रायपुर। छत्तीसगढ़ को धान का कटोरा कहा जाता है. प्रदेश में धान की कई किस्में पाए जाती है. यहां की फसलों को देशभर में पहचान मिली हुई है. धान से चावल निकालने के बाद जो बचता है उसे छत्तीसगढ़ में पैरा या पराली कहा जाता है. इस पराली को अपनी कला के जरिए मंदिर हसौद की हर्षा वर्मा अलग पहचान देने का प्रयास कर रही है. हर्षा ने इस पैरा का उपयोग कर सुंदर-सुंदर कलाकृतियों का निर्माण किया है. अपनी पढ़ाई के साथ ही हर्षा अपनी पेटिंग को भी पूरा समय देती है. उन्होंने अब तक कई महापुरुषों और छत्तीसगढ़ महतारी की पेटिंग तैयार की है. हर्षा ने पिछले साल लॉकडाउन के दौरान अपने समय का सदुपयोग करते हुए अपनी इस कला से छत्तीसगढ़ महतारी की पेंटिंग बनाई थी. इस कला को वैश्विक स्तर पर सम्मान मिला. हर्षा ने बताया 10 अप्रैल 2020 को उन्होंने छत्तीसगढ़ महतारी की तस्वीर बनाई थी. यह चित्रकारी गोल्डन बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड में दर्ज की गई है. हर्षा बताती है कि पेंटिंग तैयार करने में धैर्य और एकाग्रता की जरूरत होती है. घंटों बैठने के बाद एक पेंटिंग तैयार होती है. कई पेंटिंग ऐसी भी है जिसे बनाने में कई दिन लग गए.


ऐसे तैयार होती है पैरा आर्ट
धान से चावल निकालने के बाद जो पैरा (पराली) बचता है उसे पेंटिंग की तरह पेपर में उकेरा जाता है. इसे ही पैरा आर्ट कहते हैं. सबसे पहले पैरे की कटिंग की जाती है.उसे बेल्ड की सहायता से सपाट किया जाता है.बटर पेपर पर स्केच तैयार किया जाता है. तैयार स्केच पर पैरे को चिपकाया जाता है. बटर पेपर को उस शेप में काटा जाता है. कार्ड बोर्ड में काले रंग के कपड़े का बैकग्राउंड तैयार किया जाता है.काले कपड़े पर तैयार पैरा के शेप को चिपकाया जाता है. कैंप में सीखी थी ये कला 2013 में हर्षा के गांव में एक कैंप लगाया गया. हर्षा ने कैंप में जाकर इस कला को सीखा और उसकी बारीकियों को समझा. तब से लगातार हर्षा कलाकृतियां तैयार कर रही हैं. इस साल मई में उन्होंने 8 फीट लंबी और 4 फीट चौड़ी भारत माता की पेंटिंग बनाई है. इस पेंटिंग की राज्यपाल अनुसुइया उइके ने सराहना भी की है. पिछले 8 साल से हर्षा इस कला को आगे बढ़ा रही है. अब तक उसे न तो कोई सहायता मिली है और न सरकार से कोई प्रोत्साहन मिला है. हर्षा ने अपनी पेंटिंग राज्यपाल और अन्य मंत्रियों के सामने पेश की है. राज्यपाल ने कला की तारीफ करते हुए उसे केंद्र सरकार के सामने प्रस्तुत करने की बात कही थी.
पैरा कला को स्थान दिए जाने की मांग
हर्षा कहती है कि छत्तीसगढ़ की पहचान धान के कटोरे से होती है. धान से पैरा बनता है. पैरे से कोई पेंटिंग बनाई जाती है तो यह छत्तीसगढ़ के लिए पहचान की बात है. हर्षा ने सरकार से अपील की है कि जैसे ढोकरा आर्ट और माटी कला को सरकार ने पहचान दिलाई है, वैसे ही पैरा आर्ट को भी स्थान दिया जाना चाहिए. हर्षा ने कहा कि मुझे राष्ट्रीय स्तर पर कुछ बड़ा सा पैरा कला से बनाना था। इसी विचार से मैंने भारत माता की तस्वीर बनाने की सोची, इससे पूरे भारत में पैरा कला से बनी पेंटिंग की जानकारी हो सके क्योंकि यह कला अद्वितीय (यूनिक) हैं। जब मुझे 2020 में राजभवन रायपुर छत्तीसगढ़ गवर्नर मैडम से अपनी पेंटिंग दिखाने का मौका मिला था, तो मैंने इस बात को जिक्र भी किया और मैडम ने कहा यह पेंटिंग नेशनल, इंटरनेशनल एग्जिबिशन में शामिल कराएंगे और उनके मार्गदर्शन में भारत माता की पेंटिंग पूरा करने को कहा और केंद्र सरकार भारत के प्रधानमंत्री मोदी जी तक पहुंचाने की बात कही।

उन्होंने बताया कि मैंने 2013 से इस आर्ट पर काम करना शुरू किया है और हर गर्मी छुट्टी में मैंने पैरा कला से विभिन्न कलाकृति उकेरी है जैसे स्वामी विवेकानंद, भगत सिंह, सुभाष चन्द्र बोस, छत्तीसगढ़ महतारी, बैलगाड़ी, आदिवासी, घोड़ा, इत्यादि संस्कृति पर उकेरा है तथा इस साल 2021 में मैंने भारत माता की पेंटिंग 8’4 फीट मैं उकेरा है। हर्षा ने बताया कि मैं संयुक्त परिवार से हूं, हम 6 लोग है जिसमे मां, पापा 3 बहन, 1 भाई जिसमे मंै तीसरे नंबर की हूं। दादा, दादी भी साथ में रहते है। मेरे परिवार से मुझे पूरा सपोर्ट मिलता है अपने कार्यों को लेकर। मंै आज यहां तक पहुंची हूं तो सिर्फ मेरे परिवार वालों की सहायता, प्यार और सपोर्ट की वजह से। जो भी मेरी पेंटिंग देख रहे है उनका प्रतिक्रियाओं से बहुत ज्यादा प्रोत्साहन मिल रहा है और अनलोगो का कहना है कि यह कला अद्भुत , अद्वितीय है तथा छत्तीसगढ़ की पहचान बनी हर्षा , छत्तीसगढ़ की गौरव जैसे प्रतिक्रियाएं मिल रही है । आगे मैं इस पेंटिंग को छत्तीसगढ़ राज्य की विभिन्न कलाओ जैसे ढोकरा कला, मिट्टी कला इत्यादि कालाओ में पैरा कला को भी शामिल करने की विनम्र अपील करूंगी और इसी उद्देश्य पर आगे काम करते रहुंगी ।इसके अलावा पैरा कला को अन्य लोगो तक सिखाने और उन तक पहुंचाने का कार्य भी करूंगी । मेरा सपना सीजी पीएससी क्रैक करने का है ,जिसमे मेरे परिवार वालो , शिक्षकों का भी सपना है कि पढ़ाई में भी आगे सफल होने का आशा करते है ।

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