
भगवान बुद्ध का जन्म एक स्वप्र का जन्म था। शक्ति, पवित्रता और ज्ञान से परिपूर्ण एक पवित्र दैविक स्वप्र। उस स्वप्र को स्वप्रिल गाधा रहस्यमय बनने के बदले प्रकाश बिखेरती है। धम्मपद में इस स्वप्र के वर्णन के बहुत पहले, शिष्यों और अनुयायियों द्वारा इस स्वप्र में विश्वास जताने के बहुत पहले किपलवस्तु के लोगों ने, बुद्धिमानों ने और ज्योतिषियों ने इस स्वप्र की सत्यता फलीभूत होने में अपनी पूर्ण आस्था जता दी थी। यह मिथकीय स्वप्र कपिलवस्तु की महारानी और महाराजा शुद्धोधन की पत्नी महामाया ने देखा था। शुद्धोधन शाक्य वंश के प्रमुख थे और शाक्य वंश इक्ष्ववाकु वंश का एक महत्वपूर्ण विभाजन था जिसमें राम का अवतार हुआ था, जिसके कारण हिंदू बुद्ध को विष्णु के नीचे अवतार के रूप में पूजते है। यह मान्यता है कि सभी लोगों के ईश्वर एकत्रित हुए और एक ऐसे बालक के जन्म की घोषणा की जिसका कार्य जगत की रक्षा करना था। महामाया को उस विशिष्ट बालक की विशिष्ट माता होने का गौरव प्रदान किया गया। वह एक पारंपरिक पूर्व का सांतवा दिन था। महामाया ने भी पूर्ण मनोयोग से एक राजरानी के प्रतिष्ठा की अनुरूप उस पर्वू में भाग लिया। वे उपवास में थी और राजषी वस्त्र से सुशोभित थीं कि अचानक उन्हें उसी कशीदों भरे सिंहासन पर नींद आ गई और उन्होंने एक स्वप्र देखा। स्वप्र में वे हिमालय पर्वत पर पहुंची। एक स्वर्ण महल में उन्हे भविष्य के बुद्ध मिले। उस समय उनका स्वरूप एक विशालकाय और आकर्षक श्वेत हाथी का था। बाद में महर्षि असित और उन्होंने घोषणा की कि यह बालक सब कुछ त्याग देगा, जगत का परित्याग करेगा और सन्यासी हो जायेगा। ईसा पूर्व 567 इसवी में उस तेजस्वी बालक के जन्म के पश्चात उस राजकुल को सुख, शांति, सुकृद्धि चरम सीमा तक प्राप्त हो गई। धन संपत्ति और आनंद ने वहां स्थायी निवास बनाया। सभी इच्छाएं बहुलता से परिपूरित हुई। इसलिए राजा ने उस बालक को एक वंदनीय, पवित्र और अर्थपूर्ण नाम दिया-सिद्धार्थ- सिद्ध हो अर्थ जिसके या जिससे सिद्ध हो अर्थ जिससे या जिसने सारे अर्थ सिद्ध कर लिये हो और पूर्णता पा गया हो। कुछ समय पश्चात महारानी महामाया का निधन हो गया। पुत्र वत्सल द्वितीय रानी प्रजावती ने बालक सिद्धार्थ लालन-पालन का भार स्वयं ले लिया। सिद्धार्थ का समुचित और संतुलित और शीघ्र विकास हुआ। वे सुंदर स्वस्थ्य, चिंताकर्ष, निर्मल और गंभीर बालक के रूप में बढ़े। पिता शुद्धोधन चिंचित थे। वे उन सभी चीजों घटनाओं और क्रियाओं के प्रति सतर्क थे जो स्वयं सिद्धार्थ करते थे अथवा जो सिद्धार्थ की उपस्थिति में किये जाते थे। उन्होंने यह घोषणा कर रखी थी कि सिद्धार्थ के सम्मुख वह कुछ भी नहीं आवे जिससे त्याग की भावना उद्भुत होती हो। सभी आवश्यकताओं और स्थितियों पर विचार और मनन के पश्चात ऐसी राजषी और सुखद चीजें उपलब्ध कराई गई थी जिससे सभी आवश्यक और आकस्मिक आवश्यकताओं की पूर्ति हो सके राजमहल के अंदर ही एक-एक वस्तु उपलब्ध थी। सिद्धार्थ के बाहर निकलने पर पाबंदी थी। उनका जीवन एक अति सुरक्षित और सुषमायित जीवन था। उनकी सारी शिक्षा और सारा प्रशिक्षण इस बात को ध्यान में रखकर किया गया था कि उत्तर भारत के प्रबल बलशाली और प्रतापी प्रतापी राजा का राजकुमार युवा होने के पश्चात राजगद्दी संभालेगा। सिद्धार्थ घुड़सवारी तलवारबाजी, चित्रकला, सुखद रचना, सरस संगीत, और कलात्मक नृत्य में सिद्ध थे। सारी आवश्यक विद्याओं में उन्हे महारत हासिल थी। वे उन सभी चीजों को जानते और करते थे जो एक सक्षम राजकुमार के अनुकुल और योग्य था। राजमहल के अंदर एक सुखद, संपन्न और आकर्षक संसार बसाया गया था, जिसमें रंगीनी थी, विलासिता थी, सुविधायें थी, संतोष की मिठास थी, आनंद था, सभ्य था, संस्कारी था, सुरक्षित था, असीमित किन्तु सघन था। इससे स्पष्ट है कि उनका समय उत्साह और आन्नंद से आदेश देते और उन आदेशों की शीघ्र पूर्ति करते विश्वस्त और आज्ञाकारी अनुचरों के मध्य व्यतीत हुआ होगा। श्रेष्ठ गुरुओं से ज्ञान पाने समर्पित साथियों के बीच उल्लास और हास्यमय वातावरण खेलते हंसते बीता होगा। चुनी हुई शिष्ट विशिष्ट सुंदरियों के बीच चित्र बनाते, गीत गाते, संगीत सुनते और रस ग्रहण करते हुए गुजरा होगा। उनकी गति और प्रगति तालियां मिली होगी। उत्साह हुआ होगा। चहेते राजकुमार की मन:स्थिति, इच्छा, आवश्यकता तथा मौसम और जलवायु के अनुसार उन्हें सब कुछ आसानी से और प्रचुर मात्रा में मिला होगा। ऐसे सुखद और खुशनुमा वातावरण और परिस्थितियों में बालक सिद्धार्थ का विकास एक बलिष्ठ और सुंदर राजकुमार के रूप में हुआ जो रूप, गुण, कला और शक्ति सबमें श्रेष्ठ और समुन्नत हो। इसलिए बिना अनावश्यक विलंब किये उनका विवाह सभ्य, सुशील, शिष्ट, सुंदर और सर्वगुण संपन्न कन्या यशोधरा से हो गया और कुछ ही वर्षों में चंद्रमुख, अति कोमल और कांतिमान पुत्र राहुल के पिता भी बन गये। सिद्धार्थ सचमुच सिद्धार्थ थे, उन्हें बस सिद्ध था और सारे अर्थ उन्हें प्राप्त थे। इतने वर्षों में केवल उल्लेखनीय घटना घटी थी। सिद्धार्थ जलाशय के निकट बाग में पेड़ तके निश्चिंत बैठे थे कि राजहंस की चिल्लाहट सुनाई पड़ और तत्क्षण एक घायल हंस उनके पाव के पास आ गिरा। उन्होंने पक्षी को उठाया, उसके घाव को देखा, और उसकी पीड़ा खत्म करने का उपाय करने लगा। इतने में आखेटक आ गया, जो उन्ही का चचेरा भाई देवदत्त था। सिद्धार्थ ने घायल पक्षी को वापस करने से इंकार कर दिया। बात विवाद हो गई। नियम, कि शिकार शिकारी का होता है, देवदत्त के पक्ष में था। देवदत्त ने वाद दायर किया और सिद्धार्थ की पुकार हुई। सिद्धार्थ ने साफ बताया कि उन्होंने एक घायल पक्षी को उठाया है। उसकी सेवा की है। अब वह पक्षी स्वस्थ्य और प्रसन्न है। अब उसे देवदत्त को दिया जा सकता है। किंतु जज ने अपना फैसला कुछ इस प्रकार दिया कि शिकारी पर शिकारी का हक है, किंतु उससे ज्यादा हक उसे बचाने वाले का है। भक्षक से रक्षक सदा बड़ा होता है फलत: सिद्धार्थ उस पक्षी को रखने का पूर्ण अधिकारी है। इस सामान्य सी घटना का विभिन्न रूपों में विश£ेषण संभव है और अनेक निष्कर्ष निकाले जा सकते है। किंतु प्रत्येक निष्कर्ष किसी रुप में एक ही जगह ले जायेंगे जहां हिंसा और अहिंसा का टकराव होगा और स्पष्ट कर देंगे कि सिद्धार्थ अहिंसा के समर्थ समर्थक थे। उनमें पीडि़त और दुखी के प्रति दया, ममता और सहानुभूति थी। वे किसी की भी पीड़ा हरने के लिए तत्पर रहते थे। यह एक नन्ही सी घटना सिद्धार्थ के बुद्धत्व प्राप्ति के पश्चात के संपूर्ण चक्र, सारे दर्शन दृष्टिकोण और जीवन का पूर्वाभास देने में समर्थ है। यहीं तो है बुद्ध, इसी में तो बुद्ध का सारा जीवन दर्शन है। यहीं तो प्रमाणित करता है कि बुद्ध वे सभी तत्व को लेकर आये थे, जो इस लोक में प्राप्त करना और वितरित करना था। जगत और जीवन की रक्षा करने आये थे, जिसका आभास हंस की रक्षा में मिल जाता है। यही तो घटना एक सुखी, संपन्न और प्रसन्न राजकुमार मेें भावी बुद्ध की झलक दिखाती है। और दूसरी घटना ने मार्ग, कर्म, भाव, विचार सब परिवर्तित कर उनके जीवन का नया स्वरूप दिया। कहा यह भी जाता है कि वे लगातार तीन दिनों तक भ्रमण पर निकले और तीन दृश्य उनके समक्ष आये। किंतु राजकीय सतर्कता के कारण यही सही लगता है कि सिद्धार्थ भ्रमण पर एक ही दिन निकले और सचर दृश्यों का प्रभाव अस्तित्व पर पड़ा। तीनों दृश्य अलग-अलग मोड़ पर आंखों के सामने आये और मन मस्तिष्क पर छा गये। किंतु यह भ्रमण क्या आध्यात्मिक पुकार के कारण था या ब्रम्हाण्डीय निमंत्रण था, दैनिक घटना थी या ज्योतिषीय संयोग ? वह क्या था ? जिसने निकटस्थ और दूरस्थ सभी के भाग्य को परिवर्तित कर दिया। वह भी बस तीन यथार्थ किंतु बदरूप दृश्यों की नन्ही सी श्रंखला ने वह कर दिया जिसे बचाने के लिए शाक्य शासक शुद्धोधन ने अपनी सारी बुद्धि और शक्ति लगा दी थी। एक बार पुन: प्रमाणित हुआ कि भवितव्य घटकर ही रहता है, उससे बच कर निकलना संभव नहीं है। उक्त तीन घटनाओं ने विलासी राजकुमार, एक सौम्य पति, एक नेय पिता के जागृत मस्तिष्क और भावुक हृदय को परिवर्तित कर एक दूर से आती अस्पष्ट पुकार की ओर प्रवृत्त कर दिया। उसकी चेतना को जगा दिया, अंतर्दृष्टि को खोल दिया और वह अंतरपे्ररणा से वशीभूत सभी सुखो को त्याग कर, सारे बंधनों को काटकर जगत के दूखों को दूर करने के लिए निकल पड़ा। जैसे ही शुद्धोधन को जानकारी मिली कि सिद्धार्थ राजधानी भ्रमण पर निकलने वाले है, उन्होंने पूरी सतर्कता से समुचित तैयारियां की। तत्क्षण घोषणा हुई कि पूरे शहर को दुल्हन की तरह सजाया दिया जाये। शहर स्वर्गिक हो गया, सभी श्रेष्ठ वस्त्रों और प्रसन्न मुद्रा में राजकुमार का स्वागत करें। नर-नारी, स्त्री-पुरुष, बाल-वृद्ध, युवक-युवतियां, सभी मार्ग के दोनो ओर सज धजकर प्रिय राजकुमार की आगवानी में सावधान हो गये। राजकुमार को कभी किसी ने देखा नहीं था। कौतूहल तीव्र था और लालस तीव्रतम थी। जब जवाहरात युक्त रथ राजमार्ग से गुजरा, फूल बिखेरे गये, राजा और राजकुमार की जयध्वनि से गगन गंूज उठा। वे उत्तेजित होकर नाचते और गाते रहे। भरपूर आनंद हर ओर बिखरा हुआ था। सबों ने अपना कत्तर्वव्य भली भांति निभाया किंतु होनी को कोई टाल ना सका। पहली घटना जब रथ पीछे की ओर मुड़ रहा था, तब अचानक तब अचानक एक वृद्ध व्यक्ति सामने आ गया, जो अति कमजोर था और लाठी का सहारा लेने के बाद भी कांप रहा था। बाल सफेद हो चुके थे, झुर्रियां चेहरे और चमड़े पर स्पष्ट थी, राजकुमार ने प्रश्र किया यह क्या ? सारथी छंदक ने उत्तर दिया-राजकुमार यह बुढ़ापा है जो सभी उछलते-कूदते शिशु और सशक्त व क्रियाशील युवा के पास आ जाता है। तथा दूसरी घटना अगले मोड़ पर मरीज दिखा। राजकुमार के संवेदनशील कानों तक वेदनामय आह और कराहट पहुंची। वह पेट के दर्द से छटपटा रहा था। राजकुमार प्रश्र फिर वही था-यह क्यों ? सारथी छंदक का उत्तर भी संक्षिप्त था-यह रोग है जिसने आक्रमण किया है, यह सब पर आक्रमण करता है। इससे बचना संभव नहीं है। तीसरी घटना तीसरे मोड़ पर तीसरा दृश्य था। एक छोटी भीड़ अर्थी पर मृत शरीर लादे, श्मशान की यात्रा पर राम नाम सत्य है कहती हुई जा रही थी। राजकुमार का फिर वही संक्षिप्त प्रश्र घुमड़कर आया-यह क्या ? सारथी छंदक का जवाब फिर संक्षिप्त और स्पष्ट था। यह मृत्यु है, यही जीवन का अंतिम सत्य है। इस धरती पर जो जन्मा है उसकी मृत्यु धु्रव सत्य है। जातस्य: हि धु्रवो मृत्यु:जिसने भी जन्म लिया वह मरेगा। सब कुछ त्यागने का निर्णय ले लिया। सर्वविदित है कि एक अंधेरी रात सिद्धार्थ बिना किसी को बताये हुए राजमहल और राजषी सुख-सुविधाओं को त्यागकर चले गये। एकदंत कथा यह भी कहती है कि सारथी छंदक ने उन्हें राज्य की सीमा के बाहर छोड़ा जहां राजषी वस्त्र और आभूषण उतारकर उन्होंने सारथी को दे दिया, सिर मुड़वा लिया और भिक्षा पात्र लेकर अकेले सबके निर्वाण का मार्ग खोजने निकल पड़े। एक तीसरी कथा भी भिन्न वर्णन मिलता है। अपनी घटनापूर्ण यात्रा से वापस लौटने के पश्चात सिद्धार्थ ने स्वयं को अपने कमरे में बंद कर लिया। दरवाजा खोलने के किसी के भी निवेदन को भी नहीं स्वीकारा। पत्नी यशोधरा और पुत्र राहुल को भी अनसुना कर दिया। जब अंत में दरवाजा खुला जब उन्होंने सन्यास की घोषणा की। तात्कालिक कारण जो भी हो किंतु सिद्धार्थ ने मानसिक उद्वेलन की अवस्था में ही महल का त्याग किया है। राधाकृष्णन भी मानते है कि सभी चिंतक अपनी धार्मिक खोज में किसी वितृष्णा और असंतोष के कारण ही निकलते हैं। उस समय सिद्धार्थ असंतुष्ट थे,किंतु उस असंतोष को माया से मुक्ति के रूप में नहीं देखा जा सकता। सब त्याग देना आसान है किंतु कुछ भी ना रहने पर अस्तित्व की रक्षा अतिश्य कठिन है। एक तरफ तनाव इतना घना था और दूसरी ओर प्रेरणा इतनी तीव्र थी कि सिद्धार्थ ने अपनी इच्छा से आंतरिक शक्ति की प्राप्ति के लिए भौतिक ताकत को त्याग देने का सही निर्णय किया। और परीक्षा आरंभ हो गई। विलासिता के स्थान पर खुरदुरे, कड़े और चूभते यथार्थ ने ले लिया। नरम शैया घास की मैदान हो गई। नौकर के बदले सभी कार्य स्वयं करने थे। राजमार्ग पगडंडियों में बदल गये किंतु सिद्धार्थ को संतोष था, कैद स्वतंत्रता में, मुक्ति के रूप में परिवर्तित हो इस अनुपम त्याग का जो तात्कालिक परिणाम सामने आया उससे लगता है कि यह निर्मय सही नहीं था। राजमहल का आनंद छोड़कर अंधेरी पगडंडियों पर एक प्रकाशमान मार्ग की खोज मेें भटकना उचित नहीं था किंतु यह सर्वश्रेष्ठ निर्मय प्रमाणित हुआ। जब बुद्ध को बुद्धत्व की प्राप्ति हो गई। जब बुद्ध ने खोये हुए एक सामान्य राजमहल के स्थान पर संपूर्ण विश्व को पा लिया। जगत को बुद्ध मिले। बुद्ध जगत के हो गये। वे एक परिवार के नहीं सभी परिवार के हो गये। सब हो जाना, सब में जीना, सर्वात्म बोध बोद्धिसत्व आसान नहीं था।
0 रश्मि शर्मा