अमेरिका और ईरान के बीच हुए करार के बाद उम्मीद की जा रही थी कि पश्चिम एशिया में फिर से शांति और स्थिरता कायम हो जाएगी, मगर इजराइल का आक्रामक रुख इस पर पानी फेरता नजर आ रहा है। इजराइली सेना ने गुरुवार रात दक्षिणी लेबनान में कई स्थानों को लक्ष्य बनाकर हमले किए, जिसके बाद अमेरिका-ईरान के बीच प्रस्तावित वार्ता को भी फिलहाल टाल दिया गया। इससे प्रारंभिक शांति समझौते के क्रियान्वयन पर ही सवाल खड़े हो गए हैं।

इस समझौते के तहत साठ दिनों के भीतर ईरान के परमाणु कार्यक्रम पर स्थायी सहमति बनाने और होर्मुज जलमार्ग में तेल परिवहन व्यवस्था को सामान्य करने का लक्ष्य रखा गया है। मगर इजराइल के तल्ख तेवर वार्ता की राह में बाधक बन रहे हैं। सवाल है कि क्या अमेरिका ने ईरान के साथ करार से पहले इजराइल के नेतृत्व को विश्वास में नहीं लिया था? क्या यह समझौता इजराइल के लिए कोई मायने नहीं रखता? आखिर क्या वजह है कि ईरान को लेकर अमेरिका के नरम रुख के बावजूद इजराइल लेबनान के मोर्चे से पीछे हटने को तैयार नहीं है।

गौरतलब है कि अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने हाल ही में फ्रांस में ईरान के साथ प्रारंभिक समझौते पर हस्ताक्षर किए थे। जबकि ईरान के नेतृत्व ने अलग से दस्तावेज पर हस्ताक्षर किए थे। दोनों देशों के बीच हुए इस करार के मुताबिक, ईरान को अपने उच्च संवर्धित यूरेनियम भंडार को अंतरराष्ट्रीय निगरानी में कम करना होगा और परमाणु हथियार विकसित न करने की प्रतिबद्धता दोहरानी होगी।

हालांकि इससे जुड़े कई अन्य मुद्दों पर आगे बातचीत होनी बाकी है, जिसके लिए शुक्रवार को स्विट्जरलैंड में वार्ता की शुरुआत की जानी थी और इसमें अमेरिका के उपराष्ट्रपति जेडी वेंस को शामिल होना था। मगर गुरुवार देर शाम वेंस ने अचानक यह यात्रा रद्द कर दी। हालांकि आधिकारिक रूप से इसकी कोई ठोस वजह नहीं बताई गई, लेकिन खबरों के मुताबिक, इजराइल की ओर से लेबनान पर हमले तेज करने के कारण फिलहाल वार्ता टाल दी गई है।

सवाल है कि जब द्विपक्षीय समझौते में पश्चिम एशिया में सभी मोर्चों पर तत्काल सैन्य कार्रवाई रोकने की बात कही गई है, तो इजराइल लेबनान में हमले क्यों जारी रखे हुए है? इजराइल का स्पष्ट तौर पर कहना है कि उसके सैन्य बल तब तक लेबनान से नहीं हटेंगे, जब तक हिज्बुल्ला से उत्पन्न खतरे को समाप्त नहीं कर दिया जाता।

समझौते के क्रियान्वयन पर संशय का एक पहलू यह भी है कि ईरान ने होर्मुज जलमार्ग को खोलने पर सहमति तो जता दी है, लेकिन इस मार्ग की निगरानी का प्रभार संभाल रहे प्राधिकरण ने समझौते के बाद नए दिशा-निर्देश जारी किए हैं, जिसमें सभी जहाज संचालकों से अपना पंजीकरण कराने को कहा गया है। इससे यह आशंका जताई जा रही है कि होर्मुज जलमार्ग से जहाजों की आवाजाही के लिए ईरान शुल्क वसूलने की व्यवस्था लागू कर सकता है।

अगर ऐसा होता है, तो तेल और गैस परिवहन की लागत बढ़ जाएगी, जिससे इसकी कीमतों में इजाफा होना स्वाभाविक है। यानी ऊर्जा के मौजूदा संकट की वजह से भारत समेत जिन देशों में महंगाई बढ़ी है, वहां आम लोगों को ज्यादा राहत मिलने की उम्मीद भी कम ही रहेगी।

वहीं, अमेरिका समेत दुनिया के दूसरे देश ईरान की ओर से जहाजों पर शुल्क लगाने के सख्त खिलाफ हैं और ऐसे में शांति समझौते के तहत वार्ता शुरू करने तथा उसे अंजाम तक पहुंचाने की राह आसान नहीं होगी।

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