मध्‍य प्रदेश डिंडौरी जिले के 40 करोड़ साल (सरई) के पेड़ों पर खतरा मंडरा रहा है. लंबी मूंछ वाला बोरर कीड़ा इन पेड़ों को अंदर से खोखला कर रहा है. साल के जंगल में करीब 30 साल बाद यह कीड़ा काल बनकर लौटा है. सामान्य वनमंडल के पूर्व करंजिया, पश्चिम करंजिया, दक्षिण समनापुर और बजाग वन परिक्षेत्र के 1.46 लाख से अधिक साल के पेड़ों को अब तक नुकसान पहुंच चुका है.

बोरर कीट के बढ़ते प्रकोप को देखते हुए वन विभाग ने ‘ऑपरेशन ट्रैप ट्री’ शुरू किया. साथ ही एक कीड़े पर 2 रुपये का इनाम घोषित किया. इसके बाद से ग्रामीण अब तक 10 लाख से ज्‍यादा कीड़े पकड़कर 20 लाख रुपये कमा चुके हैं. ग्रामीण कीड़ों की माला बनाते हैं और फिर वन विभाग को सौंप रहे हैं. सबसे खास बात यह है क‍ि इस कीड़े को सूरज उगने से पहले पकड़ा जाता था, क्‍योंकि बाद में वे उड़ने लगते हैं. 

सबसे पहले जानिए क्‍या है बोरर कीट? 

  • साल के पेड़ों को नुकसान पहुंचाने वाले इस खतरनाक बोरर कीट का वैज्ञानिक नाम हॉपलोसिरेंबिक्स स्पाइनिकॉर्निस (Hoplocerambyx spinicornis) है.
  • यह भूरे रंग का होता और इसकी लंबी मूंछे होती हैं. 
  • बोरर कीट जून-जुलाई के महीने में साल के पेड़ों की छाल के अंदर अंडे देते हैं.
  • अंडों से निकलने के बाद ये पेड़ के तने के अंदर घुसकर उसे धीरे-धीरे खाते हैं और अंदर से खोखला कर देते हैं. 
  • कीट के हमले के कारण प्रभावित साल के पेड़ के नीचे लकड़ी के बुरादे जैसा पाउडर जमा होने लगता है. 
  • कीट के हमले से साल के पेड़ की ग्रोथ (वृद्धि) पूरी तरह रुक जाती है, जिससे 300 साल तक जीने की क्षमता रखने वाला मजबूत पेड़ सूखकर खत्म हो जाता है. 
  • इस कीड़े की सबसे खास बात यह है क‍ि सूरज निकलने के बाद यह उड़ने लगता है. 

10 लाख कीड़े पकड़े, ग्रामीणों ने ₹20 लाख कमाए 

साल 1995 के बाद डिंडौरी के 1.50 लाख हेक्टेयर क्षेत्र में फैले साल के जंगल में बोरर कीट के बढ़ते प्रकोप को देखते हुए वन विभाग ने ‘ऑपरेशन ट्रैप ट्री’ शुरू किया है. एक कीड़े पर 2 रुपये का इनाम घोषित कर इस मुहीम से ग्रामीणों को जोड़ा गाया. 20 जून से अब तक ग्रामीण 10 लाख साल बोरर कीट पकड़ चुके हैं. इसके बदले उन्‍हें 20 लाख रुपये का भुगतान किया जा रहा है. यह राश‍ि सीधे उनके खाते में जमा की जा रही है. 

कैसे पकड़े जा रहे कीड़े? 

  • वन विभाग साल के पेड़ों की छाल का ‘रेजिन’ कूटकर उसका पाउडर ग्रामीणों के घरों के आसपास रखवाता है, जिसकी तीखी गंध से आकर्षित होकर कीड़े वहां खिंचे चले आते हैं.
  • सभी कीड़ों को सुबह सूरज निकलने से पहले (सुबह 5 से 7 बजे के बीच) पकड़ लिया जाता है, क्योंकि धूप निकलते ही ये कीड़े उड़ने लगते हैं और हाथ नहीं आते.
  • ग्रामीण सबसे पहले पेड़ों की छाल में मौजूद उन छोटे छेदों या दरारों को ढूंढते हैं, जहां ये कीड़े और उनके लारवा छिपे होते हैं.
  • छिपे हुए कीड़ों को बाहर निकालने के लिए उन छेदों को गीली मिट्टी, पत्तियों या लकड़ी के टुकड़ों से आंशिक रूप से बंद कर दिया जाता है, जिससे दम घुटने के कारण कीड़े बाहर भागने पर मजबूर होते हैं.
  • कुछ जगहों पर पेड़ों के पास हल्का धुआं किया जाता है, जिससे ऑक्सीजन की कमी होने पर कीड़े तुरंत तने से बाहर निकल आते हैं.
  • जैसे ही कीड़ा तने या जाल से बाहर आता है, ग्रामीण उसे बिना वक्त गंवाए हाथ, चिमटी या पतली लकड़ी की मदद से पकड़कर डिब्बे या थैली में बंद कर लेते हैं.
  • इसके बाद उनकी माला बनाकर वन विभाग कार्यालय में जमा करते हैं. प्रति सिर के हिसाब से भुगतान किया जाता है. 
  • जुलाई के अंत में अधिकारियों की मौजूदगी में इन कीटों का वैज्ञानिक तरीके से नष्टीकरण किया जाएगा.
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