परिवार का वृद्ध, प्रौढ़, बाल अथवा भू्रणावस्था का मृतक प्राणी अन्य योनि में परिवर्तन होने तक प्रेतावस्था में रहता है। प्रेत अर्थात सूक्ष्म रूप में वायु  में विचरण करने वाला जीव। जीव की यह प्रेतावस्था एकांकी एवं कष्ट भरी होती है। मोक्ष में दूरी और योनि परिवर्तन का विलम्ब उस प्रेत को वृद्धावस्था में बनाये रखता है।

वह अपने परिवार, परिजनों को भूलता नहीं है। परिवार पर उसके द्वारा किये गये उपकारों का वह स्मरण करता है एवं कष्ट की इस घड़ी में परिजनों से सहायता चाहता है। यह जीव शरीर युक्त था, तब तक समस्त भोगों को भोगता रहा, शरीर मुक्ति के पश्चात परिवार ने त्याग दिया। उसे स्मरण होता है कि जब वह वृद्ध था, सारे परिवार का पोषण करता था।

उनके सुखी जीवन की व्यवस्था करता था। प्रौढ़ अथवा युवा था, तब सारे परिवार के सुख के लिए सुख सामग्री अर्जित करता था और जब बालक था किलकारियां भरकर घर का खुशहाल वातावरण बनाये रखता था किंतु आज वह प्रेत है, सूक्ष्म रूप में बिना घर के, बिना वस्त्र के हीन अवस्था मेंं है। पुत्र, पपौत्र स्मरण नहीं करते हैं, रक्त-संबंधी भूल रहे हैं, यह पीड़ा परिस्थिति उसे कु्रद्ध बना देती है और फिर वह जीव अपने घर के आसपास मंडराता रहता है।

उसकी क्रुद्ध दृष्टिप्रकोप से कभी-कभी अच्छे व्यवस्थित सुरक्षित घर में अशांति अथवा कष्ट उत्पन्न हो जाते हैं। गुरूड़ पुराण एवं अन्य शास्त्रों में स्पष्ट किया है कि पितृदोष का प्रभाव ग्रहों के दोष से अधिक होता है। ग्रह दोषों के लिए अथवा ग्रहों की शांति के लिए पूजा, उपासना, हवन, यज्ञ, मालाजप किये जाते हैं, इससे ग्रह सशक्त होकर सुख का मार्ग प्रशस्त कर देते हैं, क्योंकि ग्रह देव होते हैं, दयालु  होते हैं किंतु पितृ न देव, न दानव, न यक्ष, न किन्नर, इनमें से किसी भी श्रेणी में नहीं आते हैं।

वे सूक्ष्म जीव होते हैं, जो अन्य योनि की प्रतीक्षा तक वायु मंडल में विचरण करते हैं। देव, दानव, यक्ष, किन्नर और मनुष्य अपनी-अपनी प्रकृति के भोग प्राप्त करते ही रहते हैं, किंतु इस सूक्ष्म को अभावों में विचरण करना होता है और तब वह अपने ही परिवार से अपेक्षा जहां वह जन्मा, जहां का मुखिया रहा, बहुत अपेक्षा करता है, इसलिए वह पितृ, अपेक्षाओं की पूर्ति के अभाव में पुत्र, पौत्रों से कु्रद्ध हो जाता है।

कुछ लोगों में यह भ्रम रहता है कि पितरों की अस्थि भस्म को पवित्र नदियों में विसर्जित कर दिया है तथा पिण्डदान कर दिया गया, अस्तु अब पितृ का मोक्ष हो गया और उन्हें इस लोक एवं हमारे संबंधों से कोई वास्ता नहीं है, किंतु उन्हें यह स्मरण रखना चाहिए कि चौरासी लाख योनियों में जीव का भ्रमण होता है।

एक योनि से दूसरी योनि में जाने के बाद ही वह जीव प्रेत रूप में विचरण करता है, दूसरी योनि में जाने के बाद ही उस जीव का उसके घर परिवार से संबंध विच्छेद होगा। किंतु उस जीव के कर्म एवं धर्म अनुसार विधाता को खोल (शरीर) देना होता है, जीव के पुण्य के अनुसार उसका मोक्ष भी संभव है। यही वह कारण है, जिससे एक योनि से दूसरी योनि में जाने में विलंब होता है और जीव सूक्ष्म रूप से वायु मंडल में विचरण करते हुए अपने घर के ईद-गिर्द ही भटकता रहता है, इसलिए यह आवश्यक रूप से ध्यान देने योग्य है कि पितरों का आवाहन करके तर्पण एवं भोग पदार्थ अर्पित किये जाने चाहिए, ऐसा करने से पितृ प्रसन्न रहते हैं और नहीं करने से क्रुद्ध रहते हैं, जिससे पारिवारिक पीड़ा बनी रहती है। विद्वानों, पंडितों का मत है कि ग्रहों के दोष ग्रहों की शांति से दूर किये जा सकते हैं, किंतु ‘पितृ दोष’ परिवार की श्रद्धा से ही दूर होते हैं। इसलिए पितरों के ‘श्राद्ध’ का महत्व बताया गया है।

श्राद्ध का अर्थ श्रद्धापूर्वक आराधना है। पितरों का श्राद्ध 12 माह संभव नहीं हो तो आश्विन मास में 16 दिन तक पितरों के प्रति ‘श्राद्ध’ श्रद्धा की यह क्रिया नित्य प्रति अवश्य की जानी चाहिये। इस अवधि में पितरों को तर्पण उनके उपकार को स्वीकारते हुए उनकी मोक्ष की कामना के साथ करना चाहिये। इन दिनों स्वादिष्ट भोजनों के भोग से पितरों को संतुष्ट करना चाहिए तथा पक्षी-पशु एवं दीन-भूखे को तृप्त करना चाहिये।

वैसे पक्षियों में कौए, पशुओं में गाय माता और दीन-हीन में निराश्रित, अपाहिज का महत्व है। ब्राह्मण भोज का श्राद्ध पक्ष में अधिक महत्व है। कर्मकाण्ड, वेदपाठी ब्राह्मणों को श्रद्धा से निमंत्रित कर पितृमोक्ष की कामना एवं परिवार की सुख-समृद्धि का आशीर्वाद प्राप्त करना चाहिये। ऐसा करने से पितृदोष का शमन होगा और गृहस्थ में सुख-शांति की स्थापना होगी।

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