छत्तीसगढ़ के केशकाल अंतर्गत फरसगांव ब्लॉक के ग्राम झाटीबन आलोर के पहाडिय़ों में स्थित माता लिंगेश्वरी का मंदिर साल में एक बार ही खुलता है। इस साल 27 सितंबर को माता के मंदिर का पट खुलेगा। पहाडिय़ों के बीच एक गुफा में मां शिवलिंग के स्वरूप में लिंगेश्वरी माई विराजमान है। यहां हर वर्ष पूरे देश के सभी राज्यों से हजारों की संख्या में भक्त मन्नत की कामना लिए दर्शन करने आते हैं।
खीरा चढ़ाना आवश्यक
खास बात यह है कि यहां मनोकामना मांगने का तरीका निराला है. संतान प्राप्ति की इच्छा करने वाले दंपति को यहां खीरा चढ़ाना आवश्यक होता है. चढ़ा हुआ खीरा को पंजारी द्वारा नाखून से फाड़कर खाना पड़ता है. जिसे शिवलिंग के समक्ष ही कड़वा भाग सहित खाकर गुफा से बाहर निकलते हैं. यह गुफा प्राकृतिक शिवालय ग्रामीणों के अटूट आस्था और श्रद्धा का केंद्र है.
गुफा के अंदर है शिवलिंग
छत्तीसगढ़ के कोंडागांव जिले के फरसगांव से लगभग 8 किलोमीटर दूर बड़े डोंगर के रास्ते पर आलोर गांव स्थित है और इस गांव से लगभग 2 किलोमीटर दूर एक पहाड़ है. जिसे लिंगई चट्टान और लिंगई माता के नाम से जाना जाता है. परंपरा और लोक मान्यता के कारण इस प्राकृतिक मंदिर में हर दिन पूजा-अर्चना नहीं होती है और केवल मंदिर का पट साल में एक बार खुलता है. इसी दिन यहां विशाल मेला भी भरता है।
इस मंदिर में एक छोटी सी सुरंग है. जो इस गुफा का प्रवेश द्वार है. प्रवेश द्वार इतना छोटा है कि बैठकर या लेटकर ही यहां प्रवेश किया जा सकता है।
निसंतान दंपतियों की होती है मनोकामना पूरी
जानकार बताते हैं कि पहले चट्टान की ऊंचाई बहुत कम थी. लेकिन बस्तर की यह लिंग गुफा गुप्ता है. लिंगई माता हर साल भाद्रपद माह के शुक्ल पक्ष नवमी तिथि के पश्चात आने वाले बुधवार को इस प्राकृतिक देवालय को खोल दिया जाता है. और दिन भर श्रद्धालुओं द्वारा पूजा अर्चना और दर्शन के बाद पत्थर टीका कर दरवाजा बंद कर दिया जाता है .खासकर निसंतान दंपति यहां संतान प्राप्ति की कामना लेकर आते हैं. श्रद्धालुओं का मानना है कि यहां हजारों दंपतियों को संतान प्राप्ति की मनोकामना पूरी हुई है .और मनोकामना पूरी होने के बाद दूसरे साल अपने संतान को लेकर फिर माता के दर्शन करने पहुंचते हैं।

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