बाटा का नाम तो आपने सुना ही होगा! हो सकता है, आप और आपके दोस्त-रिश्तेदार बाटा के जूते-चप्पल पहनते हों! बहुत सारे लोग ऐसा मानते हैं कि बाटा भारतीय कंपनी है.लेकिन क्या यही सच है? नहीं. यह कंपनी है, यूरोपियन देश चेकोस्लोवाकिया की, जो कि एक समय ऑस्ट्रिया-हंगरी का हिस्सा हुआ करती थी. आज इसे चेक रिपब्लिक कहा जाता है. वहां 1894 में शुरू हुई कंपनी बाटा 1920 के दशक में भारत आई और यहीं की होकर रह गई. यहां आकर इस कंपनी ने अपना बड़ा बाजार बनाया. भारतीयों का भरोसा जीता, उन्हें अपना ग्राहक बनाया और भारतीय बाजार में स्थापित हो गई. आज इसके पोर्टफोलियो में 20 से ज्यादा ब्रांड्स और लेबल्स शामिल हैं. तो आइए आज की ब्रांड स्टोरी में जानते हैं बाटा की कहानी.

ऐसे हुई शुरुआत– बाटा कंपनी की शुरुआत चेकोस्लोवाकिया के ज्लिन शहर में हुई. शू-मेकर टोमास बाटा ने अपने भाई एंटोनिन और बहन ऐना के साथ इसकी शुरुआत की. नाम रखा- टी एंड ए बाटा शू कंपनी. फैमिली कई पीढ़ियों से जूते सिलती आ रही थी. टोमास ने 10 कारीगर रखे और चमड़े के जूते बनाने का काम शुरू कर दिया. जूते खूब बिक रहे थे पर उनके पास पैसे बहुत थे नहीं. ऐसे में वो कैनवास शू बनवाने लगे.

जब बढ़ने लगी डिमांड– कैनवास शू सस्ते भी थे और आरामदायक भी. डिमांड बढ़ने लगी. टोमास बाटा अमेरिका गए और वहां से भाप से चलने वाली मशीनें लेकर आए, ताकि ज्यादा जूते बनाए जा सकें. पहला विश्व युद्ध आते-आते पूरे यूरोप के अलावा मिडिल ईस्ट में भी बाटा की पहुंच हो गई. कंपनी की फैक्ट्रियों में हजारों मजदूर काम कर रहे थे.

जूते के दाम आधे कर दिए– विश्व युद्ध के बाद जब दुनियाभर के देशों की इकॉनमी लड़खड़ाई, तब बाटा ने जूतों के दाम आधे कर दिए. कारीगरों और कर्मचारियों ने कंपनी के प्रति वफादारी दिखाई और 40 फीसदी कम वेतन पर काम करने लगे. बाटा की आंखों में भी पानी था, सो उसने कर्मियों के रोटी, कपड़ा और मकान की व्यवस्था अपने जिम्मे ली. यही नहीं, उन्हें अपनी कंपनी में प्रॉफिट का हिस्सेदार बनाया. देखते ही देखते बाटा, फुटवियर इंडस्ट्री का बेताज बादशाह बन गया.

ऐसे पहुंचा भारत और बस गया बाटानगर– टोमास बाटा का 1920 के दशक में भारत आना हुआ. यहां रबर और लेदर सस्ते में उपलब्ध थे. उन्होंने देखा कि यहां के लोग जूते-चप्पल पहनना कंपल्सरी नहीं समझते, बल्कि नंगे पांव रहते थे. उन्हें भारत के रूप में फुटवियर का बड़ा मार्केट दिखा. 1931 में कलकत्ता के पास काेंनगर में बाटा की पहली फैक्ट्री लगी. कैनवस शू और रबर वाले जूते बनाए जााने लगे. डिमांड के चलते प्रॉडक्शन बढ़ता गया. कुछ ही वर्षों में यहां बाटानगर नाम से एक शहर बस गया. शुरुआत में कंपनी की सेल भारत में हर हफ्ते 3500 जोड़ी जूते की थी. 1940 का दशक आते-आते स्थिति काफी बदल गई. कंपनी तब 4000 लोगों को रोजगार दे रही थी. 40 के ही दशक में बाटा ने भारत में पांव जमा दिए थे. आज बाटा भारतीयों के दिल में बस चुकी है.

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