अमरीकी राष्ट्रपति टं्रप बीते कई दिनों से धमकी भरे बयान दे रहे हैं कि ईरान को उड़ा देंगे। ईरान का अस्तित्व खत्म कर देंगे। ईरान को नरक बना देंगे। ईरान को परमाणु बम नहीं बनाने देंगे, लिहाजा वह संवर्धित यूरेनियम अमरीका को सौंप दे। पेंटागन ने 27 अक्तूबर-3 नवंबर की तारीखें घोषित की हैं, जब अमरीकी सेना ईरान पर बड़ा, निर्णायक, विध्वंसक हमला कर सकती है। यह तीन दिन का युद्ध हो सकता है, जो ईरान के 80 किलोमीटर अंदर किया जा सकता है। ईरान के परमाणु केंद्र, ऊर्जा ठिकाने एवं प्लांट और हथियारों के भंडार निशाने पर होंगे। अमरीकी सेना इस बार ईरान के तटीय इलाकों पर ही हमले करना चाहती है, लिहाजा वहीं लड़ाकू विमान, बी-1 बॉम्बर्स समेत 104 विमानों की आसमान में हलचलें, तैनाती चौंकाती है। यह पेंटागन का प्रस्ताव बताया जाता है, जिसे राष्ट्रपति टं्रप ने अभी मंजूरी नहीं दी है। यह अमरीका में मध्यावधि चुनावों का निर्णायक दौर भी होगा, जब प्रस्तावित हमले किए जाएंगे। टं्रप अपनी ‘रिपब्लिकन पार्टी’ की संसदीय प्रतिष्ठा किसी भी तरह बचाने को आतुर हैं, लिहाजा अचानक रूस के साथ 30 लाख टन डीजल की आपूर्ति का समझौता, सौदा भी किया है, लेकिन ज्यादातर सर्वेक्षण चुनावों में राष्ट्रपति टं्रप की ‘राजनीतिक पराजय’ के निष्कर्ष दे रहे हैं। तीन दिन के युद्ध की योजना का बुनियादी मकसद है कि आनन-फानन में ईरान पर विध्वंसक हमले किए जाएं और अचानक अमरीका की जीत का ऐलान कर दिया जाए। यह इतना आसान, सरल, सहज, एकतरफा नहीं होगा, क्योंकि ईरान ने भी चेतावनियां जारी की हैं कि उसने अढाई गुना तेज हथियार बना लिए हैं, रक्षा उत्पादन को 250 फीसदी तक बढ़ा लिया है। अमरीका पर उन मिसाइलों, हथियारों से पलटवार हमले किए जाएंगे, जिनकी उसने कल्पना तक नहीं की होगी। बहरहाल अमरीकी कांग्रेसनल रिसर्च सर्विस की एक रपट सामने आई है, जिसके मुताबिक ईरान युद्ध में अमरीका के 12 एफ-15ई विमान नष्ट हुए हैं, 81 विमान, हेलीकॉप्टर भी तबाह या क्षतिग्रस्त हुए हैं, 45 एमक्यू-9 रीपर सर्वश्रेष्ठ ड्रोन भी नष्ट हो चुके हैं। इस सूची में अन्य कई विमानों के भी नाम हैं। कुल मिला कर इस नुकसान की लागत 1.9 अरब से 3.3 अरब डॉलर आंकी गई है। 20-23 सैनिक भी मारे जा चुके हैं और ईरान ने खाड़ी देशों में अधिकतर अमरीकी ठिकानों को मिट्टी-मलबा भी कर दिया है। अमरीका के लिए हथियारों की कमी का संकट अलग है, जिस पर टं्रप कुछ भी दावे करते रहें। क्या अमरीका युद्ध को जारी रखने की स्थिति में है?
यही कारण है कि बीते कई दिनों से अमरीका और इजरायल दोनों ही देशों ने ईरान पर एक बम तक नहीं फोड़ा है। बेशक राष्ट्रपति टं्रप धमकियां देते रहे हैं। युद्ध के इन 7 महीनों से अधिक के समय में अमरीकी फेडरल बजट घाटा उसकी जीडीपी के 6 फीसदी तक पहुंच चुका है। यह जी-7 देशों में सबसे खराब स्थिति मानी जा रही है। अमरीकी किसानों को करीब 31 अरब डॉलर का नुकसान झेलना पड़ रहा है, क्योंकि डीजल, उर्वरक की वैश्विक कीमतें आसमान छू रही हैं। अमरीका में डीजल की महंगाई अप्रत्याशित, अभूतपूर्व स्तर पर है, लिहाजा टं्रप को रूसी राष्ट्रपति पुतिन के साथ ‘डीजल डील’ करनी पड़ी है। अब अमरीका रूस से कच्चा तेल खरीदने वाले देशों-खासकर भारत और चीन-पर 100 फीसदी टैरिफ कैसे थोप सकेगा? यकीनन ऊर्जा संकट से पूरी दुनिया परेशान है, तो भारत भी चिंतित है। भारत तो करीब 88 फीसदी कच्चा तेल, गैस आदि आयात ही करता है। विशेषज्ञ मानते हैं कि यदि कच्चा तेल 10 डॉलर प्रति बैरल महंगा होता है, तो भारत के सालाना आयात बिल में 13-14 अरब डॉलर की बढ़ोतरी हो जाती है। युद्ध के बावजूद भारत की विकास दर 7 फीसदी से अधिक दिखाई जा रही है। असलियत क्या है, हम नहीं जानते। बहरहाल भारत में करीब 50 लाख बैरल तेल की रोजाना की खपत है। फिलहाल रणनीतिक और वाणिज्यिक रिजर्व 60-74 दिनों की मांग के बराबर बताया जा रहा है। फिर भी भारत के संदर्भ में ईरान युद्ध ‘घोर संकट’ पैदा कर सकता है।

