लाल सागर के किनारे स्थित ऐतिहासिक अल-मखा बंदरगाह पर हूती विद्रोहियों के हालिया हमलों ने मध्य-पूर्व में जंग के एक नए दौर की शुरुआत कर दी है। हूती विद्रोहियों के हमले में सात लोगों की मौत और 30 लोगों के घायल होने की खबर है।रणनीतिक रूप से बेहद अहम इस बंदरगाह पर दोबारा कब्जा जमाना सिर्फ यमन के समुद्री जलमार्गों पर नियंत्रण हासिल करने की चाल नहीं है, बल्कि यह हाल ही में सऊदी अरब, पाकिस्तान और तुर्की के बीच हुए त्रिपक्षीय सैन्य गठबंधन के खिलाफ एक सीधी और आक्रामक खुली चुनौती भी मानी जा रही है।
ड्रोन और मिसाइलों की बौछार, सात लोगों की जान गई
यमनी सरकार के सुरक्षा बलों के प्रवक्ता कर्नल माजिद अल-नुजैली के मुताबिक, हूतियों ने अल-मोखा बंदरगाह क्षेत्र में कई ड्रोन और मिसाइलें दागीं। हमले में चार सैनिकों और तीन नागरिकों की मौत हुई है। करीब 30 लोग घायल बताए गए हैं। यमनी पक्ष का कहना है कि हमले में सैन्य ठिकानों के साथ-साथ नागरिक ढांचे को भी निशाना बनाया गया। इस हमले ने ऐसे समय में चिंता बढ़ाई है, जब यमन और आसपास का पूरा क्षेत्र पहले से ही अस्थिर सुरक्षा परिस्थितियों से गुजर रहा है।
अल-मखा पर नजर: समुद्री व्यापार की नब्ज थामने की साजिश
लाल सागर और बाब अल-मंदेब जलडमरूमध्य के मुहाने पर मौजूद अल-मखा (Mocha) बंदरगाह ऐतिहासिक और भौगोलिक दृष्टि से बेहद संवेदनशील है। वर्ष 2015 से 2017 के दौरान इस पर ‘अंसार अल्लाह’ (हूती आंदोलन) का कब्जा था, जिसे बाद में सऊदी नेतृत्व वाले गठबंधन और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मान्यता प्राप्त यमन सरकार ने सैन्य अभियान चलाकर अपने नियंत्रण में लिया था।
रक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि इस बंदरगाह पर फिर से नियंत्रण पाकर हूती विद्रोही अरब सागर और अदन की खाड़ी से होकर गुजरने वाले अंतरराष्ट्रीय जहाजों की आवाजाही पर पूरी तरह से निगरानी और दबाव बना सकेंगे। दो प्रमुख बंदरगाहों का हाथ में आना हूतियों को इस समुद्री क्षेत्र में अभूतपूर्व रणनीतिक बढ़त दिला देगा।
‘मक्का रक्षा समझौते’ पर सीधा पलटवार
यह हमला महज एक स्थानीय बंदरगाह की लड़ाई नहीं है, बल्कि इसके पीछे गहरा भू-राजनीतिक गणित है। हाल ही में सऊदी अरब, पाकिस्तान और तुर्की के बीच हुए ऐतिहासिक ‘मक्का रक्षा समझौते’ (Mecca Defence Pact) के तुरंत बाद यह आक्रामकता देखने को मिली है। इस समझौते के तहत किसी एक देश पर हमला सभी सदस्य देशों पर हमला माना जाएगा।
हूती प्रवक्ता मोहम्मद अल-बुखैती ने इस गठबंधन पर तल्ख तेवर अपनाते हुए खुली चेतावनी दी है कि यदि पाकिस्तान और तुर्की ने यमन के खिलाफ किसी भी सैन्य अभियान या शत्रुतापूर्ण कार्रवाई में सऊदी अरब का साथ दिया, तो उन्हें इसका गंभीर खामियाजा भुगतना पड़ेगा।
सऊदी ठिकानों और ऊर्जा केंद्रों पर मंडराता खतरा
हूती विद्रोही न केवल यमन की सरकारी सेना को निशाना बना रहे हैं, बल्कि सीमा पार सऊदी अरब के नज़रान और जाज़ान स्थित अरामको (Aramco) की तेल रिफाइनरियों और बुनियादी ढांचों पर भी लगातार मिसाइल व ड्रोन हमले कर रहे हैं। लाल सागर में वाणिज्यिक जहाजों पर बढ़ते हमलों के बीच अल-मखा पर यह नया दबाव वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति और व्यापारिक जलमार्गों के लिए भी बड़ा खतरा बनता जा रहा है।
विश्लेषकों के अनुसार, यदि इस क्षेत्र में तनाव और बढ़ा, तो क्षेत्रीय संघर्ष में पाकिस्तान और तुर्की के सीधे शामिल होने से पूरे मध्य-पूर्व में एक बड़े बहुराष्ट्रीय युद्ध का संकट गहरा सकता है।

