प्रधानमंत्री मोदी ने खुद को ‘दयावान’ मानते हुए ‘जंतर मंतर’ पर आंदोलन कर रहे छात्रों को माफ कर दिया। इन बच्चों ने मेरी मां का अपमान किया, फिर भी मैं उन्हें माफ कर रहा हूं, जब मोदी ने ऐसा कहा तो उनका फिर मजाक उड़ा। ‘‘मोदीजी, मोदीजी, हमसे गलती हो गई। हमें माफ कर दीजिए,’’ ऐसा गिड़गिड़ाता हुआ एक भी छात्र मैंने नहीं देखा। फिर ये जबरदस्ती का माफीनाटक क्यों? श्री. उद्धव ठाकरे ने कहा, ‘‘छात्रों पर पैलेट गन चलाने और पेपर लीक से हजारों छात्रों का जीवन बर्बाद करने के लिए मोदी को ही छात्रों से माफी मांगनी चाहिए।’’ यही सभी राजनीतिक दलों की मांग है। माफी का मतलब प्रधानमंत्री मोदी को समझना चाहिए। राजीव गांधी के हत्यारों से मिलने के लिए प्रियंका गांधी जेल गई थीं। उन्होंने अपने पिता के हत्यारों को माफ कर दिया। सोनिया गांधी ने राष्ट्रपति के पास एक ‘दया याचिका’ भेजी और कहा (१९९९) कि मैंने अपने पति के हत्यारों को माफ कर दिया है। उन पर अब दया करें। उसके बाद उन हत्यारों को रिहा कर दिया गया। ऐसी माफी देने के लिए मन विशाल और साफ होना चाहिए। माफी देना और मांगना कोई औपचारिकता नहीं है। यह प्रेम, संवेदना और अहंकार से मुक्त होने का मार्ग है। कई बार मोदी जैसे लोग ‘मैंने माफ कर दिया’ कहकर अपने अहंकार को ही पोसते हैं। मोदी को लगता होगा कि हमने छात्रों को माफ करके उन पर उपकार किया है, लेकिन ऐसा नहीं है। यह भी मोदी का अहंकार ही है।
भटके हुए बच्चे
नरेंद्र मोदी ने आंदोलन कर रहे छात्रों को माफ कर दिया। इन बच्चों को उन्होंने ‘भटके हुए बच्चे’, ‘रास्ता भटके हुए बच्चे’ वगैरह कहा। माफी मांगने का यह तरीका नहीं है। नेल्सन मंडेला २७ साल जेल में रहे। दक्षिण अफ्रीका आजाद होने के बाद वो राष्ट्रपति बने। इसके बाद एक बार मंडेला अपने सुरक्षा कर्मियों के साथ एक साधारण से रेस्तरां में खाना खाने गए। वहां सामने वाली मेज पर एक व्यक्ति अपने ऑर्डर का इंतजार कर रहा था। मंडेला को आते देख उसने सिर झुका लिया और बाहर जाने लगा। तब मंडेला ने उसे अपनी मेज पर बुलाया। वो आदमी डरा हुआ था। उसके हाथ-पैर कांप रहे थे। मंडेला ने उसे अपनी ही मेज पर बैठाकर खाना खिलाया। खाना खत्म होने के बाद वो कांपते हुए चला गया। मंडेला ने बाद में बताया, ‘‘जिस जेल में मैंने यातनाएं झेलीं, उसी जेल का ये जेलर था। अब ये डरा हुआ है। इसे लगा कि मैं बदला लूंगा, लेकिन बदला लेना मेरा स्वभाव नहीं है। बदले की मानसिकता राज्य को नष्ट करती है, जबकि क्षमा की मानसिकता राज्य और समाज बनाती है।”
मंडेला ने आगे जो कहा वो महत्वपूर्ण है, ‘‘मैंने उस जेलर को कई बार समझाया था। अधिकार का गलत इस्तेमाल मत करो। आज बाहर जिनकी सत्ता है, उन्हें भी एक दिन जाना पड़ेगा। जेल का ताला खोलकर मुझे आजाद करने के लिए एक दिन उन्हें आना पड़ेगा। जब इस देश पर हमारा नियंत्रण होगा तब तुम क्या करोगे?’’ मंडेला ने रंगभेद व्यवस्था में अपने विरोधियों को भी माफ किया। वो कहते थे, क्षमा आत्मा को पवित्र और मुक्त करती है। इंसान को निर्भय बनाती है। लेकिन क्षमा मन से की जाए तभी यह संभव है। क्या प्रधानमंत्री मोदी द्वारा की गई क्षमा इस श्रेणी में आती है?
दुनिया की ‘क्षमा’
मानवाधिकारों के लिए लड़ने वाले जॉन लुईस को अमेरिका की जेल में कई बार पीटा गया। जेल में उन्हें यातनाएं दी गईं। जॉन लुईस आगे चलकर बड़े नेता बने तो उन्हें पीटने वाले एक पूर्व ‘क्लान’ सदस्य ने माफी मांगी। तब लुईस ने कहा, ‘‘हां, मैंने तुम्हें माफ कर दिया।’’ लुईस की माफी में जरा भी अहंकार नहीं था। जॉन लुईस ने क्षमा को ही अपनी जीवनशैली बना लिया था। २००९ में दक्षिण अप्रâीका की यूनिवर्सिटी ऑफ द प्रâी स्टेट के रेक्टर ने रंगभेद को लेकर आपत्तिजनक वीडियो बनाने वाले गोरे छात्रों को माफ करके उन्हें फिर से विश्वविद्यालय में लेने का फैसला किया। तब उन्होंने भी मोदी की तरह ही कहा था, ‘‘बच्चे भटक गए हैं। उन्हें संस्कार देने में संस्था और माता-पिता चूक गए।’’
यहां ‘संस्था’ का मतलब सरकार से लेना चाहिए।
मंडेला और अन्य
महात्मा गांधी अगर जिंदा होते तो उन्होंने उन पर गोलियां चलाने वालों को भी माफ कर दिया होता। आज उत्तर प्रदेश, दिल्ली में जो बुलडोजर और ‘एनकाउंटर’ राज चल रहा है, वो विचलित करने वाला है। धर्म देखकर कई लोगों के घर तोड़े जा रहे हैं। दिल्ली में दंगे भड़काने का आरोप लगाकर कई छात्र, नेता सालों से जेल में हैं, लेकिन गुजरात दंगों के सूत्रधार केंद्रीय सत्ता में बैठे हैं। मंडेला ने सत्ता में आते ही क्रांतिकारियों और स्वतंत्रता सैनिकों को प्रताड़ित करने वाले सभी जेल अधिकारियों को माफ कर दिया। रिवोनिया मुकदमे में मंडेला के लिए फांसी की सजा मांगने वाले सरकारी वकील पर्सी युटर थे। १९९५ में मंडेला ने उन्हें राष्ट्रपति भवन में डिनर पर बुलाया और कहा, ‘‘उसका क्या दोष? उसने तो सिर्फ अपना काम किया था।’’ क्रिस्टो ब्रैंड रॉबेन आइलैंड और पॉल्समूर जेल के जेलर थे। मंडेला ने अपनी आत्मकथा के प्रकाशन समारोह में क्रिस्टो ब्रैंड को बुलाया और मंच पर कुर्सी दी। दुनियाभर में ऐसे कई उदाहरण हैं। किम डे जंग दक्षिण कोरिया के मानवतावादी नेता थे। लोकतंत्र और नागरिक स्वतंत्रता के लिए लड़ते हुए वो कई बार जेल गए। उन्हें प्रताड़ित किया गया। उन्हें फांसी की सजा भी सुनाई गई। १९७३ में टोक्यो में एक भाषण के लिए गए थे तब उनका अपहरण भी किया गया। आगे १९९७ में राष्ट्रपति बनने के बाद उन्होंने चुन डू-ह्वान और रो ताए-वू इन दो पूर्व सैन्य तानाशाहों को माफ कर दिया। यही दोनों लोग लगातार किम डे जंग की हत्या की कोशिश कर रहे थे। उन्होंने कहा, ‘‘राजनीतिक बदला मेरे साथ ही खत्म होना चाहिए। भविष्य को उज्ज्वल बनाने के लिए हमें पिछली बातों को पीछे छोड़ना होगा।’’ झनाना गुस्माओ पूर्व तिमोर के क्रांतिकारी नेता थे। जब तिमोर इंडोनेशिया के कब्जे में था तब उन्होंने स्वतंत्रता आंदोलन खड़ा किया। उन्हें पकड़कर जेल में डाल दिया गया। देश आजाद होने के बाद वो राष्ट्रपति बने। भूमिगत रहते समय उनके एक करीबी ने ही उनकी जानकारी इंडोनेशियाई सेना को दी थी। यह विश्वासघात था, लेकिन झनाना गुस्माओ ने उस व्यक्ति को माफ कर दिया। उसे गले लगाकर माफ किया। तब लोगों को गुस्सा आया। झनाना शांति से लोगों के बीच गए और कहा, ‘‘अब अतीत को भूल जाओ। एक-दूसरे को माफ करो और राख से राष्ट्र को फिर से खड़ा करो।’’
नया नाटक
प्रधानमंत्री मोदी ने ‘जंतर मंतर’ पर आंदोलन कर रहे छात्रों को क्या दिल से माफ किया? संदेह है। मोदी संघर्ष से, स्वतंत्रता आंदोलन से पैदा हुआ नेतृत्व नहीं हैं। सत्ता पाकर उस पर अपनी पकड़ मजबूत करने के लिए उन्होंने लालकृष्ण आडवाणी से लेकर कई उपकार करने वालों का ही कांटा निकाला। इस काम में उन्हें अमित शाह जैसे लोगों का साथ मिला। कई कपट-साजिशें कीं। धमकी देकर विरोधियों को खत्म किया। लोकतंत्र और संविधान की हत्या की। इस प्रवृत्ति के खिलाफ जब देश के युवाओं ने बगावत की तो उन्हें झुकना पड़ा। हमेशा की तरह उन्होंने एक नाटक खड़ा किया, आंदोलनकारी छात्रों को माफ करने का। उसी समय उनकी पुलिस देशभर में आंदोलनकारियों पर मुकदमे दर्ज कर रही है। आंदोलनकारी लड़कियों के माता-पिता को धमकियां दी जा रही हैं। लड़कियों से जबरदस्ती मोदी से ‘माफी’ मांगने के वीडियो बनवाकर उन्हें सोशल मीडिया पर डाला जा रहा है। अमित शाह संसद में आने को तैयार नहीं हैं। यानी युवाओं को दबाने के लिए वो कोई बहुत बड़ा घिनौना षड्यंत्र रच रहे हैं। उसी में वो उलझे हैं। राजनीतिक क्षमा कई बार सत्ता बचाने का साधन होती है। क्षमा करते समय खुद के पास नैतिक आत्मबल होना चाहिए। मोदी जैसे ‘पावरबाज’ व्यक्ति की तरफ से ‘क्षमा’ अगर एकतरफा होगी तो वो ‘दया’ लगती है। उसमें प्रेम, आदर नहीं होता।
मोदी की ‘दया’ को देश के युवाओं ने ठुकरा दिया है।
जब तक वो सीबीआई, ईडी, पुलिस, सुप्रीम कोर्ट, चुनाव आयोग के बल पर राज कर रहे हैं, तब तक उनकी ‘क्षमा’ का मतलब ढोंग है। उस ‘क्षमा को स्वीकारना’ ही अपराध बन जाएगा!

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