जमानत निर्णयों और आरक्षित निर्णयों की घोषणा के लिए सख्त समय-सीमा लागू करने के सुप्रीम कोर्ट के हालिया निर्देश भारत के जमानत न्यायशास्त्र में एक महत्वपूर्ण मोड़ साबित हो सकते हैं, बशर्ते इन आदेशों को निरंतर निगरानी, प्रणालीगत सुधारों और न्यायिक प्रथाओं में बदलाव का समर्थन प्राप्त हो।

मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची की अध्यक्षता वाली एक पीठ ने सभी उच्च न्यायालयों को बाध्यकारी निर्देश जारी किए हैं। इसमें निर्देश दिया गया है कि जमानत याचिकाओं का निपटारा सुनवाई के दिन ही, या अधिकतम 24 घंटे के भीतर किया जाए और आरक्षित निर्णयों की घोषणा 3 महीने की सख्त समय-सीमा के भीतर की जानी चाहिए। संविधान के अनुच्छेद 142 के तहत अपनी असाधारण शक्तियों का उपयोग करते हुए, शीर्ष अदालत ने न्यायिक कामकाज में समय-सीमा, पारदर्शिता और जवाबदेही को बढ़ावा देने के लिए एक राष्ट्रव्यापी ढांचा तैयार किया है, और कहा कि ‘पक्षकारों के लिए पूर्ण न्याय’ सुनिश्चित करने के लिए ऐसा हस्तक्षेप आवश्यक था। फैसले का समय मुकद्दमे से पहले की हिरासत और जेलों में भीड़भाड़ को लेकर बढ़ती ङ्क्षचता को दर्शाता है। नैशनल क्राइम रिकॉडर््स ब्यूरो द्वारा जारी भारत के नवीनतम जेल आंकड़े दिखाते हैं कि भीड़-भाड़ एक स्थायी समस्या बनी हुई है, जो मुख्य रूप से विचाराधीन कैदियों के असामान्य रूप से उच्च अनुपात से प्रेरित है। 2024 के अंत तक, देश में लगभग 1,333 जेलें थीं, जिनकी स्वीकृत क्षमता लगभग 4.53 लाख कैदियों की थी, जबकि वास्तविक कैदी संख्या 5.11 लाख से अधिक थी। 

आधे से अधिक राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में, जेलें स्वीकृत क्षमता से अधिक भरी हैं। 2024 में विचाराधीन कैदी, वे आरोपी जो अपने मामलों के लंबित रहने के दौरान हिरासत में रखे जाते हैं, कुल कैदी आबादी का लगभग 73 प्रतिशत थे, जो इस बात पर प्रकाश डालता है कि न्यायिक निर्णय लेने में देरी सीधे तौर पर स्वतंत्रता के लंबे समय तक हनन में कैसे बदल जाती है। जमानत सुनवाई में देरी और आरक्षित निर्णयों की घोषणा में सुस्ती कई समस्याओं को और खराब कर देती है। वे निर्दोष और जरूरतमंद प्रतिवादियों की हिरासत को लंबा खींचते हैं, परिवारों पर गंभीर वित्तीय और भावनात्मक बोझ डालते हैं और जेल के बुनियादी ढांचे व स्वास्थ्य सेवाओं पर दबाव बढ़ाते हैं। अनुभवजन्य अध्ययनों और मानवाधिकार संगठनों की रिपोर्टों ने बार-बार मुकद्दमे से पहले की लंबी हिरासत को कानूनी परामर्श तक अपर्याप्त पहुंच और निष्पक्ष-सुनवाई की गारंटी के क्षरण से जोड़ा है, विशेष रूप से हाशिए पर रहने वाले समूहों के लिए।

संस्थागत सुधारों को निर्धारित करने के लिए अदालत द्वारा अनुच्छेद 142 का आह्वान महत्वपूर्ण है क्योंकि यह देरी की समस्या के प्रणालीगत आयाम को पहचानता है-यह केवल अलग-थलग पड़े न्यायिक बैकलॉग के बारे में नहीं है, बल्कि संस्थागत संस्कृति, केस-मैनेजमैंट प्रथाओं और संसाधनों की कमी के बारे में भी है। ये निर्देश एक ऐसी समय-सीमा बनाने का प्रयास करते हैं जो त्वरित कार्रवाई को मजबूर करे लेकिन केवल समय-सीमा से अंतॢनहित बुराइयां दूर नहीं होंगी। कार्यान्वयन के लिए बेहतर शैड्यूलिंग और केस-मैनेजमैंट सिस्टम, अतिरिक्त न्यायिक और सहायक कर्मचारी, बेहतर कानूनी सहायता सेवाएं और प्रौद्योगिकी-संचालित पारदॢशता उपकरण जैसे पूरक उपायों की आवश्यकता होगी, जो वास्तविक समय में निगरानी को सक्षम करें।

अदालत द्वारा विचार किया जाने वाला एक व्यावहारिक कदम, जैसा कि कई सुधार समर्थकों ने सुझाव दिया है, समय-सीमा के जनादेश को स्पष्ट रूप से जिला न्यायपालिका तक बढ़ाना है। अधिकांश सामान्य जमानत याचिकाएं निचली अदालत (ट्रायल-कोर्ट) स्तर पर तय की जाती हैं और जिला अदालतें ही वह जगह है जहां देरी अक्सर शुरू होती है। जिला अदालतों को राष्ट्रीय ढांचे के दायरे में लाने के लिए स्थानीय केसलोड प्रबंधन, अंतर-अदालत समन्वय और ग्रामीण व कम संसाधनों वाले जिलों के लिए संसाधनों पर विशेष मार्गदर्शन की आवश्यकता होगी।
निगरानी स्वतंत्र और कठोर होनी चाहिए। प्रवर्तन के बिना बैंचमार्क केवल प्रतीकात्मक बनकर रह जाने का जोखिम रखते हैं। सुप्रीम कोर्ट आवधिक समीक्षाओं, उच्च न्यायालयों के लिए रिपोर्टिंग आवश्यकताओं और समय-सीमा का लगातार उल्लंघन होने पर एक एस्केलेशन तंत्र पर विचार कर सकता है। क्षमता निर्माण भी मायने रखेगा-केस-फ्लो प्रबंधन पर प्रशिक्षण, जहां उपयुक्त हो वहां आभासी सुनवाई का उपयोग और स्थगन व लिसिं्टग प्रथाओं के आसपास स्पष्ट नियम परिहार्य देरी को कम करेंगे।

सख्ती से समयबद्ध दृष्टिकोण के जोखिम भी हैं, जिन्हें अदालत को प्रबंधित करने की आवश्यकता है। कठोर समय-सीमा यांत्रिक निर्णयों के लिए प्रोत्साहन पैदा कर सकती है या जटिल मामलों को संभालने वाले न्यायाधीशों पर दबाव डाल सकती है। इसलिए, किसी भी प्रणाली में उन मामलों के लिए प्रलेखित अपवादों की अनुमति होनी चाहिए, जहां जटिलता या असाधारण परिस्थितियां देरी को सही ठहराती हैं और वे अपवाद समीक्षा के अधीन होने चाहिएं। सुरक्षा उपाय यह सुनिश्चित कर सकते हैं कि गति, तर्कपूर्ण निर्णयों और निष्पक्ष प्रक्रिया की कीमत पर न आए। व्यक्तिगत स्वतंत्रता पर सुप्रीम कोर्ट का जोर संवैधानिक प्राथमिकताओं के अनुरूप है लेकिन इस सुधार एजैंडे की सफलता निरंतर संस्थागत प्रतिबद्धता पर निर्भर करेगी। यदि जिला अदालतों तक विस्तारित कवरेज, पारदर्शी डाटा सिस्टम, संसाधन आबंटन और मापे गए सुरक्षा उपायों के साथ इसे ईमानदारी से लागू किया जाए, तो ये निर्देश अनावश्यक प्री-ट्रायल हिरासत को कम कर सकते हैं, जेलों पर दबाव कम कर सकते हैं और न्याय प्रणाली में जनता के विश्वास को मजबूत कर सकते हैं। हालांकि, इन अनुवर्ती कदमों के बिना, समय-सीमा केवल महत्वाकांक्षी बनी रह सकती है, जबकि भीड़-भाड़ और देरी से न्याय मिलने की समस्या बनी रहेगी।-विपिन पब्बी    

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