हमारा देश भारत वो देश है जहां वर्तमान का सम्मान तो होता हीं है, जो गुजर गये, उनका भी सम्मान होता है।  पितृ पक्ष इस बात का प्रमाण है, जिसमें समस्त पितरों को आदर सहित याद करते हुये कुश जल तिल अक्षत आदि से तर्पण कर उनका आशीष पाने के लिये करबद्ध प्रार्थना की जाती है। अन्न ,वस्त्र , उपयोगी वस्तु आदि का दान किया जाता है। पितरों के सम्मान में भंडारा का भी आयोजन होता है। ये सारी प्रक्रिया भारतवर्ष में हीं देखी जा सकती है यहां वृद्धजनों को आदर देने की परम्परा आदिकाल से चली आ रही है।

जिन घरों में वृद्धजन का आदर, सम्मान है वहां धन की कभी कमी नहीं होती। वृद्धजन हर घर की शान है। जिस घर से वृद्धजन का अनादर होता है, वहां भुखमरी,गरीबी अपना पांव जमा लेती है। उस घर की इज्जत खाक में मिल जाती है। घर आई हुई लक्ष्मी वापिस चली जाती है। खुशहाल  परिवार बिखर जाता है। भूख, जलन, ईर्ष्या, द्वेष, कलह, कष्ट, रोग आदि चारों ओर से उस घर को घेर लेते है।

वृद्धजनों के आदर में पुण्य है तो अनादर में पाप जिसका प्रतिफल साथ- साथ मिलता है। जब से पाश्चात्य देशों की छाया भारत पर पड़ी है, गांव की छाप मिट गई है, नगर से महानगर की संस्कृति उभर आई है, बहुमंजिली इमारतें खड़ी हो गई. वहां का परिदृश्य ही बदल गया है। संस्कृति में बदलाव आ गया है।

अगल कौन है, बगल कौन, न जानता कोई। इस तरह के परिवेश में अपनापन का दूर होना स्वाभाविक है। इस तरह के परिवेश ने आज भारत में वृद्धाश्रम, गौशाला आदि की नींव खड़ी कर दी जहां बेसहारे वृद्धजन, पशुधन आश्रय पा रहे है। आधुनिकता से घिरी युवा पीढ़ी अपनी आदर्श संस्कृति से दूर होती जा रही है।

इस परिवेश में वह भूलती जा रही है कि एक समय उसे भी इस तरह की उम्र से गुजरना पड़ सकता है जहां उसे भी सहारे की जरूरत पड़ेगी। जब उसके बच्चें भी अपने उसे दूर कर किसी वृद्धाश्रम में डाल देंगे, कैसा लगेगा उसे, विचारणीय है। इस तरह का समय आज तेजी से बदल रहा है जहां क्लेश, भुखमरी, बीमारी का बढना स्वाभाविक है।

महानगर की जिंदगी ने इस तरह का वातावरण पैदा कर दी है कि जहां सुबह-शाम बालकोनी में अकेले चुपचाप बैठा देखता है कि सामने घर के अन्दर उसके बेटे बहू चाय पी रह है, पर उन्हें ये पता नहीं कि इस घर में भी एक बूढ़ा रहता है, जिसे भी चाय की तलब हो सकती है। कभी कभी तो बची खुची पर ही गुजारा करना पड़ता है जब कि उसके सामने ही उसी के बच्चें जिसे बचपन में घोड़े बनकर पीठ पर घुमाया करता, कमाई कर अच्छी से अच्छी शिक्षा देकर कमाने योग्य बना दिया, दुकान से तरह – तरह के ताजा व्यंजन का आनन्द लेते नजर आते है ।

इस तरह की बदली स्थितियां भारतीय संस्कृति पर पश्चिमी देशों की पड़ती छाप की है जहां अपने ही अपनों से दूर होते जा रहे है। निश्चित तौर पर यह संस्कृति हानिकारक एवं विध्वंशक है जहां अर्थ तो है पर सुखचैन नहीं।

वृद्धजन दिवस यहीं याद दिलाने के लिये हर वर्ष आता है कि इस उम्र से सभी को एक न एक दिन गुजरना है। जैसा बोओगे, वैसा ही काटने को मिलेगा। अपना भविष्य संवारने के लिये वृद्धजनों का आदर करना सीख लें। उनकी जगह वृद्धाश्रम नहीं, घर है जहां पोता पोती, दादा दादी एक साथ खुशहाल नजर आते है, जिसे भारतीय परिवार कहा गया है। जहां सबका आदर, सम्मान है। वृद्धजनों का करें सम्मान, घर परिवार की है वे शान। इसी में हमारी भारतीय मूल संस्कृति समाहित है।

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