डूंगरपुर. डूंगरपुर नगरपरिषद चुनाव में नामांकन वापसी के बाद अब यहां की चुनावी मुकाबले की तस्वीर लगभग साफ हो गई है. डूंगरपुर नगर परिषद में इस बार सभापति का पद सामान्य यानी सबके लिए ओपन होने के कारण प्रमुख राजनीतिक दलों ने अलग-अलग सामाजिक और जातीय वर्गों को प्रतिनिधित्व देकर समीकरण साधने की कोशिश की है. आदिवासी क्षेत्र में तेजी अपनी पकड़ मजबूत कर रही भारत आदिवासी पार्टी (BAP) ने भी डूंगरपुर जिले में होने वाले निकाय चुनावों में पहली बार एंट्री की है. बीएपी ने डूंगरपुर नगर परिषद क्षेत्र में अपने 12 और सागवाड़ा नगर पालिका क्षेत्र में 11 प्रत्याशी चुनाव मैदान में उतारे हैं. दोनों ही जगह बीएपी बीजेपी और कांग्रेस के लिए खतरे की घंटी बनी हुई है.

पूर्व में भारतीय ट्राइबल पार्टी (BTP) ने आदिवासी जिलों के ग्रामीण इलाकों में पैठ जमाने के बाद पहली बार डूंगरपुर नगर परिषद के वर्ष 2021 के चुनाव (शहरी क्षेत्र) में हाथ आजमाया था. पहली ही बार में ही उसने 40 में से 7 वार्डों में जीत दर्ज की थी. उसके बाद भारतीय ट्राइबल पार्टी की पूरी बॉडी ने पुरानी पार्टी छोड़कर नई पार्टी ‘भारत आदिवासी पार्टी (BAP)’ बनाई गई थी. अब भारत आदिवासी पार्टी पहली बार निकाय चुनाव के तहत शहरी क्षेत्र में अपना भाग्य आजमा रही है.

भारत आदिवासी पार्टी ने आधे से ज्यादा टिकट मुस्लिम समुदाय को दिए हैं
डूंगरपुर जिले की डूंगरपुर नगर परिषद के 40 वार्डों में से भारत आदिवासी पार्टी ने 12 और सागवाड़ा नगर पालिका के 35 वार्डों में से 11 में अपने प्रत्याशी उतारे हैं. इनमें से ज्यादातर वार्ड मुस्लिम या आदिवासी बाहुल्य है. ऐसे में भारत आदिवासी पार्टी तीसरी पार्टी बनकर दोनों प्रमुख दलों बीजेपी ओर कांग्रेस के समीकरण बिगाड़ सकती है. डूंगरपुर नगरपरिषद चुनाव 2026 में भाजपा और कांग्रेस ने जहां लगभग सभी प्रमुख सामाजिक वर्गों को टिकट देकर अपना संतुलन बनाने का प्रयास किया है. वहीं भारत आदिवासी पार्टी ने सीमित वार्डों में प्रत्याशी उतारते हुए मुस्लिम समुदाय को अपेक्षाकृत अधिक प्रतिनिधित्व दिया है. बीएपी ने नगर परिषद के 40 वार्डों में से जिन 12 वार्डों में अपने प्रत्याशी मैदान में उतारे हैं उनमें से 7 प्रत्याशी मुस्लिम समुदाय से हैं.

बीजेपी ने ओबीसी वर्ग पर सबसे ज्यादा भरोसा जताया है
भाजपा ने ओबीसी पर सबसे ज्यादा भरोसा जताया है. भाजपा ने सबसे ज्यादा 14 टिकट ओबीसी वर्ग को दिए हैं. भाजपा ने इनके अलावा 5 एसटी, 4 एससी, 5 मुस्लिम, 5 जैन और 3 ब्राह्मण प्रत्याशियों को टिकट देकर सामाजिक संतुलन साधने की कोशिश की है. भाजपा के मुस्लिम प्रत्याशियों में एक प्रत्याशी बोहरा समुदाय से भी है. पार्टी के टिकट वितरण में ओबीसी वर्ग को सबसे अधिक हिस्सेदारी मिलना इस बात का संकेत माना जा रहा है कि उसने इस वर्ग को चुनावी दृष्टि से महत्वपूर्ण माना है. कांग्रेस ने 13 ओबीसी, 10 जैन और 7 मुस्लिम प्रत्याशियों को उतारे हैं. कांग्रेस ने भी टिकट वितरण में सामाजिक समीकरणों का ध्यान रखा है.

कांग्रेस ने मुस्लिम वर्ग को अपेक्षाकृत अधिक प्रतिनिधित्व दिया है
एसटी वर्ग में भाजपा और कांग्रेस दोनों ने बराबर 5-5 प्रत्याशियों को टिकट दिए हैं. एससी वर्ग की बात करें तो कांग्रेस ने 3 प्रत्याशियों को मैदान में उतारा है. वहीं कांग्रेस की ओर से एक ब्राह्मण प्रत्याशी को भी टिकट दिया गया है. इस तरह कांग्रेस के टिकट वितरण में ओबीसी और मुस्लिम वर्ग को अपेक्षाकृत अधिक प्रतिनिधित्व मिला है. एसटी और एससी वर्ग को भी पार्टी ने अपनी सूची में जगह दी है. आदिवासी पार्टी ने सीमित वार्डों में दांव लगाया है.

बीएपी ने एससी वर्ग से एक भी प्रत्याशी मैदान में नहीं उतारा है
बीएपी ने डूंगरपुर नगर परिषद के 40 वार्डों में से केवल 12 वार्डों में प्रत्याशी उतारे हैं. खास बात यह है कि इन 12 प्रत्याशियों में 7 मुस्लिम समुदाय से हैं. बीएपी ने 4 एसटी और एक ओबीसी प्रत्याशी को भी टिकट दिया है. जबकि एससी वर्ग से पार्टी ने एक भी प्रत्याशी मैदान में नहीं उतारा है. इस बार डूंगरपुर नगर परिषद में सभापति का पद सामान्य (ओपन) होने के कारण किसी एक आरक्षित वर्ग तक चुनावी मुकाबला सीमित नहीं है. ऐसे में राजनीतिक दलों के लिए पार्षदों का चुनाव और विभिन्न सामाजिक वर्गों में अपनी पकड़ मजबूत करना अहम हो गया है. सभापति के चुनाव में निर्वाचित पार्षदों की भूमिका निर्णायक होगी.

सामाजिक और जातीय समीकरण अहम भूमिका निभाएंगे
यही वजह है कि भाजपा और कांग्रेस ने अलग-अलग सामाजिक समूहों को टिकट देकर परिषद में संभावित बहुमत का गणित अपने पक्ष में रखने की कोशिश की है. दूसरी ओर बीएपी ने कम वार्डों में चुनाव लड़ते हुए ऐसे क्षेत्रों पर ध्यान केंद्रित किया है. यहां उसके प्रत्याशी मजबूत चुनौती पेश कर सकते हैं. बहरहाल डूंगरपुर नगर परिषद चुनाव में टिकट वितरण ने साफ कर दिया है कि इस बार मुकाबला केवल पार्टी के नाम या उम्मीदवार की व्यक्तिगत लोकप्रियता तक सीमित नहीं रहने वाला है. बल्कि सामाजिक और जातीय समीकरण भी अहम भूमिका निभाएंगे.

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