कई लोग 7 से 8 घंटे सोने के बाद भी सुबह उठकर थका हुआ महसूस करते हैं. आमतौर पर इसे तनाव, ज्यादा काम या खराब लाइफस्टाइल से जोड़ा जाता है. लेकिन कुछ मामलों में जबड़े की बनावट भी नींद पर असर डालती है. जबड़ा छोटा या पीछे की ओर होने पर सोते समय जीभ और आसपास के टिश्यू सांस की नली को संकरा कर सकते हैं, जिससे स्लीप एपनिया की परेशानी बढ़ती है.
जबड़े की बनावट से कैसे जुड़ी है नींद की परेशानी?
सोते समय शरीर की मांसपेशियां रिलैक्स होती हैं. इस दौरान जीभ और मुंह के आसपास के नरम टिश्यू पीछे की तरफ जा सकते हैं. अगर किसी व्यक्ति का निचला जबड़ा छोटा या पीछे की ओर है, तो मुंह के अंदर जीभ के लिए जगह कम रहती है. ऐसे में सांस की नली पर दबाव पड़ सकता है और हवा का रास्ता संकरा हो जाता है. इसे ऑब्सट्रक्टिव स्लीप एपनिया से जोड़ा जाता है. इसमें नींद के दौरान बार-बार सांस रुकने या कम होने की स्थिति बनती है. ज्यादा वजन, उम्र और लाइफस्टाइल भी इसके जोखिम को बढ़ाने वाले कारणों में शामिल हैं.
पूरी नींद के बाद भी क्यों रहती है थकान?
स्लीप एपनिया में हर व्यक्ति को तेज खर्राटे या सांस रुकने जैसे साफ लक्षण महसूस नहीं होते. कई बार इसका संकेत दिनभर रहने वाली थकान से मिलता है. व्यक्ति 7 या 8 घंटे बिस्तर पर रहने के बाद भी सुबह फ्रेश महसूस नहीं करता. सुबह सिरदर्द, दिन में ज्यादा नींद आना, चिड़चिड़ापन और किसी काम पर ध्यान लगाने में परेशानी भी दिखाई दे सकती है. रात में बार-बार सांस लेने में रुकावट आने से नींद पूरी तरह आराम देने वाली नहीं रहती. इसी वजह से व्यक्ति दिनभर सुस्ती और थकान महसूस करता रहता है. अगर खर्राटों के साथ ऐसी परेशानी लगातार बनी रहती है, तो इसे नजरअंदाज नहीं करना चाहिए.
जांच के बाद ही तय होता है सही इलाज
अगर लगातार थकान, खर्राटे, सुबह सिरदर्द या सोते समय सांस लेने में परेशानी रहती है, तो डॉक्टर से सलाह लेना जरूरी है. जांच के दौरान जबड़े की बनावट, दांतों की स्थिति, जीभ की जगह और सांस की नली को देखा जाता है. जरूरत पड़ने पर स्लीप स्टडी भी की जाती है, जिससे स्लीप एपनिया की स्थिति और उसकी गंभीरता का पता चलता है. इसका इलाज हर व्यक्ति के लिए एक जैसा नहीं होता.
कुछ लोगों को लाइफस्टाइल में बदलाव, CPAP मशीन या खास तरह के ओरल उपकरण दिए जाते हैं. अगर जबड़े की बनावट सांस की रुकावट की बड़ी वजह है, तो कुछ मामलों में ऑर्थोडॉन्टिक इलाज या सर्जरी पर भी विचार किया जाता है. इलाज का मुख्य उद्देश्य सिर्फ खर्राटे कम करना नहीं, बल्कि नींद के दौरान सांस का रास्ता बेहतर रखना और अच्छी नींद दिलाना होता है.

