लगभग 2 वर्ष पहले पीठ दर्द की शिकायत हुई, लापरवाही की और समझ में आया कि रीढ़ की देखभाल दर्द शुरू होने के बाद नहीं, बहुत पहले से की जानी चाहिए। स्वस्थ बने रहना है तो इसे गंभीरता से लेना हरेक के लिए आवश्यक है। शुरू में लगा कि दर्द 84 की उम्र का असर है और इलाज टालता रहा। डॉक्टर की सलाह पर एम.आर.आई. कराया तो एल2, एल3 में समस्या दिखाई दी। डॉक्टरों ने ऑपरेशन की सलाह तो दी लेकिन साथ में यह भी कहा कि खतरा बहुत है, इसलिए दूसरे विकल्प आजमा लें, सर्जरी तो अंतिम उपाय है। एंडोस्कोपी के लिए कहा, सोचकर कि सब ठीक होगा, अपने को तैयार कर लिया। 

समय तय हो गया, जाने पर दोबारा एम.आर.आई. कराया तो रिपोर्ट देखकर डॉक्टर ने कहा कि शरीर अपनी मरम्मत खुद कर रहा है, साधारण इपीड्यूरल इंजैक्शन लगवाने की सलाह दी लेकिन तकलीफ कम होने की बजाय बढऩे लगी। उठते-बैठते, चलते-फिरते हर समय दर्द और यहां तक कि सौ-पचास कदम चलना भी मुश्किल। मुंबई में एक प्रसिद्ध स्पाइन सर्जन को दिखाया, जिन्होंने स्थिति देखकर सर्जरी की सलाह दी और यही एक कारगर विकल्प बताया और भरोसा दिया कि डरने की जरूरत नहीं, इसी उम्र में यह होता है और 90 और अधिक आयु वालों की सर्जरी के उदाहरण दिए और कहा कि ये अपना सामान्य कामकाज स्वयं करने योग्य हो गए हैं। सर्जरी कराने का निर्णय लिया। काफी आराम है और लगभग 2 महीने बाद जीवनशैली सामान्य रहने की उम्मीद है। इस पूरे अनुभव ने कई सवाल पैदा किए, आखिर हमारी रीढ़ कमजोर होनी कब शुरू होती है और क्या हम उसे पहले से संभाल सकते हैं? यह जानना क्या केवल बुजुर्गों के लिए जरूरी है या 20-25 साल के नौजवान के लिए भी?

रीढ़ भी उम्र के साथ बदलती है : यह कहना कि उम्र बढऩे पर कमर दर्द होना स्वाभाविक है, पूरी तरह सही नहीं है। जैसे हमारे बाल सफेद होते हैं, त्वचा बदलती है, मांसपेशियों की ताकत धीरे-धीरे कम होती जाती है, वैसे ही रीढ़ में भी बदलाव आते हैं। रीढ़ की हड्डियों के बीच छोटी-छोटी डिस्क यानी शरीर के शॉक एब्जार्वर होते हैं। जब चलते हैं, दौड़ते हैं, झुकते हैं या वजन उठाते हैं, तो ये काफी काम करते हैं। उम्र के साथ इनमें लचीलापन कम हो सकता है और आसपास के जोड़ों में बदलाव आ सकते हैं। इसका मतलब यह नहीं कि 40 की उम्र में रीढ़ ‘खराब’ हो गई और 70 या इससे अधिक की उम्र में वह ‘खत्म’ हो गई।

असल बात यह है कि शरीर में बदलाव और बीमारी, दो अलग बातें हैं। एम.आर.आई. में उम्र से जुड़े बदलाव दिखाई देते हैं लेकिन कोई खास दर्द नहीं होता। दूसरी तरफ किसी व्यक्ति को काफी दर्द हो सकता है, इसलिए समस्या कुछ और है। जरूरी है कि शरीर के क्षरण यानी डिजैनरेशन पर ध्यान दिया जाए, जो हरेक व्यक्ति के जीवन में होना निश्चित है और उसे रोका नहीं जा सकता लेकिन सही व्यायाम और खानपान से उसकी गति को नियंत्रित किया जा सकता है तथा अधिक आयु तक स्वस्थ रहकर जिया जा सकता है। कुछ लोगों में 30-40 की उम्र में ही शुरुआती बदलाव दिखाई दे सकते हैं, किसी में 50 के बाद। किसी में उससे भी देर से। यह उम्र के साथ-साथ हमारी दिनचर्या, शरीर की बनावट, वजन, शारीरिक गतिविधि, पुरानी चोट और मांसपेशियों के गठन जैसी कई चीजों पर निर्भर करता है। लेकिन एक बात निश्चित है, जितनी उम्र बढ़ती है, उतनी ही समझदारी से स्पाइन की देखभाल करनी जरूरी है।

20-30 की उम्र में जब दर्द नहीं है, तब भी सावधान रहिए : आज का युवा 8-10 घंटे कम्प्यूटर पर काम करते हुए और मोबाइल पर झुककर कई घंटे निकाल देता है। जिम जाकर बहुत भारी वजन उठा सकता है। शरीर जवान है, इसलिए वह बहुत कुछ सह लेता है। लेकिन जवान शरीर का मतलब असीमित क्षमता नहीं है। छोटी चेतावनी को बड़ी समस्या मत बनने दीजिए। बार-बार हल्का दर्द हो तो पेनकिलर की बजाय डॉक्टर से सलाह लेने पर कारण पता चल जाएगा। अगर बीमारी की शुरुआत है, तो सही इलाज करना चाहिए क्योंकि बार-बार लौटने वाले दर्द का कारण समझना जरूरी है। दर्द शरीर की भाषा है। वह हमेशा खतरे की घंटी नहीं लेकिन उसे चुप करा देना समझदारी नहीं है।

शरीर का रखरखाव : शरीर के साथ यह सोच खतरनाक है कि ‘जब तक चल रहा है, चलने दो।’ वजन बहुत बढ़ रहा है तो उसे नियंत्रित करने की कोशिश करें। मांसपेशियां कमजोर हो रही हैं तो व्यायाम करें। दिन का अधिकांश समय कुर्सी पर बीत रहा है तो बीच-बीच में उठें और चलें। 60 के बाद-आराम से ज्यादा जरूरी है सही ढंग से रहना। उम्र बढऩे पर चलना बंद करना नहीं, सही तरीके से चलते रहना है। कसरत का मतलब यह नहीं कि 70 साल का व्यक्ति जिम में भारी वजन उठाए।

शरीर और विशेषकर कमर और रीढ़ की हड्डी से चेतावनियां शुरू हो जाती हैं। इसे हल्के में मत लीजिए। यह कुछ इस तरह की होती हैं। पहली, दर्द का बार-बार लौटना। दूसरी, पहले जितना चल नहीं पाना। तीसरी, दर्द पैर तक जाना और साथ में झनझनाहट, सुन्नपन या कमजोरी महसूस होना। चौथी, चलने का तरीका बदलना। झुककर चलने लगना, बार-बार बैलेंस बिगडऩा या पैर कमजोर लगना। यह सिर्फ ‘उम्र’ का तकाजा नहीं, बल्कि गंभीर बीमारी का संकेत है। इसके साथ ही अचानक मूत्र या शौच क्रिया में बदलाव या जांघों के बीच का हिस्सा सुन्न हो जाए या पैर की कमजोरी तेजी से बढ़े, तो तत्काल डॉक्टर की सलाह जरूरी है।

सबसे जरूरी है कि जिस रीढ़ के सहारे हम बचपन में दौड़ते हैं, जवानी में काम करते हैं और उम्र बढऩे पर अपने पैरों पर खड़े रहना चाहते हैं, उसकी देखभाल युवावस्था की शुरुआत से ही हमारी आदत का हिस्सा बन जानी चाहिए। अपनी स्पाइन का ख्याल उस दिन से रखिए, जिस दिन वह बिल्कुल ठीक है क्योंकि स्वस्थ जीवन उस पर ही निर्भर है।-पूरन चंद सरीन

Disclaimer : यहाँ दी गई जानकारी केवल सामान्य जागरूकता और शैक्षिक उद्देश्यों के लिए है। इसे किसी भी डॉक्टर या योग्य चिकित्सक की सलाह का विकल्प न समझें। स्वास्थ्य से जुड़ी किसी भी समस्या के लिए हमेशा अपने चिकित्सक या विशेषज्ञ से परामर्श करें।”

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