अमरीका के पूर्व रक्षा सचिव ने 12 फरवरी, 2002 को प्रसिद्ध रूप से कहा था कि ‘जैसा कि हम जानते हैं, कुछ चीजें ऐसी हैं जो हम जानते हैं कि हम जानते हैं। कुछ चीजें ऐसी हैं जो हम जानते हैं कि हम नहीं जानते लेकिन कुछ चीजें ऐसी भी हैं जिन्हें हम नहीं जानते कि हम नहीं जानते।’ हालांकि रुम्सफील्ड के ये शब्द सद्दाम हुसैन के शासनकाल के ईराक द्वारा विभिन्न आतंकवादी समूहों को ‘सामूहिक विनाश के हथियारों’ की आपूॢत के संबंध में सबूतों के पूर्ण अभाव के बारे में पूछे गए एक सवाल के जवाब में थे। यद्यपि इस टिप्पणी ने उन्हें 2002 का ‘फुट-इन-द-माऊथ’ पुरस्कार (राजनीतिक अस्पष्टता की बकवास के लिए) दिलाया लेकिन चौथी औद्योगिक क्रांति की प्रौद्योगिकियों के विकासवादी प्रक्षेपवक्र और मानव जाति पर उनके प्रभाव के मामले में यह बहुत सटीक है।

यह कहना सामान्य बात होगी कि अमरीका और चीन चौथी औद्योगिक क्रांति की प्रौद्योगिकियों में अग्रणी हैं। जबकि अमरीका क्वांटम कम्प्यूटिंग, सैमी-कंडक्टर, जीनोमिक्स, जैव प्रौद्योगिकी और अंतरिक्ष के क्षेत्र में व्यापक रूप से आगे है, वहीं चीन इलैक्ट्रिक बैटरी, हाइपरसोनिक, सौर प्रौद्योगिकी, 6-जी नैटवर्क और ड्रोन एवं रोबोटिक्स में नेतृत्व कर रहा है। ये दोनों देश आॢटफिशियल इंटैलिजैंस, उन्नत सामग्री, क्वांटम सैंसर, मशीन लॄनग और नैनो टैक्नोलॉजी के क्षेत्र में कड़ी प्रतिस्पर्धा कर रहे हैं। यह सूची सांकेतिक है, न कि विस्तृत। हालांकि, एक व्यापक वास्तविकता की जांच अनिवार्य है। अमरीका और उसके निकटतम प्रतिद्वंद्वी चीन के बीच प्रतिद्वंद्विता चौथी पीढ़ी की प्रौद्योगिकियों के सैन्य अनुप्रयोगों के क्षेत्र में विशेष रूप से बढ़ रही है। शी जिनपिंग ने हाल ही में इस संघर्ष पर प्रकाश डालते हुए यह रेखांकित किया कि क्या अमरीका और चीन ‘थ्यूसीडाइड्स ट्रैप’ से उबर सकते हैं और महाशक्तियों के बीच संबंधों के लिए एक नया प्रतिमान स्थापित कर सकते हैं? यह फ्रंटियर प्रौद्योगिकियों में अपनी बड़ी बढ़त का लाभ उठाने वाली एक संभावित जी-2 हो सकती है। मध्य शक्तियां संरचनात्मक रूप से उस महाशक्ति व्यवस्था पर निर्भर हैं, जिसकी वे आलोचना तो करती हैं लेकिन उसे बदल नहीं सकतीं। एक उदार और अंतर्राष्ट्रीयवादी व्यवस्था मध्य शक्तियों को कुछ ध्यान देने, गठबंधनों की सदस्यता देने और सैन्य और राजनयिक समर्थन के बदले में मानदंड-निर्धारण में भागीदारी की अनुमति देने के लिए तैयार थी। आज का अमरीकी प्रशासन ऐसे खाकों के प्रति तिरस्कार प्रदर्शित करता है।

ट्रम्प प्रशासन मध्य शक्तियों को थोड़ी ढील दे सकता है और वह भी केवल हाशिए पर लेकिन वह अंतर्राष्ट्रीय प्रणाली के केंद्र को आकार देने के मध्य शक्तियों के प्रयासों को स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं, विशेष रूप से तब जब रू्रत्र्र (मेक अमेरिका ग्रेट अगेन) का भूत सक्रिय रूप से वैश्विक व्यवस्था के हार्डवेयर और सॉफ्टवेयर को फिर से डिजाइन करने की कोशिश कर रहा है। जब मध्य शक्तियां और कम विकसित राष्ट्र निजी तकनीक दिग्गजों की सद्भावना और असंख्य व्यापारिक हितों पर निर्भर रहेंगे, जिनका राजस्व अधिकांश विकासशील अर्थव्यवस्थाओं के जी.डी.पी. से अधिक है, तो हार्ड और सॉफ्ट पावर के संदर्भ में अपनी रणनीतिक स्वायत्तता बढ़ाने में क्या प्रभावशीलता है? हालांकि यहां भी वास्तविकता निराशाजनक है। उदाहरण के तौर पर, केवल आर्टिफिशियल इंटैलिजैंस (ए.आई.) पर, चीन डाटा हब बनाने के लिए अगले 5 वर्षों में 295 बिलियन अमरीकी डॉलर खर्च करेगा। चीन ने अकेले 2025 में ए.आई. पर 98 बिलियन अमरीकी डॉलर खर्च किए। चीन का सरकारी खर्च 56 बिलियन अमरीकी डॉलर था।

अमरीका स्थित 5 निजी कंपनियां-अमेजन, गूगल, माइक्रोसॉफ्ट, मेटा और ओरेकल-सामूहिक रूप से 2026 में 700 बिलियन अमरीकी डॉलर का निवेश करेंगी। इसकी तुलना में, भारत का ए.आई. मिशन 2025-2030 के बीच केवल 1.2 बिलियन अमरीकी डॉलर खर्च करेगा। फिर इतने दिखावटी ए.आई. शिखर सम्मेलन आयोजित करने का क्या उद्देश्य है, जब अपनी बात पर अमल करने की कोई इच्छाशक्ति ही नहीं है? इसलिए मध्य शक्तियों को यह तय करना होगा कि क्या वे वैश्विक ए.आई. अर्थव्यवस्था के मध्य प्रबंधन को प्रशिक्षित करना चाहती हैं, या इसके सी-सूट का निर्माण करना चाहती हैं। जब तक मध्य शक्तियों के पास अपने स्वयं के आधारभूत मॉडल नहीं होंगे, वे हमेशा प्रौद्योगिकी के मोर्चे पर हाशिए पर रहेंगी, क्योंकि डीप और बिग टैक का क्षितिज घातीय गति से विकसित और विस्तारित हो रहा है। यह केवल भारी सार्वजनिक निवेश या बहुत गहन सार्वजनिक-निजी भागीदारी के साथ ही हो सकता है, क्योंकि अत्याधुनिक 2026 फ्रंटियर रन को मुद्रीकृत करने से पहले उन्हें बनाने और संचालित करने में 2 ट्रिलियन अमरीकी डॉलर से अधिक का खर्च आ सकता है। ए.आई. केवल एक उदाहरण है, ऐसी अनगिनत अन्य फ्रंटियर प्रौद्योगिकियां हैं, जो मानवीय अस्तित्व के तौर-तरीकों को फिर से आकार दे रही हैं। मध्य शक्तियां यदि चाहें, तो अनुसंधान और विकास, हार्डवेयर और सॉफ्टवेयर विकास, कर्मियों के कौशल, तैनाती और पैमाने पर प्रौद्योगिकियों को लागू करने तथा लचीलापन और अतिरेक क्षमता निर्माण के लिए संसाधनों को एकत्रित करके अपनी सामूहिक ताकत का लाभ उठा सकती हैं।

यहीं पर जापान, दक्षिण कोरिया, ताइवान, इंडोनेशिया, ऑस्ट्रेलिया, भारत, यू.ए.ई., कतर, सऊदी अरब, तुर्की, जर्मनी, फ्रांस, कनाडा, ब्राजील, अर्जेंटीना और चिली जैसे देश अपनी क्षमता से कम प्रदर्शन कर रहे हैं और अपने आंतरिक अभिसरण का लाभ नहीं उठा रहे। यही वह जगह है जहां सामूहिक ताकत निहित है लेकिन व्यावहारिक सहयोग तो दूर, इसका बौद्धिक निर्माण भी अस्पष्टता के दायरे में बना हुआ है। विपत्ति में ही अवसर होता है और इस तथ्य को देखते हुए कि द्वितीय विश्व युद्ध और शीत युद्ध के विजेताओं द्वारा निर्मित उदार लोकतांत्रिक पोस्ट-कोल्ड वॉर व्यवस्था को उसके अपने निर्माता द्वारा ही उलट दिया गया है, इसलिए मध्य शक्तियों को क्षेत्रीय रक्षा सहयोग को तेज करना चाहिए और विशिष्ट शैलियों में वैश्विक प्रौद्योगिकी आधारित गठबंधन बनाने चाहिएं, विशेष रूप से आक्रामक और रक्षात्मक क्षमताओं के क्षेत्र में, यह देखते हुए कि पिछले 4 वर्षों में सैन्य मामलों में क्रांति आई है। यदि मध्य शक्तियों के लिए कभी कोई क्षण था, तो वह यहीं और अभी है।-मनीष तिवारी

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