आम आदमी पार्टी (आप), तृणमूल कांग्रेस और शिवसेना (उद्धव) के सांसद दलबदल कर चुके हैं। ‘आप’ के 7 सांसद राज्यसभा के थे, लेकिन अभी लोकसभा के 3 सांसदों की बोली तय नहीं हुई है। तृणमूल और उद्धव शिवसेना के 26 लोकसभा सांसद तोड़े जा चुके हैं। यानी बिक चुके हैं। भाजपा के प्रवक्ता पार्टी को इतना मासूम और तटस्थ करार देने का ढोंग न करें, क्योंकि सांसद उसके अघोषित ‘ऑपरेशन दो-तिहाई’ के मद्देनजर तोड़े जा रहे हैं। नहीं तो बागियों की बैठकों में भाजपाई केंद्रीय मंत्री और मुख्यमंत्री क्या करते रहे हैं? हररोज, हर पल चाय-पानी ही चलता रहता है क्या? बहरहाल शिवसेना (उद्धव) के ‘बिकाऊ सांसद’ महाराष्ट्र के उपमुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे की शिवसेना में विलीन हो चुके हैं। गृहमंत्री अमित शाह अब उसे ही ‘असली शिवसेना’ मानते हैं। वह काफी हद तक उचित भी हैं, क्योंकि चुनाव आयोग ने उसे ही ‘असली शिवसेना’ की मान्यता दी है और चुनाव चिह्न भी उसे ही सौंप दिया गया है। चुनाव आयोग सक्षम, अधिकार प्राप्त संवैधानिक संस्था है। इसी तरह शरद पवार ने जिस एनसीपी की स्थापना की थी, अब वह उनके सगे भतीजे अजित पवार (अब दिवंगत) के कब्जे में है। उसे ही ‘असली एनसीपी’ की मान्यता प्राप्त है। चुनाव चिह्न भी उसे ही आवंटित किया जा चुका है। हालांकि ये दोनों मामले अभी सर्वोच्च अदालत के विचाराधीन हैं। तृणमूल कांग्रेस में तो बागी 60-65 विधायकों ने सामूहिक निर्णय लेकर ममता बनर्जी को अध्यक्ष पद से हटा दिया है और अरूप राय को नया अध्यक्ष चुन लिया है। कुछ उपाध्यक्ष और महासचिव भी तय किए गए हैं। कार्यकारिणी नई बनना भी तय लगता है। उसके बाद चुनाव आयोग की दहलीज पर दस्तक दी जाएगी। गृहमंत्री अमित शाह का ‘आशीर्वाद’ है, तो आयोग उसे भी ‘असली तृणमूल’ घोषित कर देगा। गृहमंत्री का संकल्प है कि ममता की तृणमूल का ‘सर्वनाश’ किए बिना वह राहत की सांस महसूस नहीं करेंगे।

तृणमूल के बागी 20 लोकसभा सांसद तो ‘नेशनल सिटीजन पार्टी ऑफ इंडिया’ सरीखी गुमनाम और बिन विधायक-सांसद की बौनी पार्टी में विलय कर चुके हैं। फिलहाल उनका प्रस्ताव स्पीकर ओम बिरला के विचाराधीन है। भाजपा तमिलनाडु की प्रमुख पार्टी द्रमुक पर भी डोरे डाल रही है, क्योंकि लोकसभा में उसके 22 सांसद हैं। बेशक राज्य में उनकी सरकार पराजित हो चुकी है। अभी तो छोटे और 1-2 सांसद वाले दलों को ‘खरीदना’ शेष है। ये तमाम दलबदल भीतरी असंतोष और नेतृत्व के प्रति बगावत के ही निष्कर्ष नहीं हैं, बल्कि सांसद तोड़े जा रहे हैं। 52वां और 91वां संविधान संशोधन कर जो दलबदल विरोधी कानून बनाया गया था, उसमें एक-तिहाई अथवा दो-तिहाई सांसदों-विधायकों के पालाबदल की व्यवस्था रही है। अब यह कानून कागजी साबित हो रहा है, क्योंकि जन-प्रतिनिधि बेचे-खरीदे जा रहे हैं। तो फिर इस कानून की जरूरत क्यों है? जैसा 1985 और 2003 से पहले था, वैसा ही रहने दीजिए। सांसदों-विधायकों को दलबदल करने की कानूनन छूट दे दी जाए। अरे, खुला बाजार सजा है, बोलियां लगने दीजिए। लोकतंत्र, संविधान, नैतिकता की परवाह क्यों की जाए? अमरीका, ब्रिटेन, कनाडा, ऑस्टे्रलिया, न्यूजीलैंड, दक्षिण अफ्रीका सरीखे बड़े लोकतांत्रिक देशों में दलबदल निरोधक कानून नहीं है।

फिर भी वहां इतना दलबदल नहीं होता, जिस व्यापक स्तर पर भारत में होता रहा है। उनके लिए राजनीतिक, चुनावी अनुशासन बेहद मायने रखता है। इस संदर्भ में, एक देशवासी होने के नाते, हमारा सुझाव है कि दलबदल कानून को रद्द कर दिया जाए। हालांकि प्रधानमंत्री मोदी यह सुझाव नहीं मानेंगे, क्योंकि उन्हें दलबदल कराने के लिए एक संवैधानिक व्यवस्था की आड़ चाहिए। वैसे भी देश में दलबदल की परंपरा पुरानी है और आजादी के पहले और उसके तुरंत बाद राजनीतिक दल टूट कर बिखरते और नए दल बनाए जाते रहे हैं। कांग्रेस टूटी, 1948 में कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी टूट कर आचार्य कृपलानी ने ‘किसान मजदूर प्रजा पार्टी’ बनाई। और भी कई उदाहरण हैं। अब पहले से भी ज्यादा दलबदल होने लगा है।

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