आज ईरान युद्ध ऐसी पराकाष्ठा पर पहुंच गया है, जहां 1949 की जिनेवा अंतरराष्ट्रीय सन्धियों का उल्लेख अनिवार्य है। अमरीकी राष्ट्रपति टं्रप और ईरान के आईआरजीसी ने तो उन सन्धियों के प्रति आंखें मूंद ली हैं, अब यह हकीकत लगता है। विध्वंस, विस्फोट और अंतत: विनाश जारी है, जिनमें मानवाधिकार और मानवीय व्यवस्थाएं भी कुचली जा रही हैं। कोई वैश्विक संस्थान अथवा मंच या राष्ट्र-समूह नहीं है, जो इन पागल, बौखलाए और संहारी जंगियों को समझा सकें या रोक लगा सकें। हमें एक बार फिर लिखना-कहना पड़ रहा है कि संयुक्त राष्ट्र अब एक लुंज-पुंज संस्थान बन कर रह गया है। अब यह भाषण पेलने का ही मंच रह गया है, लिहाजा उस पर ढक्कन बंद कर देना चाहिए। युद्ध के अलावा, अब यह संस्थान विस्थापन, शरण, भोजन, पानी, स्वास्थ्य, संरक्षण और जलवायु-परिवर्तन तक किसी भी लिहाज से सशक्त मंच नहीं रहा है, क्योंकि अब कोई भी देश उसकी अपील या आह्वान की परवाह तक नहीं करता। वीटो वाले देशों के अपने गिरोह, षड्यंत्र और कूटनीतिक हित हैं। अब विश्व के असंख्य करदाताओं के अरबों डॉलर (या रुपए) फूंकना बेमानी है। बहरहाल जिनेवा सन्धि के अनुच्छेद 52 में स्पष्ट प्रावधान है कि युद्ध के दौरान नागरिकों, स्कूलों, अस्पतालों, नागरिक व्यवस्थाओं पर हमले नहीं किए जाएंगे। अनुच्छेद 54 में उल्लेख है कि पानी, खाद्य और अन्य नागरिक सुविधाओं पर हमला करना या उन्हें नष्ट करना प्रतिबंधित है। यह चेतावनी भी जोड़ी गई है कि यदि नागरिकों की जान का खतरा है, तो इन सुविधाओं और व्यवस्थाओं पर हमले पूरी तरह निषिद्ध हैं। ये चार सन्धियां खुद दुनिया के बड़े देशों ने, आपसी विमर्श के बाद, पारित की थीं, हस्ताक्षर किए थे, लेकिन युद्ध कोई भी हो, इन सन्धियों की धज्जियां उड़ाई जाती रही हैं। मौजूदा ईरान युद्ध हो अथवा साढ़े चार साल से जारी रूस-यूक्रेन युद्ध हो, ये सन्धियां चीत्कार करती रही हैं। ऐसा आभास होता है मानो जिनेवा सन्धियों के खिलाफ ही जंग जारी हैं! अमरीका ने तो ईरान युद्ध की शुरुआत में ही एक स्कूल पर हमला कर 168 बच्चियों का सामूहिक नरसंहार कर दिया था। अमरीका के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं, कोई दंडात्मक फैसला नहीं, महज बयान से क्या होता है?

अमरीकी लड़ाकू विमान बीती 11 रातों से ईरान पर लगातार मिसाइल हमले, बमबारी कर रहे हैं, हमले होर्मुज तट से राजधानी तेहरान तक विनाश की कहानियां लिख रहे हैं, त्रासदियां कितनी हुईं, फिलहाल इनका कोई डाटा सामने नहीं है। नुकसान अकल्पनीय है। हमले बिजलीघरों, पानी के संयंत्रों, पुलों, इमारतों, परमाणु स्थलों के करीब किए जा रहे हैं, लेकिन विश्व में जिनेवा सन्धियों को लेकर कोई हस्तक्षेप या बयान सामने नहीं आया है। दुनिया के सबसे बड़े गुंडे के खिलाफ बोलने की हिमाकत कौन कर सकता है? ईरान में राष्ट्रपति मसूद पेजेशकियान की जानकारी के लिए एक सर्वेक्षण किया गया। उसमें 45 फीसदी लोग युद्ध के कारण खौफजदा सामने आए, करीब 49 फीसदी ने युद्ध बढऩे का डर जताया, 44.3 फीसदी ने युद्धविराम की इच्छा जताई, 81 फीसदी से अधिक ऐसे थे, जिन तक बुनियादी सुविधाओं और सामान की पहुंच नहीं थी, करीब 63 फीसदी लोगों में युद्ध के कारण गुस्सा और चिड़चिड़ापन बढ़ा है और 50 फीसदी से अधिक लोगों में किसी बेहतर सुधार की उम्मीद नजर नहीं आई। साफ है कि ईरान युद्ध में जिनेवा सन्धियां चीत्कार कर रही हैं। लोगों की सुनने वाला कोई नहीं है। काम-धंधे छिन रहे हैं, बेरोजगारी के साथ भुखमरी भी बढ़ रही है। अमरीका भी यही चाहता है कि ईरान का अवाम मौजूदा हुकूमत के खिलाफ विद्रोह पर उतर आए। यही अमरीका की असल सामरिक कामयाबी होगी। राष्ट्रपति टं्रप के आदेश हैं कि ईरान में ‘नरक’ के दरवाजे खोल दिए जाएं। एक साथ 17 शहरों और 95 ठिकानों पर अमरीकी हमले किए गए हैं। पलटवार में ईरान ने जॉर्डन को विनाशक हमलों का ‘एपिसेंटर’ बना दिया है। जॉर्डन के साथ-साथ बहरीन, कुवैत, कतर, ओमान, सीरिया में भी हमलों ने तबाही मचा रखी है। अमरीकी सैनिक भी मारे गए हैं, जबकि 400 से अधिक घायल बताए जा रहे हैं। अमरीका के 9.91 लाख करोड़ रुपए खर्च हो चुके हैं। अमरीका में जन-विरोध उभरता जा रहा है। सीनेट में भी सवाल पूछे गए कि टं्रप कब तक यह युद्ध जारी रखेंगे? जवाब कौन देगा?

Share.

Comments are closed.

chhattisgarhrajya.com

ADDRESS : GAYTRI NAGAR, NEAR ASHIRWAD HOSPITAL, DANGANIYA, RAIPUR (CG)
 
MOBILE : +91-9826237000
EMAIL : info@chhattisgarhrajya.com
July 2026
M T W T F S S
 12345
6789101112
13141516171819
20212223242526
2728293031  
Exit mobile version