोग का कहना है कि नाम हटाने की प्रक्रिया पूरी तरह निष्पक्ष थी। लेकिन लोकतंत्र सिर्फ़ निष्पक्षता पर ही नहीं, बल्कि निष्पक्षता के बारे में वोटरों की सोच पर भी निर्भर करता है।

विपक्ष का आरोप- सियासी दबाव बनाने के लिए जांच एजेंसियों का हो रहा इस्तेमाल

विपक्ष का कहना है कि जांच एजेंसियों का इस्तेमाल राजनीतिक दबाव बनाने के लिए किया जा रहा है। जब 2022 में एकनाथ शिंदे ने शिवसेना से अलग होकर बीजेपी के साथ गठबंधन किया, तो उनके साथ जाने वाले नेताओं के मामलों में जांच की रफ़्तार अक्सर धीमी पड़ गई। एनसीपी (NCP) से नेताओं के पाला बदलने के बाद भी ऐसा ही देखने को मिला। हाल ही में तृणमूल कांग्रेस से विधायकों के पार्टी छोड़ने पर भी ऐसे ही आरोप लगे हैं।

अरविंद केजरीवाल के जेल जाने पर उठे सवाल

शराब नीति से जुड़े मामले में AAP के लगभग आधे सीनियर नेता जेल चले गए; इनमें दिल्ली के पूर्व मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल भी शामिल थे, जिन्हें लोकसभा चुनाव से कुछ हफ़्ते पहले मार्च 2024 में गिरफ्तार किया गया था। बाद में ट्रायल कोर्ट ने उन्हें बरी कर दिया, लेकिन उनका कहना था कि राजनीतिक नुकसान तो हो ही चुका था। BJP ने इन आरोपों से इनकार किया कि वह विपक्षी नेताओं को निशाना बना रही थी।

प्यू रिसर्च सेंटर का इंडेक्स क्या कहता है

प्यू रिसर्च सेंटर के सोशल हॉस्टिलिटीज इंडेक्स (सामाजिक शत्रुता सूचकांक) के अनुसार, 2014 में यह स्कोर 10 में से 8.7 था, जो 2024 में जारी आंकड़ों के मुताबिक खराब होकर 10 में से 9.3 हो गया। प्यू के गवर्नमेंट रिस्ट्रिक्शन इंडेक्स (सरकारी प्रतिबंध सूचकांक) में भी यह स्कोर 10 में से 4.8 से बढ़कर 10 में से 6.4 हो गया है।

अन्य अधिकार संगठनों ने भी अल्पसंख्यकों के अधिकारों को लेकर बढ़ती चिंताओं का ज़िक्र किया है। आलोचकों का कहना है कि सार्वजनिक बातचीत में भड़काऊ बयानबाज़ी और नफ़रत फैलाने वाले भाषण (हेट स्पीच) आम हो गए हैं।

सरकार के समर्थक आर्थिक फ़ायदों और राज्य की बेहतर क्षमता की ओर इशारा करते हैं। आलोचकों का कहना है कि ‘भारत की सोच’ धर्मनिरपेक्ष लोकतंत्र से बदलकर ज़्यादातर बहुसंख्यकवादी राजनीतिक व्यवस्था वाली हो गई है। सिर्फ आर्थिक विकास से ही इन चिंताओं का समाधान नहीं हो सकता।

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