भारत जब स्वतंत्र हुआ था, तब देश की सामाजिक, आर्थिक और तकनीकी स्थिति इतनी कमजोर थी कि अंतरिक्ष अनुसंधान जैसी अवधारणा केवल एक स्वप्न लगती थी। उस समय बुनियादी ढांचे का अभाव, सीमित संसाधन और गरीबी जैसी परिस्थितियां थीं, जहां भोजन, स्वास्थ्य और शिक्षा जैसे मूलभूत सवाल ही सबसे बड़े थे लेकिन इतिहास गवाह है कि भारत ने विपरीत परिस्थितियों से जूझते हुए वैज्ञानिक क्षमता, दूरदर्शी नेतृत्व और अदम्य इच्छाशक्ति के बल पर अंतरिक्ष अनुसंधान के ऐसे झंडे गाड़े, जिन्होंने पूरी दुनिया को चकित कर दिया।
भारत की अंतरिक्ष यात्रा का सफर 1960 के दशक में बहुत ही साधारण प्रयोगों से शुरू हुआ था। एक समय ऐसा था, जब उपग्रहों और उपकरणों को बैलगाडिय़ों और साइकिलों पर ढोया जाता था लेकिन भारतीय वैज्ञानिकों ने कभी हार नहीं मानी। धीरे-धीरे उस छोटे से बीज ने वृक्ष का रूप लिया और भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन यानी ‘इसरो’ का नाम दुनिया के सबसे सशक्त अंतरिक्ष संगठनों में शुमार हो गया। 23 अगस्त, 2023 को भारत ने अपने चंद्रयान-3 मिशन की सफलता के साथ वह ऐतिहासिक कारनामा कर दिखाया, जिसने अंतरिक्ष की दुनिया में स्वर्णाक्षरों से भारत का नाम अंकित कर दिया।
उस दिन भारत चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुव पर सॉफ्ट लैंडिंग करने वाला पहला और चंद्रमा की सतह पर उतरने वाला चौथा देश बना। इसी ऐतिहासिक उपलब्धि को याद करते हुए भारत अब हर साल 23 अगस्त को ‘नैशनल स्पेस डे’ यानी ‘राष्ट्रीय अंतरिक्ष दिवस’ के रूप में मनाता है। इस बार इस दिवस की थीम है ‘विकसित भारत की ओर : नवाचार, सहयोग और वैश्विक अंतरिक्ष नेतृत्व की आकांक्षा’, जो भारत की अंतरिक्ष यात्रा को केवल उपलब्धियों के उत्सव के रूप में नहीं, बल्कि आत्मनिर्भरता, वैज्ञानिक नवाचार, अंतर्राष्ट्रीय सहयोग और वैश्विक नेतृत्व की व्यापक आकांक्षा के रूप में प्रस्तुत करती है। भारत का पहला कदम अंतरिक्ष में 1975 में उपग्रह आर्यभट्ट के प्रक्षेपण से हुआ था। यह भारत के लिए न केवल वैज्ञानिक महत्व का क्षण था बल्कि इसने एक नवयुग की नींव रखी। उसके बाद इसरो ने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा। भारत ने न केवल अपने उपग्रह अंतरिक्ष में स्थापित किए, बल्कि कई देशों के उपग्रहों को भी प्रक्षेपित करके ‘स्पेस डिप्लोमेसी’ का नया अध्याय रचा।
भारत का पहला चंद्र मिशन ‘चंद्रयान-1’ 2008 में लांच किया गया। उस मिशन ने साबित कर दिया कि भारतीय वैज्ञानिक किसी भी बड़ी चुनौती को स्वीकार कर सकते हैं। चंद्रयान-1 ने चंद्रमा की सतह पर पानी के अणुओं के अस्तित्व की पुष्टि की, जो अब तक की सबसे बड़ी वैज्ञानिक खोजों में से एक है। इसरो की यही वैज्ञानिक जिज्ञासा और दूरदॢशता भारत को मंगल तक भी ले गई। 2013 में जब इसरो ने अपने सीमित संसाधनों के बावजूद मात्र 450 करोड़ रुपए की लागत से मंगलयान मिशन को लांच किया और 2014 में मंगल की कक्षा में प्रवेश कराया तो पूरी दुनिया ने अवाक होकर भारत की क्षमता को स्वीकार किया। भारत पहला ऐसा देश बन गया, जिसने अपने पहले ही प्रयास में मंगल तक पहुंचने का कीर्तिमान स्थापित किया। मंगलयान दुनिया का सबसे किफायती मंगल मिशन साबित हुआ।
भारत ने उसके बाद चंद्रयान-2 मिशन से एक और ऐतिहासिक प्रयास किया। हालांकि लैंडर विक्रम चंद्रमा की सतह पर सफलतापूर्वक उतर नहीं पाया और अंतिम क्षणों में दुर्घटनाग्रस्त हो गया, फिर भी ऑबटर अब भी सक्रिय है और चंद्रमा के बारे में नई-नई जानकारियां भेज रहा है। चंद्रयान-3 ने वही अधूरा सपना पूरा किया। 14 जुलाई, 2023 को प्रक्षेपित चंद्रयान-3 मिशन 23 अगस्त को इतिहास रचते हुए दक्षिणी ध्रुव पर उतरा। यह वह क्षेत्र है, जिसे कोई देश छू नहीं पाया था। चंद्रयान-3 के रोवर ‘प्रज्ञान’ और लैंडर ‘विक्रम’ ने चंद्रमा की सतह से कई महत्वपूर्ण डाटा जुटाए, जिनसे भविष्य में चंद्रमा पर मानव बस्ती बसाने जैसी योजनाओं को बल मिलेगा। आज जब भारत गगनयान मिशन की तैयारी कर रहा है, जिसमें भारतीय अंतरिक्ष यात्री पहली बार स्वदेशी तकनीक से अंतरिक्ष की यात्रा करेंगे, तो यह यात्रा एक नई छलांग होगी।
भविष्य की ओर देखें तो इसरो अब चंद्रयान-4 और चंद्रयान-5 जैसे नए मिशनों पर भी कार्य कर रहा है, साथ ही सूर्य के अध्ययन के लिए आदित्य-एल1 के बाद शुक्र ग्रह पर संभावित अभियान और अंतरिक्ष स्टेशन की परिकल्पना जैसे प्रोजैक्ट भारत को अंतरिक्ष विज्ञान की अगली पंक्ति में ले जाएंगे। बहरहाल, राष्ट्रीय अंतरिक्ष दिवस हमें याद दिलाता है कि चुनौतियां चाहे कितनी भी कठिन क्यों न हों, यदि राष्ट्र के वैज्ञानिक, तकनीकी विशेषज्ञ और युवा मिलकर सपने देखें और उन्हें पूरा करने की ठान लें, तो असंभव को भी संभव बनाया जा सकता है। आने वाला कल निश्चित रूप से भारत के लिए और भी गौरवपूर्ण होगा और अंतरिक्ष विज्ञान की इस यात्रा में भारत नई ऊंचाइयां छूते हुए मानव सभ्यता के उज्ज्वल भविष्य का मार्ग प्रशस्त करेगा।-योगेश कुमार गोयल

