भारत में नई कार खरीदना आज भी कई उपभोक्ताओं के लिए खुशी का पल होने की बजाय तनाव और दबाव का अनुभव बन जाता है। शोरूम में कदम रखते ही डीलर की तरफ से अनावश्यक एक्सैसरीज पैकेज, एक्सटैंडेड वारंटी और खासकर बीमा खरीदने का दबाव शुरू हो जाता है। कई बार तो यह दबाव इतना बढ़ जाता है कि ग्राहक या तो अनचाही चीजें खरीदने को मजबूर हो जाता है या फिर डीलर डिलीवरी में देरी या बुकिंग रद्द करने की धमकी देता है। यह प्रथा न केवल उपभोक्ता अधिकारों का उल्लंघन है, बल्कि बाजार की निष्पक्षता पर भी सवाल खड़ा करती है।
सवाल है कि कार डीलर अनावश्यक सामान क्यों थोपते हैं? मुख्य कारण लाभ का मार्जिन है। नई कार बेचने पर डीलर का मुनाफा आमतौर पर 4 से 7 प्रतिशत के आसपास रहता है, जबकि मोटर इंश्योरैंस बेचने पर कमीशन 19 से 22 प्रतिशत तक या उससे भी अधिक हो सकता है। एक्सैसरीज, जैसे सीट कवर, मैट, परफ्यूम, क्रोम गाॢनश या म्यूजिक सिस्टम पर भी अच्छा मार्जिन मिलता है। इसलिए डीलर कार की बिक्री को इन अतिरिक्त उत्पादों से जोड़ देते हैं। कई मामलों में वे बुकिंग या डिलीवरी को इन खरीदारी से सशर्त बना देते हैं। यह व्यवहार बाजार की प्रतिस्पर्धा को कम करता है और उपभोक्ता की पसंद की स्वतंत्रता छीन लेता है।
बीमा के मामले में स्थिति और गंभीर है। मोटर वाहन अधिनियम के तहत हर वाहन का थर्ड-पार्टी बीमा अनिवार्य है लेकिन यह बीमा किसी भी अधिकृत बीमा कंपनी से लिया जा सकता है। डीलर से लेना अनिवार्य नहीं है। फिर भी डीलर अक्सर यह कहते हैं कि उनके पास से बीमा नहीं लिया तो डिलीवरी नहीं होगी या कैशलैस क्लेम सुविधा नहीं मिलेगी। यह दावा सरासर गलत है। भारतीय बीमा विनियामक और विकास प्राधिकरण (इरडा) ने 2017 में मोटर इंश्योरैंस सॢवस प्रोवाइडर (एम.आई.एस.पी.) दिशा-निर्देश जारी किए थे, जिनके कोड ऑफ कंडक्ट में स्पष्ट रूप से कहा गया है कि एम.आई.एस.पी. ग्राहक को विभिन्न बीमा कंपनियों के विकल्प पेश करे। वह किसी विशेष बीमाकत्र्ता या मध्यस्थ से बीमा खरीदने के लिए मजबूर नहीं कर सकता, न ही ग्राहक के अधिकारों को सीमित कर सकता है। आई.आर.डी.ए.आई. ने कई मौकों पर इस तरह की प्रथाओं के खिलाफ कार्रवाई भी की है।
उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम, 2019 भी ग्राहकों को इस मामले में मजबूत ढाल प्रदान करता है। अधिनियम की धारा 2(47) में अनुचित व्यापार व्यवहार को परिभाषित किया गया है, जिसमें भ्रामक तरीके, जबरदस्ती बिक्री और विकल्पों को सीमित करना शामिल है। ऐसे में सेवा में कमी के तहत भी शिकायत दर्ज की जा सकती है। जिला, राज्य और राष्ट्रीय उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग ऐसे मामलों में राहत दे सकते हैं। कई उपभोक्ता मंचों ने डीलरों की मनमानी को अनुचित व्यापार व्यवहार मानते हुए मुआवजा और रिफंड के आदेश दिए हैं। उल्लेखनीय है कि उपभोक्ता आयोग नियमित रूप से ऐसे मामलों को सुनते हैं और राहत देते हैं। आर.टी.ओ. विभागों ने भी समय-समय पर डीलरों को चेतावनी जारी की है कि वे बीमा चुनने का अधिकार ग्राहक को ही दें।
लेकिन ऐसा क्या कारण है कि इन सभी कानूनों के बावजूद ग्राहक डीलर के दबाव में आ जाते हैं? देखा जाए तो इसके कई कारण हैं। पहला, जागरूकता की कमी। ज्यादातर खरीदार यह नहीं जानते कि बीमा और एक्सैसरीज उनकी स्वतंत्र पसंद है। दूसरा, समय का दबाव। नई कार का इंतजार करने वाले परिवार या व्यावसायिक जरूरत वाले व्यक्ति डिलीवरी में देरी नहीं चाहते। तीसरा, डीलर की रणनीति। वे कभी-कभी ‘स्पैशल ऑफर’ या ‘फ्री सॢवस पैकेज’ का लालच देते हैं, जो केवल उनके जरिए बीमा लेने पर ही उपलब्ध होता है। चौथा, शिकायत प्रक्रिया की जटिलता। उपभोक्ता आयोग में मामला दर्ज करने में समय और प्रयास लगता है, जबकि कार तुरंत चाहिए होती है। परिणामस्वरूप, कई ग्राहक चुपचाप ऐसे अनावश्यक और अतिरिक्त खर्च स्वीकार कर लेते हैं।
देखा जाए तो स्थिति दोनों तरफ की एक जैसी ही है। डीलर के पक्ष से देखा जाए तो वे व्यवसाय करते हैं और अतिरिक्त राजस्व के स्रोत तलाशते हैं। कार बिक्री का माॢजन कम होने और प्रतिस्पर्धा बढऩे से वे बीमा और एक्सैसरीज पर निर्भर हो गए हैं। एम.आई.एस.पी. व्यवस्था ने उन्हें वैध रूप से बीमा बेचने का अधिकार दिया लेकिन कइयों ने इसका दुरुपयोग किया। उपभोक्ता के पक्ष से यह स्पष्ट शोषण है। ग्राहक की पसंद की आजादी छीनना, गलत सूचना देना और दबाव बनाना न तो नैतिक है और न ही कानूनी।
ऐसे में समाधान के लिए कई कदम जरूरी हैं। आई.आर.डी.ए.आई. को एम.आई.एस.पी. को पूर्ण नियामक दायरे में लाना चाहिए और उल्लंघन पर सीधे जुर्माना लगाने का प्रावधान करना चाहिए। निर्माता कंपनियों को अपने डीलर नैटवर्क पर सख्त निगरानी रखनी चाहिए और शिकायतों पर त्वरित कार्रवाई करनी चाहिए। उपभोक्ताओं को जागरूक होना चाहिए, बीमा ऑनलाइन या स्वतंत्र एजैंट से तुलना करके ही खरीदें, जब एक्सैसरीज बाजार से सस्ते दामों पर उपलब्ध हैं तो डीलर के दबाव में क्यों आएं? ऐसे में ग्राहकों को चाहिए कि दबाव पडऩे पर कार निर्माता की कस्टमर केयर तथा उपभोक्ता हैल्पलाइन (1915) पर शिकायत दर्ज करें। केंद्रीय उपभोक्ता संरक्षण प्राधिकरण (सी.सी.पी.ए.) भी इस प्रथा को अनुचित व्यापार व्यवहार के रूप में जांच सकता है।
डीलर की मनमानी को रोकने के लिए कानून मौजूद हैं लेकिन उनका प्रभावी क्रियान्वयन और उपभोक्ता जागरूकता दोनों जरूरी हैं। जब तक खरीदार अपने अधिकारों के प्रति सचेत नहीं होंगे और नियामक सख्ती नहीं बरतेंगे, तब तक यह दबाव जारी रहेगा। निष्पक्ष बाजार तभी बनेगा, जब व्यापारिक हित और उपभोक्ता अधिकार संतुलित होंगे।-रजनीश कपूर

