साथियों पेड़ हमारे मित्र हैं, सखा है, भाई है, हमारे जीवन दाता है। हमारे सुख और दुख का सच्चा साथी है। पेड़ हमसे कभी लेता नहीं, सिर्फ हमें देता है। पेड़ के सभी अंग और उत्पाद सिर्फ और सिर्फ जनकल्याण के लिए ही होते हैं। ये प्रकृति प्रदत्त वरदान है पृथ्वी पर रहने वाले समस्त जीव, चर और चराचर के लिए। इनके जड़ भूमि में काफी गहराई तक नीचे जाकर धरती को बांधे रखते है। इनकी जड़े जमीन के अंदर से पानी को खींचकर पत्तियों तक पहुंचाती हैं, जिससे जलचक्र का निर्माण होता है। वहीं ये जड़ जलस्तर को नीचे नहीं जाने देते। वृक्षों के जड़ अनेक प्रकार के औषधियों के भी काम आते हैं। वृक्षों के सघन पत्ते हमें गर्मी से बचाने के लिए ठंडी छाँव प्रदान करते हैं। राहगीर इन्हीं ठंडे छाँवों में बैठ कर या आराम कर इनके शीतल, मंद और सुगंधित वायु से अपना श्रम मिटाते हैं। चिडिय़ा या और कई प्रकार के जीव जंतु इन्हीं पेड़ों के पत्तों में, जड़ों में, खोखलों में अपना आश्रय बनाकर अपना जीवन चक्र चलाते हैं। इन पेड़ों के रंग बिरंगे फूल लोगों को आल्हादित करते हैं। भौरों को आकर्षित कर सृष्टि निर्माण करते रहते हैं। पेड़ का लगभग हर हिस्सा चाहे वो जड़ हो,पत्ती हो, फूल हो या छालें हो हमारे दैनिक जीवन के कई उपयोगी वस्तु बनाने में काम आते हैं। हमें इस बात का तनिक भी अंदाजा नहीं होता कि ये पेड़ कितने प्रकार के जीवों का आसरा है। इसके फल सभी जीवों के उदरपूर्ति के लिए होते हैं। इसी पेड़ से हमें घर बनाने, या दैनिक जीवन के कई उपयोगी सामान जैसे फर्नीचर, कृषि उपकरण, सजावटी सामान, ईंधन, पूजन सामग्री, दाह संस्कार आदि के लिए मजबूत लकडिय़ां प्राप्त होती है। आपके जीवन के लिए प्राणवायु ऑक्सीजन देने का काम हो या प्रदूषण को शोषित करने का काम हो ये वृक्षमित्र बिना थके, बिना रुके अनवरत करते रहते हैं। साथियों हमारे भारतीय परंपरा में हमारे पूर्वजों ने अलग अलग जगहों के लिए अलग अलग पेड़ पौधे लगाने के नियम हमें दिए हैं। जैसे-तालाब किनारे बरगद, पीपल, नीम, शहतूत, कदंब आदि। मंदिर देवालय के पास फूलदार पौधे मदार, डगर, कनेर, गुलमोहर, कदंब, अमलताश, पारिजात, चमेली आदि। गांव में गुढ़ी (चौक) में बरगद, नीम, इमली तो मृतक कर्म के लिए पीपल का पेड़ लगाने का नियम है। वनों में इमारती लकड़ी और फलदार वृक्ष साल, सरई, सागौन, जामुन, तेंदू, चार, महुआ, हर्रा, बहेरा, शीशम आदि को रोपे जाते हैं। बगीचे के रूप में आम, अमरूद, सेब, संतरा, मुसब्बी, अनार, पपीता, केला, बेर आदि को लगाया जाता है। गांव के खाली जमीन में बबूल, पलाश, नीम, खम्हार, बेर आदि को लगाते हैं। नदी किनारे कौहा अर्जुन, सेमल, आम, पीपल आदि बड़े बड़े वृक्षों को लगाते हैं। वहीं सड़कों के किनारे-किनारे छायादार पेड़ करंज, अर्जुन, नीम, आम, गुलमोहर, बरगद, सेमल आदि को लगाने से पथिक को दूर दूर तक छाँव मिलता है। साथियों ये सभी पेड़ पौधों को बचाने के लिए हमारे पूर्वजों ने इसे धर्म कर्म से जोड़कर इसे वंदनीय और पूजनीय बनाये हैं। हर पेड़ में अलग अलग देवी देवताओं का वास होने के डर से हम इनकी पूजा करें, काटें नहीं। यही भाव लेकर हमारी प्राचीन सभ्यता और संस्कार से हम पेड़ पौधों को अपना मित्र, सखा, जीवनदाता मानते आये हैं। कुछ लोग अपने घर के बगीचे में सजावटी पौधे भी लगाते हैं। साथियों पर अब क्या बतायें। मानव ने प्रकृति के साथ बहुत बुरी तरह खिलवाड़ करना शुरू कर दिया। सड़क बनाने के नाम पर, औद्योगिकीकरण के नाम पर, नगर, शहर, गांव बसाने के नाम पर, अतिक्रमण कर, खेती करने के नाम पर इन हरे भरे पेड़ पौधों को काटकर पर्यावरण का बुरी तरह विनाश किये हैं। प्रकृति के नियमों के तहत जल संरक्षण,वन संरक्षण होना बेहद आवश्यक है। घटते वनों के कारण मौसम चक्र, पर्यावरण प्रदूषण और अनेको व्याधियों ने अपना दुष्प्रभाव दिखाना शुरू कर दिया है। वैश्वीकरण के अंधानुकरण से समूचे ब्रम्हांड में तापमान में वृद्धि हो रही है। हमारी धरती लगातार गर्म हो रही है।भूजल स्तर नीचे जा रहा है। कल कारखानों,फैक्ट्रियों, विद्युत ताप गृहों, न्यूक्लियर रिएक्टर से निकलती प्रदूषण से ओजोन परत पतला होते जा रहा है। सूर्य की हानिकारक किरणें पृथ्वी को गर्म कर पहाड़ों में जमे ग्लेशियर को पिघला रही है। ग्लेशियर के लगातार पिघलने से कई देश और द्वीप का भौगोलिक क्षेत्र समुद्र में डूब रहा है। बढ़ती जनसंख्या और औद्योगिकीकरण से हरे भरे वन काटे जा रहे हैं। इन सबका दुष्परिणाम है कि मौसम चक्र पहले से बदल गया है। असमय बारिश, ओला वृष्टि, भयंकर गर्मी अब आम बात हो गई है। साथियों वैसे तो हर साल वृक्षारोपण की जाती है। सरकार द्वारा, एनजीओ के द्वारा, विभिन्न संगठनों के द्वारा, लोगों के द्वारा समाज के द्वारा प्रतिवर्ष करोड़ों पौधे लगाये जाते हैं, पर इनमें से कितने जीवित रह पाते हैं। कितने पौधे पड़ बन पाते हैं। संभवत: गिनती के कुछ अंक तक। विभिन्न एजेंसियों के द्वारा लाखों, करोड़ों रुपये खर्च करने के बावजूद वृक्षारोपण अभियान केवल एक फोटू खींचो और पेपर में छपवाओ तक ही रह गया है। पौधे लगाने के बाद उस पौधे का क्या हश्र होता है, कोई देखने वाला नहीं। सच कहा जाय तो हर साल लाखों, करोड़ों पौधों की हत्या हो जाती है, हम सबके द्वारा। साथियों एक पेड़ अपने लंबे और पूरे जीवनकाल में हमें लाखों, करोड़ों रुपये कीमत की विभिन्न जरूरत की चीजें उपलब्ध कराती है। ग्लोबल वार्मिंग से बचने के अनेक उपायों में महत्वपूर्ण है सघन वृक्षारोपण। पूरी दुनिया को प्रदूषण रोकने के उपायों को अमल में लाना ही होगा। घरों से हो या कारखानों से निकलते हानिकारक गैंसों के उत्सर्जन को रोकने के उपाय करने होंगे। पृथ्वी का अतिकाधिक दोहन कर प्राप्त कोयले से ताप विद्युत संयंत्रों पर निर्भरता कम कर सौर ऊर्जा आधारित बिजली पैदा करना होगा। पर्यावरण के संतुलन के तहत वनों को, पहाड़ों को, नदियों को हमें संरक्षित करना होगा। स्वच्छ पर्यावरण के साथ मानव जाति और समस्त चर चराचर के जीवन हेतु नये सोच और विचारों को लाना होगा।
0 रामेश्वर गुप्ता, बिलासपुर
