सरसंघचालक मोहन भागवत ने न्यूयॉर्क (अमरीका) में जो संबोधन दिया है, वह उनकी सोच की पुनरावृत्ति ही है, लेकिन संदेश अमरीकी जमीन से दिया गया है, लिहाजा उसकी गूंज ‘वैश्विक’ है। मुस्लिम धर्मगुरुओं, अमरीकी विचारकों और खुली सोच के समर्थकों ने संबोधन की सराहना की है। उसे स्वागतयोग्य भी माना है, लेकिन चुनौतीपूर्ण भी करार दिया है। आरएसएस अपनी स्थापना के 100 साल मना रहा है, लिहाजा सरसंघचालक अमरीका, कनाडा, ब्रिटेन के प्रवास पर हैं। बहरहाल भारत में जो जमात संघ-विरोध की राजनीति करती रही है, हर बुराई और विवाद के लिए संघ को ही आरोपित करती रही है, वह पुराने पन्ने खोल कर सरसंघचालक के विरोधाभासों, कथनी-करनी में अंतर, उनके विचारों के उनके अपने ही ‘घर’ में उल्लंघन सरीखी तोहमतें लगा रहे हैं। संबोधन को संघ-प्रमुख का ‘वैचारिक दोगलापन’ करार दे रहे हैं। यह सामान्य प्रवृत्ति है। उन्हें ऐसी अभिव्यक्ति की आजादी देश के संविधान ने दी है। दरअसल सरसंघचालक मोहन भागवत के अमरीकी संबोधन का सारांश यह है कि हिंदू-मुसलमान का ‘डीएनए’ एक ही है। एकता और विविधता ही हमारा ‘डीएनए’ है। यदि कोई हिंदू सोचता है कि देश में मुसलमान नहीं होने चाहिए, तो वह हिंदू नहीं रह जाएगा। हिंदुत्व का अर्थ मुसलमान को देश के बाहर करना नहीं है। यही भागवत के ‘हिंदू राष्ट्र’ की कल्पना है। विविधता में एकता ही हमारा राष्ट्रवाद है, सांस्कृतिक एकात्मवाद है। धर्म का लक्ष्य सत्य की ओर ले जाना है। सभी रास्ते एक ही ईश्वर की ओर ले जाते हैं। धर्म अनेक हैं, लेकिन सत्य एक ही है। इनसानियत सबसे मूल्यवान है। सरसंघचालक ने ऐसा संबोधन पहली बार नहीं दिया है। विदेशी जमीन पर यह ‘प्रथम संबोधन’ हो सकता है! अलबत्ता मोहन भागवत 2018 से यही संदेश लगातार देते रहे हैं। उन्होंने एक महत्वपूर्ण बयान भी दिया था कि हरेक मस्जिद के नीचे शिवालय ढूंढना बंद करें।
उसका जबरदस्त असर हुआ और ऐसी सांप्रदायिक कवायदें बहुत कम हो गईं। ‘काशी, मथुरा’ संघ परिवार और भाजपा के सनातन मुद्दे हैं और कहा जाता रहा है कि अदालत का जो फैसला होगा, वह मान्य होगा। दरअसल सरसंघचालक भागवत अपनी सोच और वैचारिकता में बिल्कुल स्पष्ट हैं, लिहाजा वह हिंदू-मुस्लिम के एकत्व वाले राष्ट्र की कल्पना करते रहे हैं, लेकिन अहम सवाल यह है कि संघ-प्रमुख किन्हें संबोधित करते रहे हैं? संघ के प्रचारक रहे और अब देश के प्रधानमंत्री मोदी खुद ‘कपड़ों से पहचानने’, ‘दाढ़ी-टोपी वाले’, ‘ज्यादा बच्चे पैदा करने वाले’ और ‘आपका मंगल-सूत्र छीनने वाले’ आदि सार्वजनिक टिप्पणियां कर मुसलमानों पर आघात करते रहे हैं। भाजपा में एक बड़ी जमात है, जो सार्वजनिक रूप से मुस्लिम-विरोधी है, कट्टर विरोधी है। कांवड़-यात्रा निकलती है, तो मुसलमानों को पहचान छिपानी पड़ती है। उनकी दुकानों, रेहडिय़ों और उनके ढाबों पर अनावश्यक, अनधिकृत जांच के छापे मारे जाते हैं। सर्वोच्च अदालत तक इनके खिलाफ फैसला सुना चुकी है। देश में ‘राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर’ (एनआरसी) का अभियान असम से चलाया गया, लेकिन प्राथमिक जांच में ही ‘हिंदू’ या ‘बंगाली हिंदू’ बहुसंख्यक पाए गए। अभियान पर ढक्कन लगा दिया गया। केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह अब भी एनआरसी के अभियान पर आमादा हैं। हालांकि संघ-प्रमुख के संबोधन के बाद खासकर भाजपा में ‘गहरी खामोशी’ है, अलबत्ता केंद्रीय मंत्री गिरिराज सिंह, सांसद निशिकांत दुबे जैसों की भरपूर जमात है, जो बात-बात पर, औसत मुद्दों और विवाद पर, मुसलमानों को पाकिस्तान चले जाने की धमकी देते रहे हैं। जिन्हें पाकिस्तान जाना था, वे चले गए, 80 लंबे साल भी बीत गए, पीढिय़ां बदल गईं, अब मुसलमान भी भारतीय हैं। हिंदू-मुसलमान की नारेबाजी, नफरत, जारी रहेगी, तो देश में एकता, एकत्व का डीएनए अथवा सांस्कृतिक एकात्मवाद की स्थितियां कैसे संभव होंगी? विरोधी भी अपनी पूर्वाग्रही मानसिकता बदलें। महात्मा गांधी के हत्यारे नाथूराम गोडसे का आरएसएस से कोई संबंध नहीं था। कांग्रेस, सपा के कथित प्रवक्ता टीवी बहसों में हररोज यह आरोप चिल्लाते रहते हैं। द्वितीय सरसंघचालक गुरु गोलवलकर की किताब ‘बंच ऑफ थॉट्स’ फरवरी, 1966 में छपी थी। वह किताब देश का संविधान या पवित्र धर्म-ग्रंथ नहीं है। गुरु जी के भाषणों, आलेखों, निबंधों, संवादों का संकलन है। हमारा दावा है कि विरोधियों ने यह किताब पूरी तरह पढ़ी भी नहीं होगी। यह आज प्रासंगिक भी नहीं है। उसका लगातार, हररोज जिक्र होता रहेगा, तो फासले और भी गहरे होंगे।

