उच्चतम न्यायालय का यह मत सर्वथा उचित है कि हिंसा चाहे किसी पक्ष की हो उसकी स्वतंत्र व निष्पक्ष जांच होनी चाहिए। उच्चतम न्यायालय की पीठ में मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना शामिल थे। स्पष्टत: यह एक महत्वपूर्ण पीठ है। प्रचार शक्ति के कारण ऐसा लग रहा है जैसे केवल पुलिस ने एकपक्षीय हिंसा की। पुलिस की ज्यादती है तो उसकी सही तरीके से जांच हो। पर जिस तरह जगह-जगह पुलिस की भी गाडिय़ां तोड़ी गईं, पुलिस पर हमले हुए , पत्रकारों पर हमले हुए, पत्रकारों को घेर कर रखा गया, अनेक के लिए काम करना कठिन हो गया, महिला पत्रकारों तक के साथ हिंसा हुई उन सबकी अनदेखी भविष्य में पूरे देश के लिए खतरनाक साबित होगी।
इसलिए उच्चतम न्यायालय का यह मानना बिल्कुल उचित है कि आरोपों से प्रथम दृष्टया ऐसा मामला बनता है, जिसके लिए एक उच्च-स्तरीय पैनल द्वारा विस्तृत, निष्पक्ष और तटस्थ जांच की जरूरत है। न्यायालय ने केंद्र सरकार के साथ-साथ दिल्ली, उत्तर प्रदेश, बिहार, महाराष्ट्र, केरल और मध्य प्रदेश समेत अन्य संबंधित राज्यों के मुख्य सचिवों से उत्तर मांगा है। न्यायपीठ ने अपने आदेश में कहा कि याचिकाकत्र्ताओं के आरोपों से स्वतंत्र जांच का एक शुरुआती मामला बनता है। न्यायालय की यह पंक्ति देखिए, ऐसी जांच में घायल पुलिसकर्मियों के परिवारों की चिंताओं और केंद्र सरकार की दलीलों की भी समान रूप से जांच होनी चाहिए। वैसे न्यायालय ने यह भी आदेश दे दिया कि बिना किसी आपराधिक रिकॉर्ड वाले हिरासत में लिए गए सभी नाबालिगों और छात्रों को तुरंत रिहा किया जाए। साथ ही अभी किसी तरह की दंडात्मक कार्रवाई रोकने का भी आदेश दिया है।
इसमें तत्काल कोई समस्या नहीं है। कई बार जब समूह हिंसा करने लगता है तो कुछ निर्दोष, निरपराध की मानसिकता भी भीड़ जैसा करने की हो जाती है। हिंसा तो हिंसा है और वह अपराध की श्रेणी में आएगी। बावजूद ऐसे लोग जो वास्तविक छात्र हैं उनके बारे में उदारतापूर्वक विचार होना चाहिए। कॉकरोच जनता पार्टी के लोग या विरोधी भले कुछ कहें लेकिन न्यायालय ने स्पष्ट किया कि दंडात्मक कार्रवाई की यह सुरक्षा असामाजिक तत्वों या आपराधिक पृष्ठभूमि वाले लोगों पर लागू नहीं होगी। यह स्थिति केवल राजधानी दिल्ली तक सीमित नहीं रही। इसके प्रभाव या परोक्ष रूप से प्रयासों के कारण देश के अलग-अलग राज्यों में प्रदर्शन हुए और चिंता का विषय यह कि हर जगह उग्रता, हिंसा और उद्दंडता उनके भाग बने। ऐसा लगता है कि आने वाले समय में न्यायालय, केंद्र सरकार और राज्य सरकारों का पक्ष जानने के बाद एक उच्चस्तरीय विशेष जांच दल का गठन कर सकता है।
यह उचित भी होगा। अगर ऐसा नहीं हुआ और धरना प्रदर्शन के नाम पर हिंसा तथा अन्य अपराध करने वालों को सजा नहीं मिली तो इससे ऐसे तत्वों का हौसला बढ़ेगा जिन्हें भविष्य में संभलना कठिन होगा। इसीलिए हिंसा के हर संभव सबूत यानी जुड़े सभी सीसीटीवी फुटेज, ड्रोन कैमरे की रिकॉर्डिंग, वायरलैस संचार रिकॉर्ड, पी.सी.आर. कॉल और अन्य डिजिटल साक्ष्यों को सुरक्षित रखने को कहा गया है। सुनवाई के दौरान बैंच ने इस बात पर जोर दिया कि शांतिपूर्ण विरोध-प्रदर्शनों को संवैधानिक सुरक्षा प्राप्त है। साथ ही यह भी माना कि दोनों पक्षों की ओर से की गई हिंसा की समान रूप से जांच होनी चाहिए।
संविधान के अंतर्गत शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शन जायज है और इसे सुरक्षा भी प्राप्त है। किंतु अगर ऐसे विरोध प्रदर्शनों में खास झंडे वाले घुसकर सह मेजबान बन जाएं और अपराध करें तो इन सब की निष्पक्ष जांच क्यों नहीं होनी चाहिए? ध्यान रखिए, पुलिस कार्रवाई से लेकर केंद्र सरकार और राज्यों के विरुद्ध उच्चतम न्यायालय में अनेक नामी वकील खड़े थे। सरकार की ओर से सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता थे। न्यायालय ने सबकी सुनने के बाद कहा कि जो लोग कानून को अपने हाथ में लेते हैं, उनसे कानून के अनुसार निपटा जाना चाहिए।
तो न्यायालय का मत बिल्कुल स्पष्ट है कि कोई निर्दोष निरपराध फंसे नहीं लेकिन दोषी, अपराधी, षड्यंत्रकारी कानून के शिकंजे से बचें भी नहीं। नीट का प्रश्न पत्र लीक हो या किसी परीक्षा का यह सबके लिए राष्ट्रीय शर्म का विषय है। मनुष्य के विरुद्ध छात्रों और विभागों और आम लोगों के अंदर क्षोभ बिल्कुल स्वाभाविक है। इनके लिए जिम्मेदार और संलिप्त लोगों को ऐसी सजा मिलनी चाहिए जो उदाहरण बने। साथ ही लीक प्रूफ स्वतंत्र निष्पक्ष पारदर्शी परीक्षा प्रणाली कायम हो। इससे किसी का विरोध हो ही नहीं सकता। पर पिछले कुछ वर्षों के विरोध प्रदर्शनों, धरना या आंदोलन का जो स्वरूप उभरा है उससे भारत का हर विवेकशील व्यक्ति चिंतित है। 2020 में नागरिकता संशोधन विधेयक के विरुद्ध शाहीनबाग से आरंभ आंदोलन याद करिये।
लंबे समय तक सड़कों पर लोग जमे रहे और उस दौरान भी हिंसा हुई। अंतत: दिल्ली में दंगे हो गए जिनमें 50 से ज्यादा लोग मारे गए। हमने कृषि कानून के विरुद्ध धरना और आंदोलन को देखा। गणतंत्र दिवस पर ट्रैक्टर दिल्ली की सड़कों पर ऐसे दौड़ रहे थे मानो हथियारबंद गाडिय़ां हों। ट्रैक्टर पलटने से मृत्यु भी हुई। लाल किले पर चढ़कर जैसा हुड़दंग हुआ वैसा पहले कभी नहीं देखा गया। पुलिसकर्मी धक्के देकर गिराए गए और वे घायल होकर अस्पताल में पड़े रहे। इसी तरह अग्निवीर योजना के विरुद्ध प्रदर्शनों में हमने भयानक हिंसा देखी। इसमें नेताओं के घरों पर हमले हुए। ट्रेन, स्टेशन थाने तक जले। इन सब में दिए गए भाषण किसी भी देश प्रेमी को स्वीकार नहीं हो सकते।– अवधेश कुमार

