छत्तीसगढ़ की राज्यपाल सुश्री अनुसुईया उइके 29 जुलाई 2020 को अपने कार्यकाल का एक वर्ष पूरा कर रही हैं। एक साल पहले यह पद भले ही उनके लिए नया रहा हो, मगर छत्तीसगढ़ और यहां के निवासियों से उनका नाता वर्षों पुराना है। छत्तीसगढ़ की राज्यपाल बनने से पहले न तो वे इस राज्य से अनजान थीं और न ही यहां के लोग उनसे नावाकिफ थे। अब तो वे छत्तीसगढ़ की माटी में रच-बस गई हैं। यहां की संस्कृति को उन्होंने आत्मसात कर लिया है। ऐसा लगता है कि वे यहीं की हैं, यहीं के लिए हैं और राज्यपाल के रूप में यहां के लोगों की भलाई के लिए ही भेजी गई हैं। अपने सिर से महामहिम का प्रभामण्डल उतारकर उन्होंने अपनी सौम्य छवि से जनमानस में जो स्थान बनाया, उससे एक वर्ष की अल्प अवधि में ही वे अत्यधिक लोकप्रिय हो गई हैं।
हम वर्षों से देख रहे हैं कि राज्यपाल का निवास याने राजभवन, चाहे वह किसी भी राज्य का हो, आमतौर पर आम आदमी के लिए कभी-कभार ही खुलता है। राज्यपाल से मिलना तो दूर, सामान्य व्यक्ति राजभवन में पैर रखने की भी हिम्मत नहीं जुटा पाता। कड़ी सुरक्षा और प्रोटोकॉल के तामझाम की वजह से राज्यपाल और सामान्य व्यक्ति के बीच दूरी इतनी ज्यादा होती है कि राज्यपाल के दर्शन दूर से हो जाएं, यही बड़ी बात है, मगर सुश्री अनुसुईया उइके ने इस दूरी को नजदीकी में तब्दील कर दिया। अंग्रेजों के जमाने से चली आ रही परंपरागत व्यवस्था को तोड़कर एक सामान्य व्यक्ति को भी राजभवन से जोड़ दिया। लाट साहब के रुतबे को बला-ए-ताक रखकर उन्होंने सहृदयता का बाना धारण किया। अब राजधानी रायपुर स्थित राजभवन में सूट-बूट, टाई वाले अफसरों तथा लक-झक वस्त्रधारी अभिजात्य वर्ग के साथ ही मटमैले कपड़े पहने हुए ग्रामीण भी दिखाई देने लगे हैं। छत्तीसगढ़ के सुदूर अंचल के वनवासी भी राजभवन में ससम्मान प्रवेश पाने लगे हैं। सामान्य जन अपनी परेशानी, पीड़ा को बेझिझक राज्यपाल के सामने रखने लगे हैं। गरीब-गुरुबा को भी यह एहसास होने लगा है कि इस भव्य राजभवन में कभी भी जाकर वह अपनी संरक्षक राज्यपाल महोदया से अपनी तकलीफ बता सकता है। सुश्री उइके की हमदर्दी से लोगों के दिलों में आशा व विश्वास का ऐसा जागरण हुआ है कि अब शासन-प्रशासन से निराश व्यक्ति को राजभवन आशा के एक केन्द्र के रूप में नजर आने लगा है।
दरअसल, सुश्री अनुसुईया उइके ने आम आदमी की जिन्दगी की तकलीफों और व्यथा को बहुत नजदीक से देखा है। वे अपने परिश्रम, लगन, निष्ठा व मेधा के सहारे कंटकाकीर्ण जन पथ से चलकर राज पथ तक पहुंची हैं। एक प्राध्यापक से शुरू हुई उनकी जीवन यात्रा में उपलब्धियों की खासी लम्बी फेहरिस्त है। अविभाजित मध्यप्रदेश में विधायक, मंत्री, सांसद, राष्ट्रीय महिला आयोग की सदस्य, अनुसूचित जनजाति आयोग की उपाध्यक्ष जैसे गरिमापूर्ण पदों को उन्होंने सुशोभित किया लेकिन पद का मद उनके मन-मस्तिष्क में लेशमात्र भी प्रवेश नहीं कर पाया। उन्होंने हर भूमिका में नर को नारायण माना और तद्नुरूप जी-जान से सेवा की। उन्हें समाज के अंतिम छोर में टकटकी लगाये बैठे व्यक्ति की पीड़ा का आभास है। भौतिकवादी युग में अमीर-गरीब के बीच बड़ी खाईं से वे चिंतातुर हैं। सामाजिक व आर्थिक विवर्जनाओं ने समाज में समरसता को कैसे कम किया है, वे इस तथ्य को भलीभांति जानती हैं। वे अक्सर सामाजिक समरसता तथा पारस्परिक सौहार्द पर जोर देते हुए हमारे महापुरुषों के जीवन से सीख व प्रेरणा लेने का आग्रह करती हैं।
आम अवधारणा है कि प्रभुता पाने के बाद मनुष्य में स्वाभाविक रूप से अहंकार आ जाता है परंतु सुश्री अनुसुईया उइके के व्यक्तित्व में अहं कहीं दिखाई ही नहीं देता। मानवीय संवेदना से ओतप्रोत सुश्री उइके वाकई परहितकारक हैं। वे किसी की भी पीड़ा, दु:ख, परेशानी सुन-जानकर द्रवित हो जाती हैं और उसके हल के लिए तुरंत कदम उठाती हैं। अब तो राजभवन में समस्याग्रस्त लोगों की व्यथा-कथा और उनके निदान का क्रम लगातार चलता रहता है। राज्यपाल ने राजभवन के अधिकारियों को निर्देश दे रखा है कि अपनी फरियाद लेकर यहां आने वाले व्यक्ति की परेशानी दूर करने में कोई कोताही नहीं बरती जाए, उसे हर हाल में न्याय मिलना चाहिए। यदि किसी मंत्री या वरिष्ठ प्रशासनिक अधिकारी से बात करने की जरूरत हो तो मैं स्वयं बात करूंगी। वे ऐसा करने में संकोच भी नहीं करतीं। उन्हें पद का गुमान तो है ही नहीं। उनकी एक ही धुन रहती है कि उनके पास समस्या लेकर आने वाले व्यक्ति को न्याय मिले, उसकी समस्या का निदान हो। उनसे मिलने वाले हर व्यक्ति को, चाहे वह किसी भी स्तर का हो, यही अनुभूति होती है कि राज्यपाल उसकी शुभचिंतक हैं, उसकी अभिभावक है।
संवैधानिक प्रमुख होने के नाते राज्यपाल की अपनी विशिष्ट भूमिका होती है, शीर्ष पद की गरिमा होती है, जिसे सुश्री अनुसुईया उइके बड़ी संजीदगी और मर्यादा के साथ निभाती हैं। छत्तीसगढ़ में कांग्रेस पार्टी की सरकार है और सुश्री उइके का वास्ता भारतीय जनता पार्टी से रहा है लेकिन वे अपनी कार्यशैली एवं व्यवहार में हमेशा तटस्थता व निष्पक्षता का भाव रखकर ही भूमिका निभाती हैं। वे अपने चिंतन के केन्द्र में ‘ना काहू से दोस्ती, ना काहू से बैर’ की भावना से भी आगे बढ़कर ‘सब काहू से दोस्ती, ना काहू से बैर’ के उदात्त दृष्टिकोण से संविधान द्वारा प्रदत्त कर्त्तव्यों का निर्वाह और अधिकारों का प्रयोग करती हैं। लोकहित से जुड़े मुद्दों के बावत वे शासन को सचेत करती रहती हैं। खासकर वनवासियों के हितों से संबंधित मुद्दों के मुताल्लिक वे राज्य सरकार के साथ ही केन्द्र सरकार से भी न सिर्फ खत-ओ-किताबत करती हैं बल्कि उन्हें अमलीजामा पहनाने के लिए भी प्रतिबद्ध रहती हैं। वे चाहतीं तो खुद को राजभवन में सीमित कर अपने दायित्वों को निभातीं लेकिन शायद उनका जन्म ही हुआ है जनकल्याण के लिए। ‘परोपकाराय सतां विभूतय:’ की अवधारणा ऐसी विभूति के लिए सर्वथा समीचीन है।
छत्तीसगढ़ का सर्वांगीण विकास राज्यपाल सुश्री अनुसुईया उइके के सपनों में समाहित है। वे चाहती हैं कि समाज के आखिरी छोर में बैठा व्यक्ति भी तरक्की की रोशनी से लाभान्वित हो, सर्वहारा वर्ग को समाज की मुख्यधारा से जोड़ा जाए और सरकार की तमाम लोकहितैषी योजनाओं से समग्र छत्तीसगढ़ को फायदा मिले। इस संदर्भ में वे मुख्यमंत्री सहित मंत्रियों एवं राज्य शासन के वरिष्ठ अधिकारियों से चर्चा करती हैं और अपने सुझाव भी देती हैं। यह देखा गया है कि उनके निर्देशों का असर पड़ता है और प्रदेश के विकास में किए जा रहे समन्वित प्रयास का सुफल प्रत्यक्षत: दिखाई भी देता है। वे छत्तीसगढ़ को विपन्नता, भेदभाव, अशिक्षा, कुपोषण, बीमारी से मुक्त देखना चाहती हैं और बतौर राज्यपाल केन्द्र सरकार से तादात्म्य स्थापित कर छत्तीसगढ़ के योग-क्षेम के लिए हर संभव सहयोग दिलाती हैं। प्रदेश के विश्वविद्यालयों की कुलाधिपति होने के नाते उन्होंने उच्च शिक्षा के क्षेत्र में गुणवत्ता, समयबद्धता व श्रेष्ठता लाने के लिए कई नवाचारों की शुरुआत की, जिसके परिणाम भी दिखाई देने लगे हैं।
हालांकि, राज्यपाल की इस सक्रियता को कुछ लोग राजनैतिक चश्में से भी देखते हैं लेकिन सुश्री अनुसुईया उइके का मानना है कि समाज सेवा के लिए पद किसी तरह से बाधक नहीं है। वे कहती हैं कि पदधारी से पहले हम एक इंसान हैं और मानवता की सेवा के लिए हमें हमेशा अच्छी सोच रखनी चाहिए। कभी-कभार ऐसी भी चर्चा होती है कि राज्यपाल और राज्य शासन के बीच टकराव की स्थिति बनी हुई है। इस विषय पर राज्यपाल प्रतिप्रश्न करती हैं- किस बात का टकराव? असहमति को टकराव नहीं कहा जाता। हम सब मिलकर, परस्पर संवाद के साथ अपनी-अपनी भूमिका निभा रहे हैं, कहीं कोई टकराव नहीं है। जब हम सब छत्तीसगढ़ की जनता के हित की बात सोचते हैं, हर वर्ग-जाति-धर्म के लोगों की भलाई के लिए काम करते हैं तो टकराव जैसी कोई स्थिति बन ही नहीं सकती है।’
यह भी एक सुखद संयोग ही है कि देश के प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी का छत्तीसगढ़ से बहुत आत्मीय लगाव है। लगभग तीन दशक पहले वे अपनी पार्टी के संगठनात्मक कार्यों के चलते यहां के वनवासी बाहुल्य इलाकों में खूब भ्रमण किया करते थे। वे यहां की भौगोलिक स्थिति तथा यहां के निवासियों की जरूरतों से भी वाकिफ हैं। छत्तीसगढिय़ा भाई-बहनों के सामाजिक-आर्थिक स्तर को ऊंचा उठाने के लिए राज्यपाल सुश्री उइके उनसे बराबर आग्रह करती रहती हैं। राज्यपाल जब भी प्रधानमंत्री से वार्तालाप करती हैं, वनवासियों के प्रति अपनी चिंता से उन्हें अवश्य अवगत कराती हैं। साथ ही आर्थिक रूप से पिछड़े इस वर्ग के उत्थान के लिए कैसी कार्य- योजनाएं बनें, इस मुद्दे पर भी चर्चा करती हैं।
सुश्री अनुसुईया उइके का कहना है कि प्रधानमंत्री श्री मोदी बिना किसी भेदभाव के समाज के हर वर्ग की भलाई के लिए अथक परिश्रम कर रहे हैं। उनके नेतृत्व में भारत की दुनिया में विशिष्ट पहचान बनी है, वैश्विक स्तर पर सामरिक व व्यापारिक रिश्ते प्रगाढ़ हुए हैं, भारत विश्व में महाशक्ति के रूप में उभरा है। वे कहती हैं कि आज जिस तरह से जम्मू-कश्मीर में शान्ति बहाली हुई, वहां अनुच्छेद 370 हटाया गया, देश में साम्प्रदायिक सद्भाव का वातावरण निर्मित हुआ, अयोध्या में भव्य श्रीराम मंदिर का निर्माण होने जा रहा है, यह सब प्रधानमंत्री की दृढ़ इच्छाशक्ति और राष्ट्र के प्रति उनके समर्पण का ही परिणाम है।
नि:संदेह, राज्यपाल के रूप में सुश्री अनुसुईया उइके का एक वर्ष का कार्यकाल सराहनीय है। उनकी कार्यशैली, सक्रियता व जनसंवाद से छत्तीसगढ़ की जनता के हृदय में उनके प्रति विशेष आदरभाव है। एक साल के दौरान उन्होंने उदारता, मानवता, संवेदनशीलता की कई मिसालें पेश की हैं। न जाने कितने दु:खी-पीडि़त लोगों के आंसू पोंछा है उन्होंने। उनके दर से कभी कोई निराश होकर नहीं लौटा। इससे बड़ी सोच क्या हो सकती है कि ‘राजभवन’ को उन्होंने ‘जनभवन’ बना दिया, जहां पहुंचने पर हर जन के मन में खुशी का संचार होता है। सामाजिक समरसता के लिए सतत प्रतिबद्ध सुश्री अनुसुईया उइके वास्तव में सदाशयता की प्रतिमूर्ति हैं।
0 मधुकर द्विवेदी, (लेखक छत्तीसगढ़ के वरिष्ठ पत्रकार एवं शिक्षाविद हैं)
