भारत पाकिस्तान के साथ बातचीत क्यों करे? राजनयिक, सांस्कृतिक, सामाजिक, पेशेवर रिश्ते क्यों बहाल करे? एक आतंकिस्तान देश को सबक सिखाना चाहिए अथवा संवाद के जरिए मुहब्बत का इजहार करना चाहिए? जो 117 चेहरे आज पाकिस्तान की पैरवी कर रहे हैं, क्या वे भूल गए कि ‘ऑपरेशन सिंदूर’ अभी जारी है? क्या वे पहलगाम का नरसंहार भूल गए? क्या पुलवामा में 40 ‘शहीदों’ की कुर्बानी भूल गए? क्या उरी से लेकर 26/11 मुंबई आतंकी हमले तक पाकपरस्त शैतानों और हत्यारों की साजिशें भी भूल गए? क्या इन पैरोकारों ने आतंकवाद में अपने किसी परिजन को खोया है? यह पीड़ा, हत्या, दर्द, खालीपन, सूने आंगन, उजड़े सिंदूर को कैसे और कौन भूल सकता है? आखिर भारत की मजबूरी क्या है, जो वह पाकिस्तान की आतंकी, हत्यारी हुकूमत के साथ बातचीत करे? इस भूखे, नंगे, कर्जदार देश के पल्ले क्या है, जो वह भारत को मुहैया करा सकता है? और फिर क्या गारंटी है कि संवाद और संबंधों की बहाली के बाद सरहदों पर तनाव ठहर जाएगा? सीमापार से आतंकी भेजे नहीं जाएंगे? वैश्विक मंचों पर, कश्मीर की आड़ में, भारत-विरोधी दुष्प्रचार थम जाएंगे? सांप की फितरत बदली है कभी? जिन 117 लोगों ने प्रधानमंत्री मोदी और कथित प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ को खुला पत्र लिख कर भारत-पाक संवाद और बेहतर, कारगर संबंधों की गुहार की है, उनमें जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री डॉ. फारूक अब्दुल्ला और महबूबा मुफ्ती के अलावा, पूर्व केंद्रीय मंत्री मणिशंकर अय्यर और सैफुद्दीन सोज भी शामिल हैं। मणिशंकर ने सलमान खुर्शीद के साथ पाकिस्तान जाकर गुहार की थी कि मोदी सरकार हटाने में मदद करें। यह नवंबर, 2015 का वाकया है। दोनों कथित कांग्रेस नेताओं का कहना था कि मोदी को हटाए बिना भारत-पाक संबंध बेहतर नहीं हो सकते। अब पैरोकारों की सूची में शामिल हैं, तो वह बिल्कुल बेमानी है।

खुफिया एजेंसी रॉ के प्रमुख रहे एएस दुल्लत भी सूची में हैं, जो पाकिस्तान की रूह तक से वाकिफ हैं और कई आतंकी हमलों के साक्षी रहे हैं। ओपी शाह, मनोज झा, जवाहर सरकार आदि कितने बड़े कूटनीतिज्ञ हैं, यह हम नहीं जानते, लेकिन सूची में जो 61 नाम भारतीयों के हैं, वे यकीनन प्रधानमंत्री मोदी के कट्टर विरोधी हैं और पाकपरस्त चेहरे हैं। आज उन्हें कौन पूछता है? क्या प्रासंगिकता है इनकी? क्या इनमें से किसी ने भी पाकिस्तान के प्रधानमंत्री को पत्र लिख कर आग्रह किया है कि आतंकी सांपों को पालना बंद करें? उनके अड्डे खत्म किए जाएं। हुकूमत और फौज आतंकियों की आर्थिक मदद करना और उन्हें ‘जेहादी समर्थन’ देना भी बंद करें। दरअसल आतंकवाद का जिक्र जब भी होता है, तो ये पैरोकार हकलाने लगते हैं या गाली की भाषा का इस्तेमाल करते हैं। अरे, पाकिस्तान के मंत्री धमकी दे रहे हैं कि हमने 130 परमाणु हथियार भारत के लिए रखे हैं। पूर्व विदेश मंत्री बिलावल भुट्टो आजकल ‘एटमी युद्ध’ की धमकी दे रहे हैं। एक नापाक मंत्री ने यहां तक कह दिया कि पानी को हाथ लगाया, तो हाथ तोड़ देंगे। पाकिस्तान के कथित उपप्रधानमंत्री इशाक डार सिंधु नदी का पानी रोकना युद्ध की कार्रवाई मानते हैं। क्या ‘ऑपरेशन सिंदूर’ के हमले भूल गया है पाकिस्तान, जिनमें उसके 11 एयरबेस को मिट्टी-मलबा कर दिया गया था? बहरहाल ऐसे आतंकी, धमकीबाज मंत्रियों की हुकूमत से भारत बात करेगा! क्यों करेगा? क्या ये 117 ‘रिटायर्ड चेहरे’ भूल गए हैं कि पाकिस्तान में बसे और सक्रिय आतंकियों ने हमारे 40,000 से अधिक बेगुनाह लोगों की हत्याएं की हैं? मठ-मंदिर ध्वस्त किए हैं? औरतों की आबरू, अस्मत लूटी है? पाकिस्तान में कौन लोग हैं, जो आपसी रिश्ते बेहतर चाहते हैं? अवाम को तो आटा, दाल, चावल, चीनी, फल-सब्जी भी मयस्सर नहीं है। क्या ऐसे अवाम को भयानक, कुरूप यथार्थों की पूरी जानकारी है? पाकिस्तान पहले बलूचिस्तान, खैबर, कथित आजाद कश्मीर में तो हालात शांत करे। वहां नापाक फौज अवाम को सरेआम गोलियों से भून रही है। अवाम विद्रोह पर है और सडक़ों पर आंदोलित है। जिसका अपना घर विभाजित है, टुकड़े-टुकड़े है, उससे भारत क्या बात करेगा और उससे क्या हासिल होगा? पैरोकारों को एक-दूसरे के फॉर्म हाउस में पार्टी करनी है और बिरयानी का लुत्फ उठाना है, तो वे स्वतंत्र हैं। भारत किसी आतंकिस्तान के साथ बातचीत नहीं करेगा।