लोकसभा में पेपर लीक के संशोधित बिल पर चर्चा बुधवार को भी जारी रही। उससे पहले 9 घंटे, देर रात, तक सदन में चर्चा होती रही और ठोस सुझावों के बिना राजनीतिक कीचड़ उछाला जाता रहा। बहस के समाहार में प्रधानमंत्री, गृहमंत्री या नए शिक्षा मंत्री जो भी जवाब देंगे, वह भी ‘राजनीतिक’ ही होगा, लिहाजा उसका विश्लेषण बाद में करेंगे। विडंबना यह है कि पेपर लीक, शिक्षा-सुधार, परीक्षा-प्रणाली में सुधार और समग्रत: भारत की शिक्षा-व्यवस्था पर संसद जैसे सर्वोच्च, लोकतांत्रिक मंच पर बहस रखी गई थी, लेकिन एक भी सांसद ने सुझाव नहीं दिया कि बदलाव कैसे संभव हैं? कांग्रेस भाजपा को कोसती रही, समाजवादी पार्टी और बची-खुची तृणमूल कांग्रेस ने भी भाजपा-एनडीए सरकार को ‘नाकाम’ करार दिया, आतंकवाद और आपातकाल सरीखी अप्रासंगिक, उत्तेजक स्थितियों का भी जिक्र किया गया, आईआईटी मद्रास के निदेशक एवं अपने क्षेत्र के विख्यात विद्वान प्रो. कामकोटि को ‘गोमूत्र विशेषज्ञ’ करार दिया गया, लेकिन किसी ने यह सुझाव नहीं दिया कि पेपरलीक और उसके राज्यों में फैले माफिया पर काबू कैसे पाया जा सकता है। कुछ सांसद अपवाद हो सकते हैं, लेकिन वे ‘नक्कारखाने में तूती’ समान ही होंगे! सारांशत: हम इस बहस को ‘बेमानी’ मानते हैं। हमें लगता है कि पेपर लीक किसी भी राजनीतिक दल की बुनियादी चिंता नहीं है, लेकिन इस मुद्दे पर वे युवा, छात्र आंदोलन की आड़ में छिप कर मौजूदा मोदी सरकार और भाजपा पर राजनीतिक हमले करने की रणनीति पर जरूर सक्रिय हैं। भाजपा सांसद भी जवाहर लाल नेहरू से लेकर डॉ. मनमोहन सिंह तक की कांग्रेस सत्ताओं को ‘नकारा’, ‘शिक्षा-विरोधी’ करार देने में जुटे रहे। दरअसल पेपरलीक के मुद्दे पर ही वोट नहीं मिलते, लेकिन देश की युवा-शक्ति इतनी व्यापक है कि किसी भी सत्ता की चूलें हिला सकती है और किसी को भी सत्ता में ला सकती है। एक भी सांसद ने हमारी शिक्षा-व्यवस्था के ‘काले, अद्र्धसत्य यथार्थ’ को संसद में पेश नहीं किया कि हम कागजी डिग्रियों वाले, बेरोजगार स्नातक पैदा करने वाले देश हैं।
दरअसल भारतीय शिक्षा-प्रणाली ज्ञान और कौशल के बजाय रटने की पद्धति, अत्यधिक प्रतिस्पद्र्धा और नंबरों की अंधी दौड़ पर आधारित है, नतीजतन देश में स्नातक तो 13 गुना बढ़े हैं, लेकिन बेरोजगार भी 16 गुना बढ़े हैं। जेन-जी की उम्र 15-29 साल के करीब 32.2 करोड़ युवा आज भी ‘बेरोजगार’ हैं। क्या इसे ही ‘जनसांख्यिकीय लाभांश’ माना जाता है? सांसदों को उन बेरोजगारों की चिंता क्यों होगी? वे उनके परिजन थोड़े ही हैं! एक भी सांसद ने यह उल्लेख नहीं किया कि देश की बेरोजगारी दर 16.2 फीसदी से भी आगे बढ़ रही है। देश की करीब 69 फीसदी आबादी 15-64 साल के आयु-वर्ग की है। कमोबेश यह उम्र काम करने योग्य मानी जाती रही है, लेकिन काम, रोजगार, नौकरी ही उपलब्ध नहीं है। सरकारी नौकरी सिर्फ 4-5 फीसदी लोगों को ही नसीब है और निजी, असंगठित क्षेत्र में 95-96 फीसदी रोजगार, नौकरियां हैं। वहां वेतनमान, दिहाड़ी, काम करने के मूल्य बेहद असंतुलित हैं, लिहाजा युवाओं की भीड़ सरकारी नौकरी की अंधी दौड़ में शामिल होने को विवश है। सरकारी नौकरी नहीं मिलती या उम्र निकलने लगती है, तो युवा आत्महत्या करने लगते हैं अथवा अपराध का रास्ता अख्तियार कर लेते हैं। क्या संसदीय बहस के दौरान इन सच्चाइयों को उठाया गया? क्या इन पहलुओं पर चर्चा नहीं होनी चाहिए थी? आश्चर्य यह है कि बेरोजगारी दर सर्वाधिक साक्षर राज्य केरलम् में सबसे अधिक 18.2 फीसदी है। तेलंगाना भी कांग्रेसशासित राज्य है, वहां भी बेरोजगारी दर 18 फीसदी के करीब है। पंजाब में केजरीवाल की ‘आप’ की सरकार है, वह शिक्षा-सुधारक पार्टी होने का दावा करती रही है, लेकिन वहां भी बेरोजगारी दर 17 फीसदी के करीब है और आंध्रप्रदेश जैसे प्रौद्योगिकी वाले राज्य में भी 16.2 फीसदी बेरोजगारी है। पढ़-लिख लेंगे, नीट भी पास कर लेंगे, स्नातक, परास्नातक भी हो जाएंगे, लेकिन रोजगार के अवसर कहां हैं? सरकार और उद्योगपति इस तथ्य पर मत इतराएं कि देश में अरबपति 576 हो गए हैं। बड़ी ऊंची छलांग लगाई है, लेकिन देश में प्रति व्यक्ति आय औसतन कितनी है? सभी जानते हैं, लिहाजा अरबपति होना भी हमारी आर्थिक असमानता का ‘विद्रूप सच’ है।

