भारतीय समाज में आरक्षण का मुद्दा एक बार फिर देश की सबसे बड़ी अदालत के गलियारों में गूंज रहा है। अनुसूचित जाति (SC) और अनुसूचित जनजाति (ST) के आरक्षण में क्रीमी लेयर (समृद्ध वर्ग को बाहर करने का नियम) लागू करने को लेकर चल रही बहस पर केंद्र सरकार ने बेहद कड़ा और स्पष्ट रुख अपनाया है। सर्वोच्च न्यायालय में दाखिल एक हलफनामे में सरकार ने दो टूक शब्दों में कहा है कि जातिगत और सामाजिक भेदभाव को केवल आर्थिक स्थिति या अमीरी-गरीबी के चश्मे से नहीं देखा जा सकता। सरकार ने अदालत को याद दिलाया है कि आरक्षण का मुख्य उद्देश्य केवल नौकरी या शैक्षणिक संस्थानों में दाखिला देना नहीं, बल्कि ऐतिहासिक रूप से हाशिए पर धकेले गए समुदायों को शासन और प्रशासन की मुख्यधारा में सम्मानजनक प्रतिनिधित्व देना है।
सामाजिक न्याय बनाम आर्थिक स्थिति: केंद्र के मुख्य तर्क
केंद्र सरकार ने याचिका के जवाब में जो बिंदु रखे हैं, वे आरक्षण व्यवस्था की मूल भावना को रेखांकित करते हैं:
भेदभाव केवल आर्थिक नहीं: पिछड़ेपन और भेदभाव की जड़ें भारतीय समाज में इतनी गहरी हैं कि केवल आर्थिक रूप से मजबूत हो जाने भर से सामाजिक पूर्वाग्रह खत्म नहीं होते।
संसद का एकाधिकार: अनुच्छेदों 341(1) और 342 के तहत SC/ST सूची में किसी भी जाति को जोड़ने या घटाने का अधिकार सिर्फ और सिर्फ भारतीय संसद को है। न तो राज्य सरकारें, न ही अदालतें या ट्रिब्यूनल इस सूची में फेरबदल कर सकते हैं।
बिना आंकड़ों के फैसला संभव नहीं: सरकार का मानना है कि आरक्षण नीति में किसी भी तरह के बदलाव या आय-आधारित मापदंड लागू करने से पहले एक गहन सामाजिक-आर्थिक अध्ययन (Empirical Study) और व्यापक समीक्षा अनिवार्य है।
मामला क्या है?
दरअसल, यह पूरा मामला 1 अगस्त 2024 को सुप्रीम कोर्ट के सात जजों की संविधान पीठ द्वारा दिए गए एक ऐतिहासिक फैसले के बाद गरमाया। उस समय अदालत ने राज्यों को उप-वर्गीकरण (Sub-categorization) की अनुमति देते हुए सुझाव दिया था कि SC/ST वर्ग के भीतर भी जो लोग सामाजिक और आर्थिक रूप से संपन्न हो चुके हैं, उन्हें आरक्षण के लाभ से बाहर करने के लिए ‘क्रीमी लेयर’ के मापदंड तय किए जाने चाहिए।
इसके बाद दो जनहित याचिकाओं (PIL) पर कोर्ट ने सरकार से जवाब मांगा था। लंबे मंथन के बाद केंद्र सरकार ने स्पष्ट किया है कि अन्य पिछड़े वर्ग (OBC) की तर्ज पर SC/ST में क्रीमी लेयर लागू करना फिलहाल संवैधानिक और व्यावहारिक रूप से सही नहीं है।
अन्य पिछड़े वर्ग (OBC) से कितना अलग है SC/ST का मामला?
आमतौर पर तुलना की जाती है कि जब OBC आरक्षण में 8 लाख रुपये की वार्षिक आय सीमा के साथ क्रीमी लेयर का नियम लागू है, तो फिर SC/ST वर्ग में क्यों नहीं?
विशेषज्ञों का विश्लेषण: ओबीसी आरक्षण का आधार मुख्य रूप से ‘सामाजिक और शैक्षणिक पिछड़ापन’ (SEBC) रहा है, जबकि SC/ST आरक्षण की नींव ‘छुआछूत’ और ‘ऐतिहासिक उत्पीड़न’ पर टिकी है। यही कारण है कि सुप्रीम कोर्ट के पूर्व फैसलों में भी यह स्वीकार किया गया है कि SC और ST वर्ग के प्रति सदियों से चला आ रहा सामाजिक भेदभाव एक अलग श्रेणी का मुद्दा है।
आगे की राह: नीतिगत फैसलों का क्षेत्राधिकार
केंद्र सरकार के इस कड़े रुख से एक बात साफ हो गई है कि आरक्षण जैसी संवेदनशील व्यवस्था में किसी भी बदलाव की बागडोर विधायिका अपने पास ही रखना चाहती है। सुप्रीम कोर्ट में अब यह देखना दिलचस्प होगा कि सरकार के इस मजबूत हलफनामे के बाद अदालत याचिकाओं पर क्या रुख अपनाती है।
फिलहाल, इस हलफनामे ने देश के लाखों वंचित और शोषित तबकों को यह भरोसा दिया है कि उनके संवैधानिक अधिकारों के साथ बिना किसी व्यापक अध्ययन के छेड़छाड़ नहीं की जाएगी।

