नई दिल्ली। राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद (एनसीईआरटी) ने कक्षा 9वीं के लिए सामाजिक विज्ञान की नई पाठ्यपुस्तक जारी की है। मंगलवार को जारी इस पुस्तक में 700 से 1700 ईस्वी तक के 700 वर्षों के मध्यकालीन भारतीय इतिहास को ‘प्रतिरोध और लचीलेपन’ (रेजिस्टेंस एंड रेजिलिएंस) के युग के रूप में दर्शाया गया है। पुस्तक के अनुसार, यह वह दौर था जब भारतीय समाज ने न केवल बाहरी खतरों से खुद का बचाव किया, बल्कि अपनी समृद्ध परंपराओं को भी अक्षुण्ण रखा।
इंडियन एक्सप्रेस के मुताबिक, सामाजिक विज्ञान की इस नई पाठ्यपुस्तक के दूसरे भाग ‘अंडरस्टैंडिंग सोसाइटी: इंडिया एंड बियॉन्ड’ में इतिहास का ध्यान संघर्ष और सहयोग के बजाय मुख्य रूप से विदेशी आक्रांताओं के खिलाफ भारतीय शासकों के सैन्य व सांस्कृतिक प्रतिरोध पर केंद्रित किया गया है। किताब में बताया गया है कि राजपूत, अहोम, विजयनगर साम्राज्य, मराठा, सिख और जाट शासकों ने अलग-अलग दौर में तुर्कों, मुगलों और यूरोपीय ताकतों के खिलाफ कड़ा मुकाबला किया।
युद्ध में शक्ति उपासना और देवी की तलवार का उल्लेख
‘प्रतिरोध और लचीलेपन’ अध्याय के एक उप-खंड में बताया गया है कि 7वीं शताब्दी से ही भारतीय राजा युद्ध के समय मां काली, दुर्गा, भवानी और शक्ति के अन्य रूपों का आह्वान करते थे। बस्तर के शासक अन्नमराज को मां मानिक्यदेवी (दंतेश्वरी) से तलवार मिली थी, जबकि विजयनगर के कुमार कंपन ने मदुरै में सल्तनत की सेना के खिलाफ देवी-प्रदत्त तलवार का इस्तेमाल किया था। इसी तरह छत्रपति शिवाजी महाराज को भी देवी तुलजा भवानी से तलवार प्राप्त होने की ऐतिहासिक परंपरा का उल्लेख किया गया है।
चार पुरानी पुस्तकों की जगह लेगा नया पाठ्यक्रम
एनसीईआरटी के निदेशक दिनेश सकलानी ने पुस्तक की प्रस्तावना में लिखा कि इस स्तर पर सामाजिक विज्ञान का उद्देश्य छात्रों में विश्लेषणात्मक क्षमता, महत्वपूर्ण जांच और नागरिक जीवन में जिम्मेदारी से भाग लेने की क्षमता विकसित करना है। यह नई पाठ्यपुस्तक पुरानी चार किताबों (फ्रांसीसी क्रांति, रूसी क्रांति, नाजीवाद, लोकतांत्रिक राजनीति, भूगोल और अर्थशास्त्र) का स्थान लेगी। नए अध्यायों में दिल्ली सल्तनत और मुगल काल के दौरान स्थानीय राजाओं द्वारा किए गए प्रतिरोध को रेखांकित किया गया है।
मुगलों से संघर्ष और क्षेत्रीय शक्तियों का पराक्रम
पुस्तक में आमेर के कछवाहा शासकों के मुगलों के साथ सहयोगात्मक संबंधों का संक्षिप्त जिक्र है, वहीं मेवाड़ में महाराणा प्रताप के अकबर के खिलाफ ऐतिहासिक प्रतिरोध पर विशेष खंड शामिल है। असम के अहोम साम्राज्य द्वारा मुगलों को हराने और सरायघाट के युद्ध में लाचित बोरफुकन की विजय का वर्णन है। विजयनगर साम्राज्य के माध्यम से यह दर्शाया गया है कि विदेशी आक्रमणों का विरोध केवल उत्तर भारत तक सीमित नहीं था। मराठों के ‘स्वराज्य’ के विचार को एक स्वतंत्र और बाहरी नियंत्रण से मुक्त स्वशासित क्षेत्र के रूप में समझाया गया है। सिखों के आध्यात्मिक व राजनीतिक प्रतिरोध, सिख गुरुओं के बलिदान और मुगलों की धार्मिक नीतियों का उल्लेख है। वहीं आर्थिक तंगहाली और औरंगजेब की नीतियों के खिलाफ जाटों के संघर्ष को भी शामिल किया गया है।
मंदिरों के विध्वंस और पुनर्निर्माण का उल्लेख
किताब में मंदिरों के विध्वंस और उनके स्थान पर मस्जिदों के निर्माण के कई उदाहरणों का उल्लेख किया गया है। इसमें काशी विश्वनाथ मंदिर के पुनर्निर्माण का भी जिक्र है। किताब के अनुसार टोडरमल और मान सिंह ने इसका पुनर्निर्माण कराया था, जिसे बाद में औरंगजेब ने नष्ट करा दिया। इसके बाद अहिल्याबाई होलकर ने मंदिर का पुनर्निर्माण कराया। किताब में कहा गया है कि जब मंदिरों का निर्माण सीमित हो गया या मंदिरों को नष्ट किया जा सकता था, तब भक्ति परंपरा ने श्रद्धालुओं को पूजा के गैर-भौतिक माध्यम उपलब्ध कराए।
चैतन्य महाप्रभु के बारे में भी उल्लेख है कि उन्होंने बंगाल में एक बार सार्वजनिक संकीर्तन का नेतृत्व किया था। किताब के अनुसार उस समय एक काजी ने भक्ति संबंधी गतिविधियों पर प्रतिबंध लगाए थे। सुफी परंपरा को इस्लाम के अपेक्षाकृत उदार पक्ष के रूप में प्रस्तुत करते हुए किताब में इसे इस्लाम के प्रसार में योगदान देने वाली परंपरा बताया गया है।

