यह ठोस अपशिष्ट प्रबंधन का प्रभावी और आधुनिक तरीका है, जो कचरे के पहाड़ों को कम करने के साथ-साथ हमारी ऊर्जा जरूरतों को भी पूरा करता है…

ऊर्जा किसी भी राष्ट्र की अर्थव्यवस्था, सुरक्षा और विकास की आधारशिला होती है। युद्ध अथवा वैश्विक भू-राजनीतिक संकट के समय ऊर्जा की निर्बाध उपलब्धता खाद्य सुरक्षा और रक्षा आपूर्ति जितनी ही महत्वपूर्ण हो जाती है। भारत ने नवीकरणीय ऊर्जा के क्षेत्र में उल्लेखनीय प्रगति की है, फिर भी वह अपनी तेल और गैस आवश्यकताओं का एक बड़ा हिस्सा आयात पर निर्भर करता है। ऐसी स्थिति में यदि अंतरराष्ट्रीय आपूर्ति श्रृंखलाएं बाधित हो जाएं, तो देश की ऊर्जा सुरक्षा प्रभावित हो सकती है। इतिहास साक्षी है कि युद्ध और अंतरराष्ट्रीय संघर्षों के दौरान ऊर्जा बाजारों में भारी अस्थिरता उत्पन्न होती है। तेल और गैस की कीमतों में वृद्धि, आपूर्ति में बाधा तथा परिवहन मार्गों के अवरुद्ध होने से ऊर्जा आयात करने वाले देशों को गंभीर चुनौतियों का सामना करना पड़ता है। इस संदर्भ में वेस्ट टू एनर्जी तकनीक भारत को ऊर्जा आत्मनिर्भरता और ऊर्जा संप्रभुता की दिशा में आगे बढ़ाने का एक प्रभावी माध्यम बन सकती है। यह तकनीक ठोस अपशिष्ट, कृषि अवशेषों और जैविक कचरे को बिजली, बायोगैस, ऊष्मा तथा जैव-ईंधन में परिवर्तित करती है। इससे एक ओर कचरा प्रबंधन की समस्या का समाधान होता है, वहीं दूसरी ओर घरेलू ऊर्जा उत्पादन में वृद्धि होती है। अपशिष्ट से ऊर्जा : वह प्रक्रिया है जिसमें अनुपयोगी कचरे को उपयोगी ऊर्जा, जैसे बिजली या ऊष्मा में बदला जाता है।

यह ठोस अपशिष्ट प्रबंधन का एक बेहद प्रभावी और आधुनिक तरीका है, जो कचरे के पहाड़ों को कम करने के साथ-साथ हमारी ऊर्जा जरूरतों को भी पूरा करता है। अपशिष्ट से ऊर्जा बनाने की मुख्य तकनीकें भस्मीकरण : कचरे को उच्च तापमान पर जलाया जाता है। इससे उत्पन्न ऊष्मा भाप बनाती है, जो टरबाइनों को चलाकर बिजली उत्पन्न करती है। बायोमेथेनेशन : गीले कचरे को ऑक्सीजन की अनुपस्थिति में सड़ाकर बायोगैस बनाई जाती है। गैसीकरण : कार्बनिक कचरे को सीमित ऑक्सीजन में गर्म करके सिंथेटिक गैस बनाई जाती है, जिसका उपयोग ईंधन के रूप में होता है। वेस्ट टू एनर्जी तकनीक के मुख्य लाभ : लैंडफिल का बोझ कम करना : डब्ल्यूटीई प्लांट नगरपालिका के ठोस कचरे का आयतन लगभग 90 प्रतिशत तक कम कर देते हैं, जिससे शहरों को भारत में हर साल पैदा होने वाले 62 मिलियन टन से अधिक कचरे का प्रबंधन करने में मदद मिलती है। मीथेन उत्सर्जन पर नियंत्रण : जैविक कचरे को लैंडफिल से हटाने से मीथेन गैस निकलना रुकती है। यह सीओ-2 से 28 गुना ज्यादा शक्तिशाली ग्रीनहाउस गैस है, जिससे जलवायु पर असर काफी कम होता है। नवीकरणीय बिजली उत्पादन : भारत के चालू 21 डब्ल्यूटीई प्लांट 170 मेगावाट से ज्यादा बिजली बनाते हैं, जो शहरों में विकेंद्रीकृत ऊर्जा आपूर्ति में योगदान देते हैं। एसडीजीज के साथ तालमेल : यह एसडीजी-7 (स्वच्छ ऊर्जा) और एसडीजी-11 (टिकाऊ शहर) का समर्थन करता है, क्योंकि यह शहरी कचरा प्रबंधन को नवीकरणीय ऊर्जा प्रणालियों के साथ जोड़ता है। भारत में कचरे से ऊर्जा उत्पादन के लिए सरकारी पहल : भारत सरकार ने अपशिष्ट से ऊर्जा क्षेत्र को बढ़ावा देने के लिए अनेक महत्वपूर्ण पहलें शुरू की हैं। स्वच्छ भारत मिशन (शहरी) 2.0 के अंतर्गत वैज्ञानिक ठोस अपशिष्ट प्रबंधन एवं वेस्ट टू एनर्जी संयंत्रों की स्थापना को प्रोत्साहित किया जा रहा है।

नवीन एवं नवीकरणीय ऊर्जा मंत्रालय द्वारा संचालित राष्ट्रीय जैव ऊर्जा कार्यक्रम के माध्यम से बायोगैस, संपीडि़त जैव गैस तथा बायोमास आधारित ऊर्जा परियोजनाओं को वित्तीय सहायता प्रदान की जाती है। सतत योजना और गोबरधन योजना के तहत जैविक अपशिष्ट, कृषि अवशेष एवं गोबर से स्वच्छ ईंधन और ऊर्जा के उत्पादन को बढ़ावा दिया जा रहा है। इसके अतिरिक्त वेस्ट-टू-वेल्थ मिशन नवाचार एवं तकनीकी समाधानों के माध्यम से अपशिष्ट को उपयोगी संसाधनों एवं ऊर्जा में परिवर्तित करने पर बल देता है। वहीं, ठोस अपशिष्ट प्रबंधन नियम 2016 अपशिष्ट के पृथक्करण, प्रसंस्करण और वैज्ञानिक निपटान को अनिवार्य बनाते हैं। ये सभी पहलें मिलकर स्वच्छता, ऊर्जा आत्मनिर्भरता, पर्यावरण संरक्षण तथा सतत विकास के लक्ष्यों को प्राप्त करने में महत्वपूर्ण योगदान दे रही हैं। राष्ट्रीय जैव-ऊर्जा मिशन : राष्ट्रीय जैव ईंधन नीति (2022) : ठोस अपशिष्ट प्रबंधन नियम (2016) : ड्राफ्ट वेस्ट टू एनर्जी नीति (2023)। भारत में अभी 90 प्लस डब्ल्यूटीई प्लांट चल रहे हैं। दिल्ली के ओखला, गाजीपुर और तिमारपुर प्लांट रोज 6500 टन कचरे से 50 प्लस मेगावाट बिजली बनाते हैं। पुणे और इंदौर में बायो-सीएनजी प्लांट गीले कचरे से बसें चला रहे हैं। सरकार स्वच्छ भारत मिशन 2.0 के तहत 2026 तक 500 से ज्यादा शहरों में डब्ल्यूटीई प्लांट लगाने का लक्ष्य रखती है। स्वच्छ भारत मिशन के अंतर्गत जहां देशभर के शहरों ने अपशिष्ट प्रबंधन और स्रोत पृथक्करण के माध्यम से कचरा खत्म करने पर ध्यान केंद्रित किया, वहीं इन प्रयासों के बीच अपशिष्ट से ऊर्जा उत्पन्न करने का लक्ष्य हासिल करना अभी भी बाकी था। हालांकि इस दौरान विभिन्न शहरी स्थानीय निकाय कचरे को ऊर्जा में परिवर्तित करने के लिए कई तरह के इनोवेशंस पर काम कर रहे थे और इस दिशा में उनके प्रयोग और अनुसंधान कड़ी मशक्कत के साथ निरंतर जारी रहे। अब हम विकसित देशों की तरह कचरे से ऊर्जा उत्पादन करने की दिशा में अग्रसर हैं।

इतना ही नहीं, कुछ शहर तो ऐसे भी हैं, जिन्होंने वेस्ट टू एनर्जी प्लांट्स में बनने वाली ऊर्जा का इस्तेमाल प्लांट्स को चलाने में किया। वहीं इस दिशा में सबसे खास उपलब्धि महाराष्ट्र के पिंपरी चिंचवाड़ ने हासिल की है, जहां नगर निगम के वेस्ट टू एनर्जी प्लांट्स में बनी ऊर्जा का उपयोग किया जा रहा है। भारत में पशुधन बहुत है। 2025 तक 30.30 करोड़ गाय-भैंस होने का अनुमान है। इनके गोबर से हर दिन 15 करोड़ किलो मीथेन गैस बनाई जा सकती है। साल में 300 दिन काम करके 4500 करोड़ किलो यानी 4.5 करोड़ टन गैस बनेगी। 1 टन से 66 सिलेंडर बनते हैं। इस हिसाब से 297 करोड़ सिलेंडर बनेंगे। भारत में 28 करोड़ परिवार हैं। अगर हर परिवार महीने में 1 सिलेंडर इस्तेमाल करे तो साल में 336 करोड़ सिलेंडर चाहिए। हमारे पास 297 करोड़ का उत्पादन हो सकता है, यानी लगभग पूरा घरेलू खपत का लक्ष्य पूरा हो जाएगा। इसके फायदे : आयात में कमी : विदेशी मुद्रा बचेगी और ऊर्जा में आत्मनिर्भरता आएगी। किसानों की आय भी बढ़ेगी।-अरविंद गुलेरिया

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